INTERVIEW: “अमित जी जिस उत्साह से आज भी सेट्स पर आते हैं हम सब के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं” – विद्या बालन

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लिपिका वर्मा
विद्या बालन, “तीन” प्रमोट कर रही हैं ‘तीन’ के अतिरिक्त विद्या ने सुजॉय घोष की “कहानी 2” हाल ही में खत्म की है। आगे, “बेगम जान” का किरदार निभा रही हैं जिस में मैडम बनी हुई हैं। “कमला दास” की बायोपिक भी जल्द ही शुरू करने वाली हैं विद्या। हमने जब उनसे ‘तीन’ के प्रोमोशन्स के दौरान बातचीत की तो विद्या ने हमारे ढ़ेर सारे सवालों के जवाब भी दिए –

सुजॉय घोष के साथ आपकी लड़ाई हुई फिर सुलह कैसे हुई ?

दरअसल में आप लोग सोचते होंगे कि यह बड़े लोग हैं कभी झगडा नहीं करते हैं। किन्तु सच्चाई तो यह है कि कभी हम लोग बच्चों की तरह से भी लड़ते झगड़ते हैं और रचनात्मक तौर से भी लड़ते हैं। पर जो भी है फिर एक दूसरे से बोलचाल शुरू कर ही लेते हैं। दरअसल में, “दुर्गा रानी” के लिए मन किया था क्यूंकि मैं बिमार थी उस वक़्त। हम ऐसे दिखा रहे थे कि हमारे बीच कुछ भी नहीं हुआ है और दो साल तक एक दूसरे से बातचीत भी नहीं की हमने।

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आप फिल्म किस हिसाब से साइन करती हैं ?

सबसे पहले तो वह किरदार मुझे अच्छा लगना चाहिए फिर उसके बाद निर्देशक फिल्म को जिस नजरिये से देख रहे हैं वही मेरा भी नजरिया है या नहीं। क्यूंकि मुझे वह किरदार कुछ महीनों तक तो जीना होता है सो यह आवश्यक है कि मेरा उस निर्देशक से तालमेल मिल रहा है या नहीं और फिर उसके बाद निर्माता कौन है ? यह भी जरुरी है क्यूंकि फिल्म को मार्किट भी करना होता है। रिलीज़ करना भी आवश्यक है। यदि यह सारी चीज़ें सही बैठ रही हो तो हिस्सा बनने में देरी नहीं करती।

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अपने फिल्मी सफर से क्या कुछ सीखा है आपने ?

दुनिया का कोई छोर नहीं होता, जब मैंने शुरू किया तब लोग मेरे बारे में अपने विचार रखते थे। मुझे बुरा लगा करता। तब मैंने उनके विचार पढ़ने बंद कर दिए। मैं यही सोचती हूँ कि यदि कोई भी नकारत्मक लिख रहा हो आपके बारे में या सोच भी रहा हो तो उससे दूर ही रहना चाहिये। बेकार अपना मन और दिमाग ख़राब नहीं करना चाहिए। सो सीख यही है कि हर दिन को झेलना आना चाहिए हर रोज़ अच्छा नहीं होता है उसी तरह हर रोज़ बुरा भी नहीं होता है। बस यही सोचती हूँ दुनिया में सब अच्छा ही है।

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अमिताभ बच्चन की माँ बनी हैं और फिल्म, “तीन” में अतिथि कलाकर का किरदार अदा कर रही हैं। कैसा अनुभव रहा उनके साथ काम करने का ?

हम सब अमिताभ सर से कुछ न कुछ सीखते ही हैं आज वह 76 साल के हो चुके हैं पर ज़रा सा एहसास भी नहीं होता है। वह हमेशा ही कुछ न कुछ अलग करके अचम्भित कर ही देते हैं। गज़ब की एनर्जी है उन में। बस यह ज़रूर है कि सह कलाकर की हैसियत से मैं उन्हें अमिताभ करके नहीं देखती हूँ क्यूंकि जब हम यूं ही बैठे हो तो वह भावना आ ही जाती है जब मैं उनसे कुछ घबरा सी जाती हूँ। सो कैमरे के सामने यही सोचती रहती हूँ कि वह मेरे सहकलाकार ही हैं। जिस उत्साह से वह आज भी सेट्स पर आते हैं हम सब के लिए प्रेरणा स्त्रोत ही हैं।


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Mayapuri

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