एक विदूषक जो भागता नज़र आता है – जानकी दास

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मायापुरी अंक 41,1975

कुछ लोग जानकी दास को केवल बातूनी, खुशामदी, और मामूली-सा व्यक्ति समझते हैं, लेकिन आप विश्वास कीजिये, मैंने उन्हें इतने नजदीक से देखा है कि मेरी नजरों में उन जैसे प्रतिभा सम्पन्न, चतुर और प्रेरणादायक लोग बहुत कम हैं।

वह डबल एम.ए. अनेक अंग्रेजी पुस्तकों के लेखक, मनोविज्ञान के माहिर, और हंसते हुए जिंदगी जीने के रहस्यों से पूर्ण परिचित हैं। फिर भी लोग उन्हें केवल एक एक्टर एक मामूली इंसान समझते हैं, तो बताइयें, क्या यह उनकी सफलता का राज़ नही?क्या असली विदूषक वह नही होता, जिसका असली रूप किसी को नजर न आये?

फिल्म के पर्दे पर ही नही, वैसे भी जानकी दास एक बहुत बड़े सूत्रधार हैं सारे फिल्म-उद्योग में वह एक मात्र निर्माण संयोजक हैं।

भानुमती के कुनबे को इकट्ठा करना, भावी फिल्म-निर्माण का आयोजन करना, किसी बंद पड़ी फिल्म के बिखरे हुए सिलसिलों को जोड़ना, दो जरूरतमंद व्यक्तियों को आपस में मिला देना, या ऐसे और बहुत से काम जानकीदास ने अपने जिम्मे में लिये हैं। इसके लिए उन्हें किसी ने प्रेरित नही किया। स्वभाववश उन्होंने इस काम को अपना लिया है।

उनके ब्रीफ केस की ड्रांइग रूम भी हर समय खचाखच भरी रहती है। मौके की तलाश कर रहे उभरते कलाकारों, हीरो-हीरोइनों की तलाश में घबराये हुए प्रोड्यूसरों डायरेक्टरों, अच्छी फिल्मों की उम्मीद में बैठे हीरो-हीरोइनों, संगीतकारों, गायकों, फोटोग्राफरों, पत्रकारों इन सब का जमघट वहां जमघट लगा रहता है।

उन सबका काम करने में जानकी दास को कितनी तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं, कितनी चालाकियों से काम लेना पड़ता है, कितने झूठ बोलने पड़ते हैं, इसका अंदाजा, कोई नही लगा सकता।

जानकीदास कभी किसी की बुराई नही करते, किसी को नुकसान नही पहुंचाते, किसी से बदला नही लेते, इसलिए वह उस झूठ को झूठ नही समझते, जिससे किसी का भला होता हो और किसी के फायदे के लिए वह जमीन-आसमान एक कर देते हैं।

अब हालत यह हो गई है (वह स्वयं इस बात को मानते है) कि अकारण ही झूठी बात मुंह से निकल जाती है। उनके जो दोस्त उनके झूठ को तुरन्त भांप लेते हैं, वे भी उनसे कुछ नही कहते। उन्होंने पहले ही सोच लिया होता है कि जानकी दास जो कुछ बोलेंगे उन में इतने प्रतिशत तो झूठ होगा ही। अपनी मासूमियत का एतबार वह अपनी आंखो से करवा देते हैं। उनमें मूर्खता का भाव लाकर वह भोले बन जाते हैं। और फिर आराम से दूसरों को मूर्ख बना जाते हैं

पारा जैसे एक जगह पर कभी नही ठहरता, वैसे ही जानकी दास कभी एक जगह टिक कर नही बैठते। कभी एक लीक पर नही चलते, कभी एक जैसी बात नही करते। बिस्तर पर भी बैठे बैठे ही फोन द्वारा सारी मुंबई में घूम रहे होते हैं। किसी की सिफारिश, किसी का छूटा हुआ काम, कोई तिकड़म कोई सिलसिला हर समय कोई न कोई जुगाड़ इसी लिए तो वह कहते हैं, कुछ न कुछ करते रहने से कुछ न कुछ होकर रहता है, कुछ न करने से कभी कुछ नही होता।“

जानकी दास को देखकर कोई यह नही कह सकता कि उनकी उम्र चौंसठ बरस की है। वह बैठे बैठे जब भी सुस्ती महसूस करते हैं। एकाएक उठ कर डंड पेलना शुरू कर देते है, पचास-पचास बैठकें निकाल डालते हैं। समय चाहे सुबह का हो या दोपहर का या फिर चाहे शाम ही हो और जगह चाहे स्टूडियो हो, होटल का कमरा हो, मेरा घर हो या उनका अपना उन्हें इसमें कोई झिझक महसूस नही होती। वह चाय नही पीते, छाछ और नींबू का पानी पीते हैं। खाने के साथ असली घी का एक कटोरी पी जाते हैं। विहस्की के दो पैग पीते हुए चार प्लेट सलाद चट कर जाते हैं। स्वास्थय के संबंध में तो, आपको दो-चार घंटे का लेक्चर पिला सकते हैं।

अपने आपको वह राजनीति का भी विशेषज्ञ समझते हैं। उनके पास हर समस्या का हल है। उन्होंने अपना एक अलग दर्शन-शास्त्र तैयार किया है। उनका ख्याल है, जब वह छपेगा तब संसार में एक नये अध्याय का उदय होगा।

मेरा ख्याल में जानकी दास के स्वास्थय का एक राज यह भी है कि वह अतीत की उन्हीं बातों को याद रखते हैं, जो वर्तमान की तस्वीर में खुशनुमा रंग भर सकें। गंदी, बदसूरत और अवांछित बातों को वह दूसरे ही क्षण भुला देते हैं।

यह बात उनके दोस्त देव आनंद में भी है, जिनकी उम्र पचास से ऊपर हो चुकी है, और जो अब भी अपने से तीन गुना छोटी उम्र की लड़कियों के साथ बतौर हीरो काम कर रहे हैं।

जानकी दास बैठे बैठे, लेटे लेटे और चलते चलते भी भागते नजर आते हैं, जैसे कोई रेस हो रही हो। रेस उनका स्वभाव बन चुकी है। शायद आप नही जानते, चालीस वर्ष पहले वह अंतर्राष्टीय ख्याति के साइकिलिस्ट थे। सन् 1938 में उन्होंने ब्रिटिश एम्पायर गेम्स (सिडनी) में, सन् 1940 में टोकियो ईस्टर्न गेम्स में, और सन् 1946 में ज्यूरिख की वर्ल्ड चेम्पियनशिप में भाग लिया था, सन् 1932 में उन्होंने आस्ट्रेलिया में साइकिलिंग का वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ कर अपने देश का नाम ऊंचा किया था। उनका साइकिल चलाने का स्टाइल अपना ही था, जो “जानकी दास साइकिलिंग स्टाइल” के नाम से मशहूर हुआ वह स्टाइल आज भी विदेशों में लोकप्रिय है।

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Mayapuri