चरस की माल्टा में आउटडोर शूटिंग- एक रिपोर्ट

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मायापुरी अंक 16.1975

निर्माता निर्देशक रामानन्द सागर पहले भारतीय हैं जिन्होनें अपनी नई फिल्म ‘चरस’ की माल्टा में शूटिंग की। 17 मील दायरे में फैला हुआएक छोटा सा टापू है यह अपनी विशेषताओं के कारण यह हॉलीवुड, फ्रेंच और इटालियन निर्माता निर्देशक को फिल्म शूटिंग के लिए आकर्षित करता रहा है। ‘चरस’ के फोटो ग्राफर प्रेम सागर ने बताया कि हमें इस टापू में ऐसी ऐसी लोकेशन मिली, जिन्हें हम देखते ही रोमांचित हो उठे थे। आप कल्पना नही कर सकते कि इस छोटे से टापू में क्या-क्या हो सकता है। यहां गहरे तालाब हैं, समुन्दर है, बड़े-बड़े पुल हैं, नहरें हैं, खाइयां हैं, पहाड़ हैं, हाइवे हैं, मैदान हैं, बाग बगीचे हैं, पुराने टाईप के किले हैं और माडर्न ढंग के मकान भी हैं। एक निर्माता-निर्देशक की कल्पना में जैसी भी लोकेशन हो दुनिया भर खाक छान मारों कहीं न मिले पर यहां माल्टा में सबकुछ मिल जायेगा।

‘माल्टा’ जाने के पहले समाचार पत्रों में छपा था कि ‘चरस’ की यूनिट यूरोपीय देशों में जाने वाली है, यह भी सुना था कि वेस्टइंडीज में भी शूटिंग की जायेगी। पर अचानक ‘माल्टा’ में शूटिंग क्यों हुई, इस विषय में प्रेम सागर ने एक बड़ी दिलचस्प कहानी सुनाई।

हुआ यह कि रामानन्द सागर अपनी फिल्म ‘चरस’ की शूटिंग खास उन स्थानों पर करना चाहते थे जहां वाकई चरस की स्मलिंग वगैरह चलती हो या जो चरस के लेनदेन के गुप्त अड्डे ही इस तरह की लोकेशन ढूंढने के सिलसिले में वे इंगलैंड गये हुए थे। हालांकि उनके दिमाग में वेस्टइंडीज के कुछ स्थान घूम रहे थे पर उन स्थानों के फोटो आदि देख कर उन्हें कुछ सन्तोष नही हुआ। वे कुछ फैसला नही कर पा रहे थे। एक दिन वे इसी सवाल पर अपने भाई चितरांजन चोपड़ा से जो इंगलैंड मे ही रहते हैं, विचार करते हुए टहल रहे थे कि सामने उन्हें एक बोर्ड दिखाई पड़ा ‘माल्टा हाऊस’ उस बोर्ड को देखते ही सागर साहब जरा ठहर गये और कुछ सोचने लगे माल्टा माल्टा। माल्टा के बारे में उन्हें कुछ ज्यादा पता नही था पर हां उन्हें उस टापू के इतिहास के संबंध में एक बड़ी रोमांचक घटना याद थी। यह घटना ऐसी थी जिसने सागर साहब के मन में आग पैदा कर दी थी। वह घटना है दूसरे महायुद्ध की हिटलर ने अपनी राक्षसी ताकत और जुल्म से यूरोप को लगभग तबाह कर दिया था। हिटलर की आंखे इंगलैंड की ओर लगी थी। इसलिए वहां अपने पैर जमाने से पहले वह माल्टा पर कब्जा करना चाहता था। 17 मील के दायरे में फैले हुए माल्टा में कितने लोग होगें ? चंद लाख ही तो पर जितने भी लोग वहां थे उन्होंने हिटलरशाही के सामने सिर झुकाना कबूल नही किया। हिटलर माल्टा को तहस नहस करने के लिए जूझ पड़ा। उसने केवल पांच दिन के भीतर-भीतर 2 हजार बार माल्टा पर हवाई हमला किया और बम गिराए। फिर भी वहां के लोगों ने आत्म-समर्पण नही किया। हिटलर ने पूरे माल्टा को घेर लिया फिर भी वहां की बहादुर जनता ने उसका मुकाबला किया। कहते हैं यदि माल्टा के लोग घुटने टेक देते तो हिटलर की फौजे इंगलैंड की सड़कों पर पहुंच जाती दुनिया का इतिहास ही बदल जाता माल्टा के लोगों ने देश-भक्ति का जो उदाहरण दुनिया के सामने रखा उसे सुनकर सागर साहब के दिल में भी माल्टा के लोगों के प्रति श्रद्धा और प्यार था। यह दुनिया में पहला देश है जिसे बहादुरी पर सम्राट जार्ज ने ‘जार्ज क्रास’ दिया था अब तक लोगों को पदक मिलते रहे हैं पर किसी भी सम्पूर्ण देश को इस तरह का अब तक कोई पदक नही मिला।

‘माल्टा हाऊस’ सामने देखते ही सागर साहब को सारा इतिहास याद आ गया। तब उनके भाई ने भी बताया कि ‘माल्टा’ में अक्सर हॉलीवुड वाले शूटिंग करने आते हैं और फिल्म वालों के लिए वाकई बड़ी लाजवाब जगह है। सागर साहब अब अपने को नही रोक सके और उस ‘माल्टा हाऊस’ के भीतर चले गये। वहां की रिशेप्सनिस्ट ने उनका स्वागत किया। जब सागर साहब ने बताया कि वे अपनी फिल्म ‘चरस’ की शूटिंग के लिए लोकेशन ढूंढ रहे है तो उस सुन्दरी ने माल्टा के अनेक रोमांचक स्थानों के फोटो, पुस्तकें नक्शे आदि सामने लाकर रख दिए। उन स्थानों के चित्र देख कर ही साहब का मन उड़कर माल्टा पहुंच गया। बस फिर क्या था उन्होनें माल्टा में चरस के कुछ रोमांटिक और कुछ रोमांचक दृश्यों से फिल्माने का फैसला कर लिया। माल्टा की सरकार ने भी सागर साहब को प्रेरित किया और सहयोग देने का आश्वासन दिया।

माल्टा में शूटिंग का कार्य क्रम बनते ही इंगलैंड से हेमा और हेमा के बाद धर्मेन्द्र और अजीत माल्टा पहुंच गये। यूनिट के तकनीशियन पहले से हो वहां पहुंचा दिए गये थे। वहां की सरकार ने शूटिंग की व्यवस्था में पूरा योगदान दिया। शूटिंग के लिए लोकेशन तय करने के बाद ही वह जगह पूर्ण रूप से यूनिट के हाथ में आ जाती थी। उस जगह पर अन्य किसी व्यक्ति को आने जाने की इजाजत नही होती थी।

‘माल्टा’ की सभी रोमांटिक और रोमांचक स्थानों पूरा-पूरा उपयोग किया गया है। कुछ रोमांटिक स्थानों पर हेमा और धर्मेन्द्र के रोमांटिक सीन फिल्माये गये। एक सीन में वे दोनों शाही बग्गी में बैठ कर समुन्द्र तट पर टहलते हैं और रोमांस की लहरियों में डूबे रहते हैं। जब वे दोनों एक नाव में बैठ कर एक पुराने किले को नीचे गुफा की तरह बने वाटर टनल की ओर जाते हैं तो बड़ा रोमांचकारी लगता है। उन दोनों पर वही एक रोमांटिक गाना भी फिल्माया गया।

प्रेम सागर ने बताया कि हम यहां चंद खास जगहों पर साईकिल चेंज फिल्माना चाहते थे। हमने यहां स्वीडन मे बनी ‘चौपर्स’ नामक लाजवाब साईकिल देखी तो मन भर आया सोचा साईकिल खरीद कर फिल्म के सीन लेगें। पर जब साइकिल के दाम पूछे तो माथा ठनक गया। एक साईकिल की कीमत डेढ़ हजार से भी ज्यादा थी जब कि हमें शानदार शेवरलेट मय ड्राइवर और पैट्रोल के प्रतिदिन 150 रु. के हिसाब से उपलब्ध थी। इसलिए हमने मोटर और स्कूटर की चेज की है तो इस फिल्म का खास आकर्षण है। प्रेम सागर ने बताया कि माल्टा में मोटर के सामने साईकिल बड़ी मंहगी है। मोटरों का तो यह हाल है कि थोड़ी सी खराबी होती है कि उसके इंजन को निकाल कर उसकी बॉडी को चकना चूर कर एक पेटी सी बना कर डंप कर दिया जाता है। बड़ी बड़ी शानदार मोटरें देख कर जी आता है उन्हें हिन्दुस्तान ले चलें हमारी फिल्म इंडस्ट्री में जो मोटरें रेयर मानी जाती है और जिनका उपयोग हमारे बड़े टॉप के हीरो हीरोइन करते हैं वैसी मोटरें तो वहां के आम लोग इस्तेमाल करते हैं। प्रेम सागर ने बातचीत के दौरान यह भी बताया कि ‘माल्टा’ में बड़े-बड़ें ऊंचे दर्जे के फाइटर निशाने बाज और लड़ाकू मिल जाते हैं। इन लोगों का एसोशिएशन बना हुआ है। यहां जितनी भी विदेशी कम्पनियां आती है वे इस एसोशिएशन के मार्फत ही यहां के कलाकारों को अपनी फिल्मों में काम करने के लिए लेती हैं। हमने भी यहां के प्रसिद्ध लड़ाकू निशानेबाज और फाइटरों का इस्तेमाल किया है। हमें एक आदमी तो ऐसा मिला जो स्कूटर पर बैठ कर लम्बी चौड़ी सिढिंयों से सीधा दौड़ कर नीचे उतर आता था। इस आदमी की कलाबाजी के कई सीन इस फिल्म में फिल्माए गये हैं।

प्रेम सागर के कथनानुसार ‘माल्टा’वाकई लाजवाब टापू है जहां रहस्य रोमांच से भरपूर ‘चरस’ जैसी फिल्मों का बड़ा रोमांचक फिल्मीकरण किया जा सकता है। यहां के सागर किनारे स्थित पर्वतीय स्थान इतने मोहक और आकर्षक है कि कलाकारों को रोमांटिक मूड बनाने की जरूरत नही पड़ती। धर्मेन्द्र और हेमा यहां के रमणीय स्थानों में शूटिंग करते हुए अपने आप में डूब गये थे।

सागर साहब का यूनिट जब भी आउटडोर शूटिंग पर जाता है कोई रोमांचक घटना हो ही जाती है। इस बार बी जब वे जनेवा से हवाई उड़ान भरने वाले थे तो कैमरा असिस्टेंट के पास कैमरा की बैट्री देख कर हवाई जहाज के अधिकारियों को भम्र हुआ कि वह कोई अरब गुरिल्ला है जो बम लेकर उड़ान भर रहा है। बस फिर क्या था। करीब पांच घंटे तक तनाव रहा आखिर पूरी तरह तकनीक जांच करने के बाद जब यह मालूम पड़ा कि वह यन्त्र वाकई कैमरा की बैट्री है तब कही उड़ान भरने की इजाजत मिली।

सागर साहब के यूनिट को इस बात की भी खुशी थी कि यहां सुबह 6 बजे से ही सूरज निकल आता है और शाम को सात बजे तक आकाश में चमकता रहता है। इस वजह से उन्हें शूटिंग को काफी समय मिल जाता था। यहां की आव हवा में भी बड़ी ताजगी है। यूनिट का कोई शख्स न बीमार पड़ा न किसी को किसी तरह की शिकायत हुई।


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Mayapuri

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