मूवी रिव्यू: बॉलीवुड की कड़वी सच्चाई से रूबरू करवाती – ‘बॉलीवुड डायरीज’

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रेटिंग**

मुबंई में रोजाना कितने लोग बॉलीवुड में अपनी किस्मत आजमाने के लिये ट्रेनों से उतरते हैं उस वक्त उनकी आंखों में कुछ बनने की चाहत होती है एक उत्साह होता है। एक्टर बनने का जज़्बा बाहर छोटे बड़े शहरों में रहने वाले युवाओं में भी होता है। इसके अलावा टैलेंट हंट जैसे टीवी शोज भी उन्हें बॉलीवुड की चकाचौंध में अंधा करने के लिये कारगर साबित होते हैं। उन सभी लोगों के जुनून, हताशा और असफलता की कहानी है निर्देशक के डी सत्यम की फिल्म ‘बॉलीवुड डायरीज’ में।

कहानी

फिल्म में तीन कहानी एक साथ चलती हैं जिनके पात्र बॉलीवुड एक्टर बनने के लिये जुनून की हद तक जा कर दिखाते हैं। इनमें एक है विष्णु (आशीष विद्यार्थी) जिसका मकसद बॉलीवुड एक्टर बनना था लेकिन पेरेन्ट्स ने शादी कर दी, बाद में बाल बच्चों की जिम्मेदारी के तहत वो अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाया लेकिन एक आयु पार करने के बाद भी उसका जुनून कम नहीं हुआ तो उसने नौकरी से रिटायरमेन्ट लेकर मुबंई जाने की ठानी। परन्तु पता लगा कि उसे कैंसर है और वो बस कुछ ही दिन का मेहमान है। इसके बाद हताश विष्णु बाकायदा अपने गुरू के कहने पर वो सब कुछ करता है जिससे उसका अगला जन्म किसी स्टार के घर में हो। दूसरा एक युवक है रोहित (सलीम दीवान) जिस पर पागलपन की हद तक एक्टर बनने का जुनून सवार है वो एक कॉल सेन्टर में काम करता है लेकिन वहां भी फिल्म से संबंधित लोगों से फोन पर काम मांगता रहता है और कई जगह खुद भी पहुंच जाता है और जब उसे एक टेलेंट हंट में मौका मिलता है तो वो जजों को प्रभावित कर (कभी अपने सिर पर बोतल फोड़ कर तो कभी अपना हाथ काटकर) दूसरे रांउड तक पंहुच जाता है, इस तरह मुबंई जाने से पहले ही वो अपने मोहल्ले तथा ऑफिस वालों का हीरो बन जाता है लेकिन जब तीसरे राउंड में उसे फटकार लगा कर आउट किया जाता है तो वो अपमान के डर से पागल हो जाता है।

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तीसरी कहानी एक वैश्या इमली(राइमा सेन) की है जो मुबंई का नाम लेते ही पागल हो जाती है और अपने हर उस ग्राहक को पूरी तरह से संतुष्ट करती है जो अपने आपको मुबंई से आया कहता है। एक बार एक राइटर डायरेक्टर दमान (विनीत कुमार सिंह) अपनी फिल्म के लिये इमली के कोठे पर रिसर्च करने के लिये आता है। वो इमली की कहानी से इतना प्रभावित होता है कि उसकी कहानी पर उसे ही लेकर फिल्म बनाने को प्लान बनाता है लेकिन मुबंई जाकर मजबूर उसे इमली की जगह किसी नामचीन एक्ट्रेस को अपनी फिल्म में लेना पड़ता है। इस बात से दुखी हो इमली अपनी बेटी को किसी आश्रम में डाल कर खुद शेखों के मनोरजंन का सामान बनने के लिये दुबई चली जाती है।

निर्देशन

इस तरह की चीजें पहले भी फिल्मों की कहानियां बन चुकी हैं। निर्देशक ने अलग अलग शहरों की तीन कहानियों को फिल्म का सब्जेक्ट बनाया और उन तीनों कहानियों का अंत दुखद बताया है। जहां दमान और इमली और रोहित की कहानी पर विश्वास किया जा सकता है लेकिन एक शादीशुदा रिटायरमेन्ट की दहलीज पर बैठे आदमी विष्णु पर एक्टर बनने का जुनून हजम नहीं होता। फिर भी फिल्म उन लोगों के दिलों में डर बैठा सकती है और उन्हें अहसास दिला सकती है कि ये डगर इतनी भी आसान नहीं, जो बिना कुछ समझे एक्टर बनने का सोच बैठते हैं। डायरेक्टर जो कहना चाहता था वो बात जरूर फिल्म के जरिये कह पाया है। तीनों कहानियों के लिये कास्टिंग भी अच्छी रही खासकर रोहित का किरदार प्रभावित करता है और विष्णु सीरियस होते हुये भी अंत में हंसी का पात्र बन कर रह जाता है।

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अभिनय

आशीष विद्यार्थी एक बढ़िया अदाकार हैं लिहाजा विष्णू की भूमिका उन्होंने बहुत ही सहजता से निभा दी। उनकी पत्नी के तौर पर करूणा पांडे भी अच्छी रही। जहां इमली के किरदार में राइमा सेन प्रभावित करती हैं वहीं राइटर डायरेक्टर दमान की भूमिका को विनीत कुमार सिंह ने भी अच्छी अभिव्यक्ति दी। लेकिन रोहित के किरदार में सलीम दीवान विशेष तौर पर प्रभावित करते हैं क्योंकि उन्हें दर्शाना था कि रोहित पर महज एक्टर बनने का जुनून है जबकि वो एक्टर किसी एंगल से नहीं है।

संगीत

बेशक फिल्म बॉलीवुड पर आधारित है लिहाजा इसमें म्यूजिक का काफी स्कोप था बावजूद इसके विपिन पटवा का संगीत बहुत ही साधारण है।

क्यों देखें

बॉलीवुड के आकर्षण में सम्मोहित सज्जनों को ये फिल्म विशेष तौर पर देखनी चाहिये जिससे उन्हें अंदाजा हो सके कि बॉलीवुड की राह इतनी आसान नहीं, ये फिल्म पूरी तरह से बॉलीवुड की कड़वी सच्चाई से अवगत करवाती है।


Mayapuri