किस्सा लोकल ट्रेन का प्राण

1 min


12TH_PRAN_1516289g

 

मायापुरी अंक 46,1975

वक्त इतनी तेज रफ्तार से आगे को दौड़ता है कि किसी को पीछो पलट कर देखने का अवसर तक नहीं देता। किंतु इसी तेज रफ्तार सफर में कभी कभार कोई क्षण बीती यादें ताजा कर देता है। पिछले वर्ष एक फिल्म की शूटिंग में प्राण को मुंबई लोकल ट्रेन में सफर करना पड़ा तो 1947 की याद ताजा हो गई। यह वह समय था जब भारत का बटंवारा होने पर प्राण मुंबई आये। कुछ समय तो वह काम की तलाश में भटकता रहे किंतु स्व. श्याम, स्व. कुलदीप कौर और स्व. सहादत हसन मंटो की दोस्ती के कारण उन्हें मुंबई टॉकीज स्टूडियो मलाड में काम करने का मौका मिला। जिसकी वजह से प्राण को लोकल ट्रेन से सफर करना पड़ता था। उन्हें जब पहला वेतन मिला तो उनकी पत्नी शॉपिंग के लिए बाजार उन्हें ले गई। लाहौर में भी प्राण फिल्मों में काम करते थे। इसलिए उनकी पत्नी बड़ा हाथ खोलकर खर्च करती थी। उस दिन शाम को शॉपिंग के बाद दोनों जब घर पहुंचे तो पता चला कि 490 रुपये खर्च हो चुके हैं। और घर का खर्च चलाने के लिए कुल दस रुपये बचे हैं। अब प्रश्न यह था कि वह रुपये घर के खर्च के लिए रखे जाए या लोकल ट्रेन का पास बनवाया जाए? जाहिर है नौकरी फिर नौकरी थी इसलिए ट्रेन के पास को प्राथमिकता दी गई। उस समय प्राण को वह लोकल पास कितना मंहगा लगा होगा इसका आज अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये