सुपरस्टार कौन? धर्मेन्द्र अमिताभ या राजेश खन्ना

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052-25 dharmendra and amitabh bachchan and rajesh khanna

मायापुरी अंक 52,1975

दिलीप-देव-राज की नैया अपने सूर्यास्त पर है। इसका स्थान जिस नैया ने लिया है वह राजेश, धर्मेन्द्र व अमिताभ की नैया। यह सब आज कल अपने मध्यान्ह पर हैं, फिर भी इस नैया में सर्वोपरि कौन है? यह प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है। राजेश खन्ना या धर्मेन्द्र अमिताभ बच्चन? इनमें से कौन सुपरस्टार है? प्रश्न का उत्तर तो समय ही देगा लेकिन फिर भी यहां एक सिलसिलेवार दृष्टिक्षेप हमें आने वाली घटनाओं की अनुमानित झांकी दे सकता है।

हाल के वर्षो में यदि किसी अभिनेता ने फिल्मी जगत को सर्वाधिक प्रभावित किया है तो वह राजेश खन्ना हैं। ‘माधुरी’ के युनाइटेड प्रोड्यूसर सर्स द्वारा आयोजित टेलेंट प्रतियोगिता से वह चुनकर आये तथा ‘आराधना’ के बाद वह ख्याति के शिखर पर चढ़ता ही चला गया है। उन्होंने रोमांटिक अभिनय को एक नयी दिशा दी है। राजेश खन्ना हेयर स्टाइल या गुरूशर्ट उनकी लोक प्रियता के प्रमाण हैं। ‘आनंद’ और ‘बावर्ची’ में उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि वह किसी भी प्रकार की भूमिका कुशलता से निभा सकते हैं। यद्यपि अंजु महेन्दू के मामले से उनकी लोकप्रियता को कुछ धक्का लगा। पर उसके बाद आने वाली उनकी फिल्मों ‘प्रेमनगर’ ‘नमक हराम’ ‘रोटी’ व ‘प्रेम कहानी’ ने शीघ्र ही सिद्ध कर दिया कि वह एक सफल अभिनेता हैं। उनकी कुछ स्टंटबाजियों तथा 1973 में रिटायर होने की अफवाह, उनके चमचा-चमची, उनके प्रेस एजेंटो से उनकी निर्दोष इमेज को कुछ क्षति पहुंची है पर अंतत: उनकी प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा, भोला भाला सुंदर चेहरा, बौद्धिक आंखे, व्यूह नीति में दक्षता व गजब का हिसाब किताबीपन उन्हें प्रथम स्थान पर रखते आये हैं और शायद रखते रहेंगे। उनकी अदाओं की नकल ‘धर्मात्मा’ में फिरोज खां और ‘जूली’ में विक्रम ने की।

धर्मेन्द्र एक ऐसा कलाकार हैं जिसे सर्वाधिक संघर्ष सहना पड़ा है। वह सभी में सबसे अधिक बदनाम, पर सर्वाधिक सरल हैं। परिस्थितियों का शिकार होकर कई बार अपने मार्ग से हुआ है, फिर भी वह जन्म जात भावुक व संवेदनाशील है। उन्हें न राजेश खन्ना जैसी सुविधाये प्राप्त रही हैं, न अमिताभ जैसी विरासत, परिवेश व उच्च शिक्षा इसका कारण वह सदा समस्याओं से घिरे रहे हैं। शराब के आधिक्य ने न केवल उन्हें बदनाम किया अपितु कई बार ऐसा लगा कि वह फिल्म क्षेत्र से सदा के लिए दूर फेंक दिये गये हों।

लड़कियों के स्कैंडल भी उनकी जिंदगी में सर्वाधिक जुड़ें सुंदरी मीना, हेमा आदि अनेक नाम उनकी जिंदगी में आये। लेकिन उनकी संकल्प शक्ति गजब की है। उनकी प्रतिभा, विनम्रता, सहजता, उनकी शरारती आंखे, दृढ़ आवाज़ अपना बना लेने वाली मुस्कुराहट निर्दोष भाव मुद्रा आदि ने फिल्म जगत में उनका स्थान सदा के लिये स्थायी कर दिया है। उनके पास चमचे नहीं हैं पर उनके पास गहरे मित्र हैं। ‘अनुमपा’ ’सत्यकाम’ ’शोला और शबनम’ ’फूल और पत्थर’ तथा ’प्रतिज्ञा’ जैसे चित्रों ने उनके अभिनय को स्मरणीय बना दिया है। पुन: आने वाले वर्षो में ‘मां’ ’चैताली’ और ’शोले’ जैसी फिल्में ने उनके भविष्य को स्थिरता प्रदान कर दी है।

लगभग एक वर्ष पूर्व तक धर्मेन्द्र व राजेश खन्ना ही प्रथम स्थान के लिये मुख्य प्रतिद्वंदी समझे जाते थे। पर इन दोनों को ही नवागंतुक ने चुनौती दी है। वह राजेश जैसी मास्टर व्यूह नीति का निर्माता न हो पर उनका जीवन सबसे अधिक सुनियोजित है, वह आराम और काम सभी व्यवस्था से गहरा आत्मविश्वाश है। प्रारम्भ से ही साधन संपन्न व समस्त क्षेत्रों में उच्च अभिज्यात्य वर्ग से निकट संबंध व परिचय वाले अमिताभ बच्चन को अन्य दोनों अभिनेताओं के विपरीत फिल्म जगत में अपना स्थान बनाने में जरा भी कठिनाई नहीं हुई। न देर लगी, उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि वह किसी एक स्कैंडल का कभी शिकार नहीं हुए, और जया जिससे उनका विवाह हुआ है, के अतिरिक्त किसी के साथ नहीं जुड़ा। अमिताभ ‘सात हिंदुस्तानी’ में ही कलाकार स्वीकार किया गया था, फिर ‘आनंद’ में उन्हें पुरस्कार मिल गया। फिर बीच में कुछ डूबा, फिर वह ‘जंजीर’ ‘मजबूर’ तथा ‘जमीर’ में फिर उठा हाल में ‘नमक हराम’ में उन्होंने एक और बुलंदी हासिल की है। यही नहीं, वह जहां भावात्मक अभिनय में सफल है वहां एक्शन भूमिकाओं में समर्थ बना दिया है। पर उसकी यह सफलता ही दुर्बलता भी बन गई है। कुछ लोगों का कहना है कि यदि ‘जंजीर’ में उन्होंने एक्शन रोल न किया होता तो वह बहुत ऊंचाई पर उठ सकते थे। ‘जंजीर’ में उनकी सफलता ने इस ऊंचाई से वंचित कर दिया है, पुन: उन्हें एक महान कवि व बुद्धिजीवी बाप की विरासत मिली है पर उनमें स्वयं बौद्धिकता का अभाव है। यही कारण है कि प्रतिभा होने पर भी वह शायद राजेश खन्ना व धर्मेन्द्र का स्थान कभी न ले सकें। जो भी हो उनकी आगामी फिल्में, मिली दानें, हेराफेरी सिद्ध कर देंगी कि वह इस पंक्ति में क्या तीसरे स्थान से ऊपर उठ सकेंगे?

यहां दुख की बात है कि राजेश खन्ना व धर्मेन्द्र के दृढ़ अध्यवसाय के विपरीत अमिताभ सफलता की सीधी सपट राह चाहते हैं। वह अपने को निरंतर मांजने के स्थान पर अभी से हीनग्रंथि का शिकार हो गये हैं। यह उनके इस कथन से प्रकट है कि जब मेरी कोई फिल्म पिट जाती है तो लोग कहते हैं पिट गया, चलता नहीं है। पर जब कोई फिल्म चलती है तो उसके लिये अन्य को श्रेय मिलता है। यथा ‘जंजीर’ प्राण के कारण चली, ‘अभिमान’ गीतों के कारण वह ‘नमक हराम’ राजेश खन्ना की वजह से ‘नमक हराम’ के विवाद ने उन्हें शायद भ्रमित कर दिया है जो कुछ निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा फैलायी गयी है। यह भी दुखद है कि शर्मिला टैगोर ने इस ‘आहुति’ में यह कहकर धृत डाला है कि अमिताभ की श्रेष्ठ भूमिका को राजेश ने अनावश्यक रूप से आवृत कर लिया तथ्य शायद इसका उल्टा है। स्वंय अमिताभ को पत्नी के शब्दों में ‘नमक हराम’ के मामले में मैं उन लोगों से सहमत नहीं जो यह कहते हैं कि मेरे पति का अभिनय अधिक बेहतर था। मेरी दृष्टि में यदि भूमिकाएं बदल दी जाती तो अमिताभ राजेश खन्ना वाली भूमिका नहीं कर पाते और न राजेश अमिताभ की भूमिका निभा पाते।

कदाचित अमिताभ ने उस बात को दोबारा सोचा है और व्यक्तिगत जीवन में दोनों फिर दोस्त हो गये हैं। दोनों कुछ फिल्मों में एक साथ आ रहे हैं। यही बात धर्मेन्द्र अमिताभ के संबंध में है। ‘चुपके चुपके’ व ‘शोले’ में दोनों एक साथ आये हैं। पर इसके बावजूद यह बताने की आवश्यकता नहीं कि तीनों एक दूसरे को अपना प्रतिद्वंदी मानते हैं।

वस्तुत: अन्य क्षेत्रों की तरह ही फिल्मों में भी सफलता की सीढ़ी न तो भाग्य है न ज्योतिषियों के चक्कर, न खुशामद. अक्सर अवश्य व्यक्ति को आगे बढ़ने में मदद करते हैं। पर यह तभी संभव है, जब आप में प्रतिभा हो, धैर्य हो, लगन हो व कठिन परिश्रम करने की क्षमता हो। इसके बाद प्रचार, व्यवहार, इमेज बिल्डिंग का कोई महत्व नहीं रह जाता जो राजेश खन्ना के मामले में सिद्ध है। पुन: प्रतिभा जब महान होती है तो अल्पदोष छिपे रहते हैं। अमिताभ के मामले में यह भी सिद्ध हो गया है कि उच्च शिक्षा व अच्छे संपर्क ही व्यक्ति को सफल या महान नहीं बनाते पर संभवत: आगामी वर्ष इस बात का पूर्ण निपटारा कर देगा कि इस नयी में कौन किस स्थान पर है और किन गुणों या अवगुणों का उनके पतन या उत्थान में योगदान रहा है। यद्यपि इस समय यह नयी ही हमारे सामने है। पर यहां हम संजीव और ऋषि कपूर को न भुलायें कौन कह सकता है नयी में कभी इनमें से भी कोई अपना स्थान बनाने में सफल हो जायें।


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Mayapuri

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