शशि बाबा के लिए किसी भी अवार्ड से ज्यादा महत्वपूर्ण था ‘प्रेम पद्म भूषण’

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शशि कपूर को उनके ही पृथ्वी थियेटर में प्राप्त हुआ दादा साहब फालके एवार्ड वे विज्ञान भवन (नई दिल्ली) के स्टेज में जाकर, तीन मई को अपना दादा साहेब फालके एवार्ड ग्रहण कर सकते थे जैसे उनके पिता पृथ्वीराज कपूर और बड़े भाई राजकपूर ने किया था लेकिन संभवतः उनके लिये यह और भी ज्यादा खुशी की बात रही जब राजकपूर जी को तकलीफ हो गई थी तो राष्ट्रपति जी ने उन्हे उनके कैरियर का सब से बड़ा एवार्ड यूनियन मिनिस्टर श्री अरूण जेटली जो की यूनियन मिनिस्टर फार इफार्मेशन एन्ड ब्राॅडकास्टिंग भी है खुद पृथ्वी थियेटर जो कि मुबई का प्रसिद्ध लैंडमार्क भी है जिसे शशि कपूर और उनकी पत्नी जेनिफर ने अस्सी के शुरूआती दशक में बनवाया था) के हाथों यह प्रेस्टीजियस एवार्ड हासिल हुआ। इस अवसर पर वहां उपस्थित बाॅलिवुड के कई महान तथा शशि के साथी कलाकारों (जिनमें शायद वे सब से सर्वश्रेष्ठ अंतिम नायक है।) को देखकर शायद वे अपनी सारी शारीरिक तकलीफे भूल गये जिसके चलते वे दिल्ली नहीं जा पाये थे पृथ्वी थियेटर अब तक सैकड़ो तरह के उत्सव, महाउत्सवों का साक्षी रहा होगा लेकिन जो तीन मई को वहां हुआ वह शयद सबसे यादगार उत्सव रहेगा।

 

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सिनेमा जगत का सबसे प्यारा सबसे लाडला एक्टर तथा प्रोडयूसर को शायद अपने साथ के उन प्यारे लोगो जिनमें में भी हूं के साथ मिलने का मौका ना मिलता अगर वे दिल्ली जाकर यह एवार्ड लेते। उनका चेहरा खिल गया जब उन्होनें उन सारे अपनों के चेहरे देखे जो आज भी उन्हे उतना ही महत्वपूर्ण और प्यारा महसूस करा रहे थे जैसा पिछले साठ वर्षो से भी ज्यादा के उनके कैरियर काल में महसूस कराते थे, पहले बतौर बाल कलाकार, फिर सबसे पाॅपुलर नायकों मे से एक के रूप में, फिर पृथ्वी थियेटर के फांउडर के रूप में जिसे उन्होंने अपने महान पिता के यादों को अमर रखने के लिए बनाया था, और फिर बतौर अलग तरह की बेहतरीन फिल्मों के निर्माता के रूप में, तथा सबसे ऊपर कपूर खानदान के चमकते चिराग के रूप में, वाकई शशि कपूर ने जीवन सिनेमा को समर्पित किया है और अगर इनको दादा साहेब फालके पुरूस्कार से नवाजा ना जाता तो ना जाने कितना बड़ा अनर्थ होता।

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शशि जिन्होनें सवा सौ से ज्यादा ही फिल्में की है। आश्चर्यजनक रूप से उनके अभिनय के लिए ज्यादा एवार्डस नहीं मिले लेकिन शशि कभी एवार्डस के पीछे भागे भी नही। एक बार जब मुझे इस बारे में उनसे बात करने का मौका मिला था कि क्यों उन्हें बड़े एवार्डस नहीं मिले तो मुस्कुराकर उन्होंने जवाब दिया था, ‘अरे यार हम कहां इतने बड़े एक्टर है? हम जैसे एक्टर तो बस चलते रहे तो बहुत है। यह एवार्ड अपने बस की बात नहीं, हमें तो बस दर्शकों के प्यार की झफियां मिलती रहे जैसे बरसों से मिलती रही है, कई बार तो मैं अचंमित होता हूं कि क्या मैं उनके इतने प्यार के काबिल हूं या नहीं। अब बताओं क्या ज्यादा महत्वपूर्ण है एवार्ड या लोगों का जीवन भर का प्यार?’ पिछले कुछ महीनों से जब जब मैं शशि कपूर से उनके पृथ्वी थियेटर के अंदर बाहर उन्हे व्हीलचेअर पर बैठे हुये मिला तो मेरे लिये वह बड़ा दर्द भरा अनुभव रहा। वे मुझे ठीक से पहचान नहीं पा रहे थे जबकि मैं उन्हे याद दिलाने की जद्धोजहद में उनके कानों के पास चीख चीख कर अपना परिचय देता रहा था, अपने सबसे खूबसूरत मुस्कुराहत और बेहतरीन एक्टर से भी बढ़कर बेहतरीन इंसान के रूप में पहचाने जाने वाले शशि कपूर सब भूल रहे थे, यह चन्द महीने मेरे जैसे उन सब लोगो के लिये बहुत फ्रस्टेटिंग रहा जो उनके बेहद करीब थे। उनकी बीमारी इतनी जबर्दस्त है कि वे अपने खास लोगों को भी पहचानने में तकलीफ महसूस करते है।

 

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उनका वक्त अब ज्यादातर अस्पताल में, यह पृथ्वी थियेटर के अंदर या कंपाऊड में बीतता है। जहां कुछ मिनटों तक व्हीलचेअर में टहला कर उनके केअर टेकर उन्हें वापस उनके कमरे में ले जाते है और जाते जाते उस दिन के लिए, उस जगह को व अंतिम बार जी भरकर देख लेते है जिसे उन्होने अपनी पत्नी जेनिफर के साथ, हजारो नये सपनो से भरे कलाकारों के सपनो को साकार करने के लिए बनवाया था। लेकिन संड़े की उस सुबह को मैंने शशि कपूर को अपने साथ जुड़े और उन पर प्यार लुटाते उनके चाहने वालों को मिलकर प्रतिक्रिया जाहिर करते देखा, शायद वे अपने माता-पिता, भाई राज, शम्मी और सबसे ज्यादा पत्नी को मिस किया होगा।

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लेकिन वहां उपस्थित लोगों ने उन्हे यादो के दर्द में डूबने का मौका ही नही दिया और उन्हे गले लगाकर, आलिंगन करके, चूमकर उनसे बतियाने की कोशिश करते उन्हे व्यस्त रखा, उस रचते हुये इतिहास को यादगार बनाने के लिए जो यहां उपस्थित होकर इस इवेन्ट को महाइवेन्ट बना रहे थे वे थी दोनों भाभियां श्रीमती कृष्णा राज कपूर, श्रीमती नीला देवी कपूर, ऋषि कपूर तथा नीतू कपूर और उनके बेटे रणबीर कपूर, शशि की बेटी संजना जो साड़ी में गार्जियस लग रही थी उनके ग्रैडं चिल्ड्रन। साथ ये अपना प्यार और केयर जाहिर करते हुए अमिताभ बच्चन जिन्होने उनके साथ अठारह फिल्में की, अभिषेक बच्चन, अनुपम खेर, लिजेन्ड अभिनेत्रियां वहीदा रहमान, आशा पारेख, जीनत अमान, हेमा मालिनी, रेखा, शबाना आजमी, सुप्रिया पाठक, नफीसा अली, श्याम बेनेगल तथा कई अन्य मेहमान इन सबके पास शशि बाबा के साथ बिताए सुन्हरे पलों की बेशुमार यादें है ऐसे सुनहरे मौके पर , यह एवार्ड पाने वाले की मन की हालात और भावनाए आसानी से जानी जा सकती है लेकिन अपने जीवन के इस ऐतिहासिक खास दिन के बारे में पूरी फिल्म इंडस्ट्री के डार्लिंग (जिन्हे शशि कपूर ने भी बहुत प्यार और अपना पन दिया) शशि बाबा के मन की भावनाये कोई जान नहीं पा रहा था कितनी अफसोस की बात है कि वे उसी तरह खामोश थे, कुछ जाहिर नहीं कर पा रहे थे जैसे अपने घर में वेटेरन एक्टर प्राण साहब ने भी दादा साहब फालके एवार्ड ग्रहण करते हुये अपनी भावनाएं जाहिर नहीं कर पाये, उन्हें कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि वहां क्या चल रहा है और वे सिर्फ इधर उधर भावशून्य नजरो से देखते पूछते रहे ‘यह कौन लोग है यहां क्यों उतये है क्या हो रहा है?’

 

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शशि कपूर तो अपने जिगरी दोस्त प्राण साहब (जिनका निधन दादा साहब फालके पुरस्कार पाने के कुछ दिनों के बाद ही हो गया) की तरह यह प्रश्न भी नहीं पूछ पाये। यह सब देखते हुये हमारी गवर्नमेन्ट को गंभीरता से यह सेचना चाहिए कि सिनेमा जगत के सीनियर तथा योग्य हस्तियों को, वक्त रहते ही इस पुरस्कार से नवाजा जाये ताकि उन्हें इस उच्चतम एवार्ड पाने की खुशी महसूस हो सके वे अपनी खुशी जाहिर कर सके, बाद में जब इन खूबसूरत पलों को भोगने की ताकत ही ना रहे तब इन एवार्ड का मूल्य उनके लिए क्या रह जाता है, यह सब देखते हुए मेरे मन में असहज करने वाले यह प्रश्न उठ रहे थे कि ईश्वर जिंदगी क्यों उन हस्तियों के प्रति इतना उदार या फिर क्रूर हो सकता है जो हजारों वर्षो में कभी-कभी पैदा होते है और मैं अपनी भावनाओं को संतुष्ट करते हुये यह विश्वास करने पर मजबूर हो रहा हूं कि इस खास दिन में शशि कपूर ने सब से ज्यादा और हकीकत में जिन्हे मिस किया होगा वह है उनकी धर्मपत्नी जेनिफर जिन्हें वे अपने जीवन को दिशा देने वाली मानते रहे, जिन्होने हर मुश्किल दोराहे पर उन्हें सही दिशा दिखाई और जब उन्हें उनकी सब से ज्यादा जरूरत है उस वक्त वे करीब नहीं है।


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Mayapuri

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