हिंदी थिएटर की दुर्दषा के लिए दर्शक व कलाकार दोनों दोषी हैं।’’ -चंदन रॉय सान्याल

1 min


Chandan Roy Sanyal

वक्त वक्त की बात है।एक वक्त वह था, जब चंदन रॉय सान्याल इंग्लैंड में रहकर नाटकों में अभिनय कर रहे थे और उनकी तमन्ना वहीं पर रहकर नाटक करते रहने की थी। मगर विशाल भारद्वाज ने उन्हे बुलाकर अपनी फिल्म ‘‘कमीने’’ में मुख्य विलेन क्या बनाया, चंदन रॉय सान्याल बॉलीवुड के ही बनकर रहे गए। मगर थिएटर से उनका सम्बन्ध आज भी जारी है।

Chandan Roy Sanyal

गणित में ऑनर्स करने के बाद आपने अभिनय को कैरियर बनाया…यह माजरा क्या रहा?

-हम बंगाली मध्यमवर्गीय परिवार से हैं। बंगाल में संगीत का माहौल तो स्वाभाविक तौर पर रहता है। पर मेरे घर पर अभिनय का कोई माहौल नहीं था। हम बचपन से संगीत सुनते आए हैं। दुर्गा पूजा में हम नाटक में अभिनय कर लेते थे। इससे अधिक हमारे घर में नहीं होता था। मेरी शिक्षा दिल्ली में ही हुई। उसके बाद मेरी इच्छा आई आई टी में जाने की थी। वहां नहीं जा पाया, तब मैंने मैथ्स से ऑनर्स किया। उसके बाद मैं एमबीए करना चाहता था। पर अचानक मेरा पाला थिएटर से पड़ गया। थिएटर करते हुए मजा आने लगा, तो उस तरफ मेरी रूचि बढ़ती ही गयी। यह शौकिया ही शुरू हुआ था, धीरे धीरे यह मेरे प्रोफेशन में बदल गया। काम करता रहा और अब फिल्म व वेब सीरीज में अभिनय करते हुए लगभग चैदह पंद्रह वर्ष हो गए। इस वक्त लोग वेब सीरीज ‘‘आश्रम’’ में मेरे भोपा स्वामी के किरदार की तारीफ कर रहे हैं। अब ‘‘आश्रम’’ का दूसरा भाग 11 नवंबर से आने वाला है।

Chandan Roy Sanyal

आप अपने कुछ चर्चित नाटकों के बारे में बताएंगे?

-मोहन राकेष का ‘‘आषाढ़ का एक दिन’’, विजय तेंडुलकर का ‘‘सखाराम बाइंडर’’,‘राइज एंड फाल, ‘शेक्सपिअर’, ,‘मुद्राराक्षस’, ‘चरणदास चोर’,‘अजगर वजाहत का ‘‘जिस लाहौर नहीं देखा, वो जन्मा ही नही’’, वेटिंग फार गोडो’ के अलावा कुछ संस्कृत के नाटक भी किए हैं। जर्मन लेखक मार्कस फ्रिस्क का नाटक ‘‘अंडोरा’’ किया।

इसके अलावा मुंबई में मेरी अपनी नाटक कंपनी ‘‘प्रोसेनियम थिएटर’’ कंपनी है। जिसके तहत हम नाटक करने के अलावा लघु फिल्में बनाते हैं। अभी मैने एक नया नाटक तैयार किया है- ‘‘इन बिटवीन’’. कुछ नाटकों के शो मुंबई के ‘पृथ्वी थिएटर’ व ‘एनसीपीए’ पर किए है। बंगलौर, मद्रास, दिल्ली, कलकत्ता में कई नाटकों के षो किए। इसके अलावा कुछ माह तक मै इंग्लैंड मे था। वहां पर मैंने ‘‘रॉयल शेक्सपिअर कंपनी’’ के साथ ‘ए मिडनाइट समर ड्रीम’ नाटक किया। इस नाटक के शो करने के लिए अमरीका, आस्ट्रेलिया, इटली, स्काटलैंड सहित पूरे विश्व में घूमा।

Chandan Roy Sanyal

भारत और इंग्लैड दोनो जगह थिएटर का जो कल्चर है, उसमें कितना अंतर पाया?

-यूरोप, अमरीका सहित दूसरे देशों में थिएटर कल्चर को सिनेमा से उपर माना जाता है। भारत में ठीक उसके विपरीत है। इंग्लैंड में जब मैं थिएटर किया करता था, तो मेरे फैनमेल्स आते थे। वहां पर सिनेमा जगत के कई बड़े बड़े कलाकार मेरा नाटक देखने आते थे। जिनमें जूडी डेंच, मेकेलीन, जेरीयल लेयान सहित कई नाम शामिल हैं। यह सभी नाटक कार ही हैं। आस्ट्रेलिया हो या इंग्लैंड, इन देशों में नाटक का महत्व सिनेमा से कई गुना ज्यादा है। वहां पर नाटक में अभिनय करना और नाटक देखना, कलाकार के अभिनय के प्रति गंभीर होने की पहचान भी है। वहां पर थिएटर अति गंभीर क्राफ्ट है। मेरी योजना तो इंग्लैंड में ही रहकर थिएटर करने की थी। क्योंकि वहां पर नाटक करने में मुझे बड़ा मजा आ रहा था।

आप लंबे समय तक रंगमंच से जुड़े रहे है। अभी भी नाटक करते रहते हैं।पर भारत में थिएटर को निम्न स्तर का क्यों माना जा रहा है? इसके लिए कहाँ किस की गलती है?

-इसके लिए दर्शक व कलाकार दोनों दोषी हैं। यहां हर कलाकार का सपना खुद को सिनेमा या बड़े परदे पर देखने की होती है। हर कलाकार की महत्वाकांशा होती है कि वह सपनों की दुनिया में मशहूर हो जाए। बहुत बड़ा अभिनेता बन जाउं। सुपर स्टार बन जाउं। ढेर सारा धन कमाउं। लोग मेरे पीछे दौड़ें. सभी को अमिताभ बच्चन या शाहरुख खान या राजेश खन्ना ही बनना है। सभी को बहुत बड़ा सितारा बनना है। मुझे ऐसे कलाकार नहीं मिले, जिसे सिर्फ नाटको की दुनिया में रहकर नाटक ही करना हो। वैसे कुछ लोग हैं, जो कि सिर्फ नाटक ही कर रहे हैं या करते आए हैं या करते थे।

Chandan Roy Sanyal

मसलन-हबीब तनवीर, वीबी कारंथ, प्रसन्ना, गिरीष कर्नाड, इब्राहिम अलका जी, रतन ष्याम..यह वह लोग हैं, जो नाटक के लिए लड़ते रहे। पर अब नए कलाकार या मेरे हमसमकक्ष कलाकार चाहते हैं कि थिएटर से जुड़कर थोड़ा सा अभिनय सीख लें, फिर सिनेमा में ही व्यस्त रहें। इसकी एक वजह यह भी है कि भारत में नाटकों में कोई पैसा लगाना नहीं चाहता। नाटकों से धन नही कमाया जा सकता। लोग नाटक देखना चाहते हैं, मगर नाटकों के शो के लिए थिएटर ही नही है। ले दे कर मुंबई में ‘पृथ्वी थिएटर’ और ‘एनसीपीए’ ही है। यहां पर अपने नाटक के षो करने के लिए एक से दो वर्ष के लिए कतार में खड़ा रहना पड़ता है। जर्मनी, इंग्लैड,फ्रांस,इटली, आस्ट्रेलिया, जैसे देशॉन के हर शहर में आर्ट कौंसिल है। इन देशों की सरकारें महज नाटक करने व उसके रखरखाव के लिए काफी धन मुहैय्या कराती हैं।

Chandan Roy Sanyal

हमारे यहां कोई एक अच्छा रैपेटरी नही है। मसलन- इंग्लैंड में शेक्सपिअर कंपनी है, जहां पर शेक्सपिअर के नाटक होते रहते हैं। वहां पर शेक्सपिअर के लिखे नाटकों की लोग पूजा करते हैं। वहां पर नाटक के स्कूल हैं।वहां पर नाटक देखने इतने दर्शक आते हैं कि कलाकार नाटकों में अभिनय कर कमा खा सकता है। भारत में थिएटर को महज समय बिताने का साधन माना जाता है। थोड़ा सा नाटक कर लिया,जिसे देखने के लिए उसके कुछ रिश्तेदार आ गए,उन्होने ताली बजा दी, कलाकार ने खुद को महान कलाकार मान लिया और काम खत्म। अपनी गली या मुहल्ले या नुक्कड़ पर शोहरत मिल गयी, तो सब सही हो गया। उसके बाद किसी कंपनी में नौकरी कर ली। कलाकार थिएटर को सिनेमा में पहुँचने की सीढ़ी मानकर चलता है।

भारत में सरकार भी थिएटर के प्रति सदैव उदासीन रही है?

-जी हां! वास्तव में हमारे यहां नाटक में अभिनय करना यानी कि भांड़गीरी है। हमारी सरकार तो नाटक ही नही सिनेमा के प्रति भी उदासीन है। जबकि नाटक एक बहुत ही मजेदार कला है। यदि थोड़ी सी कोशिश की जाए, रेपेटरी बनायी जाए,ऐसे थिएटर बनाए जाएं, जहाँ दर्शक आसानी से पहुँच सके,तो नाटक देखने का बड़ा मजा है। हमारे देश में दिल्ली में एनएसडी के पास श्रीराम कला केंद्र जैसी एक दो रेपेटरी ही हैं। बड़ी बड़ी कंपनियो व उद्योगपतियों को नाटकों में पैसा लगाना चाहिए.थिएटर बनने चाहिए,यदि कोई शुरू कर दे, तो नाटक का कल्चर बहुत बढ़िया है। देखिए, महाराष्ट् में ‘तमाशा शैली है। बंगाल मे ‘जत्रा’ है, ग्रामीण इलाकों में नाटकों की अलग शेली है। फोक गीत लिखने व गाने वाले लोग हैं। जत्रा या तमाशा देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। यदि नाटकों को थोड़ा सहयोग मिल जाए,तो यह बहुत बड़ा कल्चर बनकर उभर सकता है,फिर लोग सिनेमा की बनिस्बत नाटकों को ही अहमियत देने लगेंगें।

अभी कोरोना की वजह से सिनेमाघर बंद चल रहे हैं.पूरी दुनिया बदल रही है। अब डिजिटल का जमाना ही आगे बढ़ेगा। यदि ही हालात रहे तो लोग अब सिनेमाघर में फिल्म देखने जल्दी नही जाएंगे। लोग अपने फोन पर ही फिल्में देखना चाहेंगे। इससे नाटक काफी पीछे रह जाएगा।

सरकारी संस्था‘संगीत नाटक अकादमी’’ में भी सुधार करने की जरुरत है?

–संगीत नाटक अकादमी के संदर्भ में मुझे ज्यादा जानकारी नही है कि इस वक्त वह क्या कर रही है। मुझे सिर्फ इतना ही पता है कि वह कलाकारों के प्रोत्साहन के लिए पुरस्कार वगैरह देती है।पर बहुत कुछ किया जाना चाहिए। कलाकार को स्कोलरशिप या मासिक रूप से कुछ धनराशि दिए जाने की जरुरत है। कुछ काम तो हुआ है,पर बहुत कम हुआ है।

Chandan Roy Sanyal

अब देखिए,हमारे देश में क्रिकेट पर कितना पैसा लगाया जाता है। ‘आईपीएल’ होने लगा है। पहले सिर्फ पांच दिन का क्रिकेट होता था। कबड्डी पर भी अब काफी पैसा लगाया जा रहा है। अब तो लोग कुश्ती और खो खो जैसे खेल में भी पैसा लगा रहे हैं। मगर नाटक की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।कुष्ती के बड़े बड़े टुर्नामेंट हो रहे हैं। जहाँ बड़ी बड़ी कंपनियां स्पोंसर कर रही हैं। मगर हम यह भूल गए कि नाटक में मजा, ड्रामा बहुत कुछ है, इसे दर्शकों के साथ जोड़ा जा सकता है।

क्या आप अभी भी नाटक कर रहे हैं?

-मैने पांच छह वर्ष पहले एक नाटक ‘‘वेटिंग फार गोडो’’ किया था।मैने अभी दो नाटक तैयार किए हैं-एक का नाम है-‘‘दम बेटर’’ और दूसरे का नाम है-‘‘इन बिटवीन’’. हालात सुधरने का इंतजार है। नाटक ‘इन बिटवीन’ को मैने लाइव फिल्म की तरह तैयार किया है, मैं चाहता हूं कि जिस वक्त इसका फिल्मांकन हो रहा हो, उस वक्त इसे दर्षक भी देख रहे हों। इसे फिल्म की तरह वन टेक में फिल्माउंगा। मैने तीस चालिस दर्षकों के बीच इसका प्रयोगात्मक षो कर चुका हूँ, इन सभी दर्शकों को यह नाटक बहुत पसंद आया। उससे पहले डेढ़ माह तक मैने इसका रिहर्सल किया था।

नाटक ‘‘इन बिटवीन’’की विषय वस्तु क्या है?

-यह एक कलाकार/एक्टर की दुनिया के बारे में है। एक कलाकार स्क्रिप्ट मिलने पर ऑडिशन रूम में जाता है, तो चंद मिनटों में किस तरह वह उस किरदार को तैयार करने के लिए जद्दोजेहाद करता है। दर्शकों ने कलाकार को और कलाकार को फिल्म तथा नाटक में देखा है। लेकिन कलाकार की जिंदगी में क्या गुजरता है, यह हमारा यह नाटक बताएगा।

Chandan Roy Sanyal

हिंदी नाटकों की बनिस्बत गुजराती या मराठी भाषा के नाटकों का विशाल दर्शक वर्ग है। इन भाषाओं के नाटकों में अभिनय कर कलाकार आराम से जीवन यापन कर पाता है। यह स्थिति क्यों है?

-मूल वजह तो दर्शक ही है। मराठी भाषी या बंगला या गुजराती भाषी दर्शक नाटक देखने में रूचि रखता है और इसी के चलते इन भाषाओं में नाटक ज्यादा समृद्ध है। मैने मुंबई में देखा है कि मराठी या गुजराती नाटको के एक ही दिन में कई शो होते हैं। टिकटें भी काफी महंगी बिकती हैं, फिर भी थिएटर हाउसफुल रहते हैं। मैं कई मराठी कलाकारों को जानता हूं, जो कि अपने नाटकों के शो के लिए एक शहर से दूसरे शहर की यात्राएं करते रहते हैं। उन्हे सिनेमा में जाने की इच्छा नहीं होती. वह थिएटर से ही अच्छी खासी रकम भी कमाते हैं। हिंदी में साहित्य काफी मौजूद है, मगर हिंदी नाटकों के दर्शक कम हैं।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये