मूवी रिव्यू: बेमतलब की कॉमेडी और जबरदस्ती थोपा गया संदेश, फिर भी ‘ऑल इज़ वैल’

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‘ओह माई गॉड’ जैसी फिल्म के निर्देशक उमेश शुक्ला इस बार फिल्म ऑल इज़ वैल’ में पूरी तरह चूक गये, क्योंकि जो वे बताना चाहते थे वो उन्होंने फिल्म के एंड में बताया। जब तक दर्शक पूरी तरह फिल्म से ऊब चुके होते हैं ।

कहानी

ऋषि कपूर एक न चलने वाली बेकरी के मालिक हैं। शादी के बाद से ही उनके और उनकी पत्नि सुप्रिया पाठक के विचारों में मतभेद होने की वजह से हर वक्त घर में क्लेश रहता हैं। इसका सीधा असर उनके इकलौते बेटे अभिषेक बच्चन पर पड़ता है।
ऋषि चाहते हैं कि उनका बेटा भी उनके साथ उनकी बेकरी में हाथ बंटाये जबकि अभिषेक को उस काम से चिढ़ है। वो एक म्यूजिशियन बनना चाहता है। इसीलिये वो देश छोड़ ऑस्ट्रेलिया चला जाता है। वहां वो अपना म्यूजिशियन बैंड बनाना चाहता है। वहीं उसकी मुलाकात असिन से होती हैं जो उसे प्यार करने लगती है और उससे शादी करना चाहती हैं लेकिन नकारात्मक सोच वाला अभिषेक शादी में बिलीव ही नहीं करता क्योंकि अपने मां बाप के झगड़ों को देखकर उसका शादी से विश्वास उठ चुका है। जबकि असिन उसे हमेशा समझाती हैं कि वो पॉजिटिव भी सोचना शुरू करे।

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एक दिन उसे इंडिया से बुलावा आता हैं उधर असिन के परिवार वालों ने भी उसे शादी के लिये बुलाया है। यहां आकर उसे पता चलता है कि उसे झूठ बोलकर बुलाया गया है दरअसल उसके पिता को एक ब्याजखोर मौहम्मद जिशान अयूब का बीस लाख रूपया देना है। इसलिये वो उसका घर और बेकरी अपने नाम करवाना चाहता है। अभिषेक को ये भी पता चलता है कि उसकी मां एक आश्रम में है क्योंकि उन्हें अलमाइजर नामक बीमारी हैं जिसमें इंसान धीरे धीरे सब भूल जाता है। ऋषि उसे बताते हैं कि उसकी मां को उस पर कभी विश्वास नहीं रहा इसलिये उसने अपने जेवर अपने भाई के पास रखे हुये है सो उन गहनों को बेचकर वे जिशान का पैसा चुकता करने की गरज से वहां से भाग जाते हैं, जिशान उनके पीछे तथा जिशान के पीछे पुलिस। इस चक्कर में असिन भी उनके साथ फंस जाती है। वे मामा के घर पहुंचते हैं लेकिन उस वक्त तक उसका मामा उन्हें कुछ बिना बताये मर जाता है लेकिन उसी घर का एक बच्चा अभिषेक के हाथ में एक चाबी देते हुये कहता है कि ये बैंक के लाकर की चॉबी है जिसमें गहने रखे हैं लेकिन उसी दौरान अभिषेक को ये भी पता चलता है कि उसका बाप तो उसकी मां को तलाक दे चुका है।

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लिहाजा उसकी मां की हालत लॉकर खोलने लायक नहीं, और किसी दूसरे को वो लॉकर खोलने का अधिकार नहीं । उधर असिन भी अभिषेक से ना उम्मीद हो अपने घर चली जाती हैं जंहा उसकी शादी होने वाली है। एक दिन ऋषि अभिषेक को सारी सच्चाई बताता हैं तो अभिषेक को लगता हैं कि वो खुद शुरू से  मतलबी और गलत था जबकि उसका बाप सही था। इसलिये वो अपने मां बाप के लिये ऐसा कुछ करता हैं जिसके बाद उसके पिता को कहना पड़ता है कि वो उनके लिये श्रवण कुमार से कम नहीं । जैसा उनके बेटे ने उनके साथ किया हैं ऐसा ही बेटा हर कोई मां बाप चाहते हैं । बाद में उसे असिन भी मिल जाती है ।

निर्देशन

फिल्म की शुरूआत कहानी के टुकड़े दिखाते हुये होती है। इसके अलावा निर्देशक हर बार किसी भी बात का आखिरी सिरा पकड़ते हुये उसे पहले सिरे से मिलाने की कोशिश करता रहता है । इस चक्कर में वो कुछ भी क्लीयर नहीं कर पाता। और जब क्लीयर करता हैं उस वक्त तक काफी देर हो चुकी होती है । क्योंकि जिस बात पर पूरी कहानी टिकी हैं उसे सबसे बाद में दिखाया जाता हैं। इसलिये कहानी का पूरा निचौड़ क्लाईमैक्स में है। यानि जो बात पूरी फिल्म में ढंग से नहीं बताई जा सकी वो महज लास्ट में दस मिनट में बता दी जाती है। इसीलिये दर्शक फिल्म से अपने आपको जोड़ ही नहीं पाता। मोहम्मद जिशान से दर्शको को हंसाने के लिये ऐसी हरकतें करवायी गई हैं कि हंसने की बजाये खीज पैदा होती है ।

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अभिनय

अभिनय की बात की जाये तो एक भी आर्टिस्ट अपनी भूमिका के तहत प्रभाव नहीं डाल पाता। इसीलिये अभिषेक या असिन जहां साधारण रहे वहीं ऋषि कूपर भी अपने आपको दोहराते नजर आते हैं । सुप्रिया पाठक जैसी अभिनेत्री को वेस्ट किया गया है। मौहम्मद जिशान हंसाने के चक्कर में विलन कम जोकर ज्यादा लगते हैं।

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संगीत

फिल्म में हिमेश रेशमियां,अमाल मलिक, मिथुन, मीत ब्रदर्स तथा आंनद मिलिंद मिलाकर पांच म्यूजिक कंपोजर हैं बावजूद इसके फिल्म में उनमें से एक का भी कोई खास योगदान नहीं दिखाई दिया।

क्यों देखें

अगर बेमतलब की कॉमेडी और लगभग थोपे गये संदेश झेल सकते है तो आपका फिल्म देखने के लिये स्वागत है ।

 


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Mayapuri

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