मूवी रिव्यू: हल्की फुल्की साधारण सी हास्य फिल्म ‘बैंगिस्तान’

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रेटिंग **

करण अंशुमन द्वारा निर्देशित फिल्म ‘ बैंगिस्तान’ के निर्माता हैं फरहान अख़्तर तथा रितेश साधवानी। फिल्म में नई बात ये है कि इस बार मुस्लिम टेररिज्म के साथ हिन्दू आंतकवाद भी दिखाया गया है। हास्यप्रद ढ़ंग से इस फिल्म में भी आंतकवाद के खिलाफ बात की गई है। ऐसी बातें जो इससे पहले दर्जनों फिल्मों में देखी जा चुकी है ।

कहानी

फिल्म का कहानी एक काल्पनिक देश बैंगिस्तान पर आधारित है। जहां एक मौलवी और एक पंडित देश में आतंकवाद के खिलाफ, देश की एकता की बात करते है । पोलेंड में एक सम्मेलन होने जा रहा हैं जिसमें पूरी दुनिया से अलग अलग धर्म के लोग शिरकत करने वाले हैं। उस सम्मेलन में ये दोनों अपना पक्ष रखने की बात करते हैं। लेकिन इस सम्मेलन को खारिज करने के लिये बैंगिस्तान के मुस्लिम आतंकवादी सरगना, रितेश देशमुख यानि आफिज बिन अली का ब्रेनवॉश कर उसे एक सुसाइड बम बनाकर भेजने का प्लान बनाते हैं । इसी तरह हिन्दू संगठन मां का दल नामक आतंकवादी दल का सरगना भी एक मस्तमौला शख्स प्रवीण श्रीवास्तव यानि पुलकित सम्राट को सुसाइट बम बनाकर भेजता है। जो कि दल के सरगना को अपना गुरू मानता हैं। दोनों ही अपनी असलियत छुपाने के लिये अपना नाम और धर्म बदल लेते हैं । रितेश ईश्वर प्रसाद बन जाता हैं और पुलकित अल्लाह रख्खा। असफल होने के बाद रितेश को मारने की कोशिश की जाती है तो उसे समझ आता हैं कि उसे यूज किया जा रहा था। इसके बाद वो पुलकित को भी समझाता है। बाद में जब रितेश का साथी आर्य बब्बर  सुसाइड बम बनने की कोशिश करता है तो रितेश उसे समझाता है। इसके बाद दोनों आतंकियों का मिशन फेल कर वहां आये हजारों लोगों की जान बचाते हैं ।

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निर्देशक

करण अंशुमन इससे पहले फिल्म समीक्षा लिखते थे। ये उनकी पहली फिल्म है जिसमें उन्होंने आतंकवाद को हास्य में पिरोकर दर्शको को हंसते हंसाते एक ऐसा संदेश देने की कोशिश की हैं जो इससे पहले कितनी ही फिल्मों में दिखाया जा चुका है। फिल्म के किरदार आतंकवादी कम जोकर ज्यादा लगते हैं। कथा पटकथा भी साधारण है। क्लाइमेक्स में काफी लंबा भाषण हैं जिसने सुनकर चिढ़ होती है ।

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अभिनय

रितेश देशमुख इस बार सीरियस रोल में हैं वहीं पुलकित सम्राट एक मस्तमौला युवक के तौर अच्छा काम कर गए। चंदनराय सान्याल पोलेंड में टेक्सी ड्राइवर की साधारण सी भूमिका कुछ खास नहीं कर पाते । बाकी आर्टिस्ट किरदार कम जोकर ज्यादा लगते हैं। फिल्म का संगीत भी साधारण हैं ।

क्यों देखें

सॉरी। फिल्म देखने के लिये एक भी ऐसी वजह नही है जिसके बूते दर्शकों को फिल्म देखने के लिये अप्रोच किया जा सके ।

 


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Mayapuri

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