मूवी रिव्यू: फिल्म ‘बॉम्बे वेलवेट’ छटे दशक के बॉम्बे का सजीव चित्रण

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अनुराग कश्यप सरल से कथानक को जटिल बनाने में माहिर है । उनकी हालिया फिल्म ‘ बांबे वेलवेट’ मुबंई की छटे दशक पर आधारित है जब आजादी के बाद मुबंई नई करवटे ले रहा था । उस दौरान नेता,बिल्डर, बिजनिसमैन तथा अंडरवर्ल्ड मुबंई को अपने मुताबिक ढालने और उसके द्वारा अकूत पैसा कमाने की साजिश में लगे हुए थे और उनका षिकार थे बंद होती मिलों के मिल मजदूर तथा महत्वपूर्ण स्थानों की जमीन ।

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कहानी
आजादी के बाद बलराज यानि रणबीर कपूर अपनी मुंहू बोली मां के साथ तथा दसीका हम उम्र चिमन पाकिस्तान के मुल्तान और सियालकोट से बांबे आते हैं । बलराज की मां बाद में वेश्वावृति करने लगती है । बलराज और चिमन बांबे में कुछ बड़ा करने वाले है । एक दिन बलराज की मां उसका ढेर सारा सोना लेकर भाग जाती है । उसी दौरान उन्हें कैजाद खंबाटा यानि करण जोहर नामक एक बिजनिसमैन मिलता है उसे बलराज में कुछ करने की तड़प दिखाई देती हैं इसलिये उसे वा अपने काम का बंदा लगता है लिहाजा वो बलराज को बड़ा बनाने के सपने दिखाता है। लेकिन बलराज कैजाद से सौदा करता है कि अपने इस्तेमाल के बदले उसे हिस्सा चाहिये । कैजाद पहले उसे अपने क्लब बांबे वेलवेट का मैनेजर बनाकर उसकी एक हैसियत बनाता है । बाद में उसे नया नाम जाॅनी बलराज देकर उस के जरिये नेता और कई महत्वपूर्ण लोगों को या तो मरवा देता है या फिर उन्हें ब्लैकमेल करने का इंतजाम करवाता है । इन्ही में होम मिनिस्टर के कैजाद की पत्नि के साथ कुछ फोटोग्राफ हैं ।

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अनुष्का शर्मा एक गोवानी है जो बचपन में ही एक गोवानी के हाथ लग गई थी जिसका इस्तेमाल उसने उसकी जवानी तक किया लेकिन एक दिन वो गोवा में उसके चुंगल से निकल भाग कर बांबे आ जाती है और पारसी संपादक मनीश चैधरी के लिये काम करना शुरू कर देती है । मनीष उसे बलराज को फंसाकर मंत्री के नगेटिव लाने के लिये बांबे वेलवेट क्लब भेजता है । लेकिन अनुश्का धीरे धीरे बलराज से प्यार करने लगती है ।एक दिन जब बलराज को पता चलता है कि कैजाद अपने नेताओं, बिजनिसमैनों मिल मालिकों के साथ बांबे की कीमती जमीनों को सस्ते दोमों में खरीदने का प्लान बना रहा है तो बलराज केजाद से अपने हिस्से की बात करता है क्योंकि उसका सपना है कि उसकी भी जाॅनी बलराज नामक टावर हो ।यहां केजाद का असली चेहरा सामने आता हे तो बलराज बागी बन अपने और अनुष्का के मारे जाने से पहले केजाद का सफाया करने में कामयाब हो जाता है ।

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फिल्म
बांबे वेलवेट उपन्यास मुबंई फेबल्स तथा एक अंग्रेजी फिल्म से प्रेरित है । कहानी 1949 से षुरू हो 1960 के दशक की हैं जब मुबंई महानगर बनने के दौर से गुजर रही थी इसका फायदा उठाते हुये बंद मिलों के मलिक मिलों की जमीनों को मोटे दोमों में बेचना चाहते थे । यहां बिल्डर, बिजनिसमैन, अखबार का एडिटर और राजनीति के बडे नेता भी मोटी कमाई करने की फिराक में थे । उस दौर को फिल्म में प्रभ्ससवशाली ढंग से दर्षाया गया है ।

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अभिनय
रणबीर कपूर कितना बड़ा अभिनेता है, इससे पहले भी वो अपनी फिल्मों में बेहतर तरीके से बता चुका है ।लेकिन यहां उसने पहली बार उसने एक जिद्दी, उग्र, गुस्से वाले तथा जुनूनी गैंग्सटर की भूमिका में पूरी तरह उतर कर दिखाया है । अनुष्का ने साठ के दशक की सिंगर की भूमिका को लेकर अच्छी खासी मेहनत की है इस चक्कर में कहीं कहीं वो अपने आपको ओवर होन से नहीं बचा पाती। मनीष चैधरी, सिद्धार्थ बसू,के के मेनन, सत्यजीत मिश्रा,मुकेश छाबड़ा तथा विवान शाह आदि कलाकारों ने बढिया अभिव्यक्ति दीे हैं । एक सिंगर के गेस्ट रोल में रवीना टंडन भी दिखाई देती है । लेकिन फिल्म का सरप्राइज पैकेज है करण जोहर । उन्होंने पहली दफा एक नगेटिव भूमिका ऐसे अनुभवी अभिनेता की तरह निभाई है कि उन्हें देख कर धुंरधर अभिनेता शरमा जाये ।

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फिल्म का लुक
सन साठ के बांबे को दिखाने के लिये डिजाइनर सोनल सांवत तथा कास्ट्यूम डिजाइनर निहारिका खान ने वेष भूशा और अन्य साधनों के द्वारा उस काल को जैसे जिंदा कर दिखाया है । उस दौर के बांबे के आदमी उनका लुक, सड़को, ट्राम तथा अन्य वाहन और इमारतों तक पर पूरा ध्यान दिया गया है ।खासकर रणबीर कपूर, अनुष्का शर्मा और करण जोहर इनका हेयर स्टाइल मूछें तथा पोशाक उसी दौर की है। लिहाजा ये तीनो पूरी तरह से उसी दौर के लगते हैं । इनके अलावा सहयोगी कलाकारों के लुक और वेशभूषा पर भी पूरा ध्यान दिया गया है ।

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निर्देशन
अनुराग कश्यप का अपना एक अलग अंदाज है । ये दूसरी बात है कि उनके अंदाज में बनी फिल्में एक खास वर्ग की ही समझ में आती है आम दर्शक उनसे दूर ही रहता है । बेशक इस बार उन्होंने एक मंहगी फिल्म बनाई है और जो वे दिखाना चाहते थे वो सब कुछ दिखाया भी है लेकिन उसे इतना जटिल कर दिया है कि इस बार भी आम दर्शक इस फिल्म से दूर ही रहेगा ।फिल्म की कास्टिंग अच्छी है । जंहा तक रणबीर कपूर की बात की जाये तो वो एक ऐसा अभिनेता है जो हर किरदार में ढल जाता है यहां भी अनुराग ने उससे बेहतरीन काम करवाया है लेकिन फाइट के दृश्यों में वो नकली लगता है । इसी तरह अनुष्का भी कभी कभी गाते हुए चेहरे से एक्टिंग करती भद्दी लगती है लेकिन अनुराग का सारा ध्यान उस दौर पर रहा इसलिये उसने इन छोटी मोटी बातों पर ध्यान नही दिया । इसके अलावा उन्होंने इस फिल्म से करण जोहर के रूप में एक बेहतरीन अभिनेता बाॅलीवुड को दिया है । फिल्म कांट छांट के बाद भी ढ़ाई घंटे की है ।

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म्युजिक
अमित त्रिवेदी ने बेशक उस दौर के संगीत के लिये मेहनत की है । लेकिन कई जगह सिंगर इतनी ओवर हो जाती है कि गाने उस दौर के गानों की मिमक्रि लगने लगते हैं ।

क्यों देखें
अगर आप उस दौर के बांबे को बनते बदलते देखना चाहते हैं या अनुराग कश्यप के अंदाज की फिल्में पंसद करते हैं तो ये फिल्म जरूर देख सकते हैं । लेकिन गर्ल फ्रेंड के साथ, परिवार के साथ नहीं ।


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Mayapuri

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