मूवी रिव्यू: फिल्म‘ ब्योमकेश बक्षी’ अभिनय से बेहतर वास्तविकता का समावेश

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जब किसी साहित्यक उपन्यास या किताब पर फिल्म बनायी गई वो प्रयोग जटिल या असफल साबित हुआ। दिवाकर बनर्जी ने फिल्म ‘ब्योमकेश बक्षी’ में अभी तक दिखाये जाते रहे ब्योमकेश बक्षीयों से अपने ब्योमकेश बक्षी को अलग दिखाने की कोशिश की जिसमें वे एक हद तक कामयाब भी रहे हैं ।फिल्म दूसरे विश्वयुद्ध के वर्णन से शुरू होती है। जिसमें जापानी फोज अंग्रेजों पर आक्रमण करने के लिये कोलकाता पर चढ़ाई करने जा रही है। एक तरफ चीनी माफिया की कार गुजारिया भी जारी हैं । इनके बीच में कोलकाता पिस रहा है ।

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ब्योमकेश बक्षी को परिवार का सानिध्य नहीं मिला। इसलिये वो सत्यान्वेशी बन जाता है। उसका एक संवाद है कि गांधी जी जेल में रहे या बाहर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसी दौरान उससे एक सज्जन आनंद तिवारी यानि अजीत बंद्योपाध्याय अपने पिता भूवन के गायब हो जाने के बाद उन्हें ढूंढने के लिये सलाह लेने आते हैं। ब्योमकेश बक्षी पहले तो उन्हें उनके पिता के गायब होने के चार विकल्प बताता है। लेकिन बाद में बाकायदा उनकी खोज करने के लिये तैयार हो जाता है इस खोज में वो डा. अनुकूल गुहा से मिलता जंहा अजीत के पिता भुवन रहा करते थे। और फिर वो उन्हीं की लॉज में रहने लगता है बाद मे अजीत को भी बुला लेता है । इस गुत्थी को सुलझाते हुये ब्योमकेश को चीनी माफिया तथा क्रांतिकारियों के साथ भी दो चार होना पड़ता है । लेकिन गुत्थी सुलझने के बजाए और ज्यादा उलझती चली जाती हैं इस बीच एक के बाद एक खून होते रहते है। लेकिन अंत में ब्योमकेश अपनी सूझबूझ और समझदारी से सारे रहस्यों पर से पर्दा उठाता है तो एक के बाद एक कितने ही रहस्य बाहर निकल कर आते हैं ।

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शरदेंदू बनर्जी की जासूसी उपन्यास पर आधारित ब्योमकेश बक्षी पर इससे पहले कितनी फिल्में और नाटक हो चुके हैं । हिन्दी में एक धारावाहिक ब्योमकेश कक्षी भी बना था जिसमें रजत कपूर ने ब्योमकेश बक्षी को बहुत ही सुंदरता से निभाया था । लिहाजा रजत से सुशांत लुक ओर एक्टिंग में बहुत पीछे हैं तथा ब्योमकेश आधारित एक बंगला फिल्म ‘सत्यान्वेशी’में लेखक निर्देषक सुजॉय घोष भी ब्योमकेश की भूमिका निभा चुके हैं । शरदेंदू ने ब्योमकेश पर करीब बत्तीस कहानीयां लिखी थी । दिवाकर ने उन सभी के अधिकार खरीद कर उन सभी से कुछ न कुछ लेकर ये फिल्म की कहानी लिखी । फिल्म में 1932 से लेकर 1943 तक के कोलकाता का चित्रण अतुलनीय हैं । इसके लिये फिल्म के प्रोडक्शन डिजाइनर वंदना कटारिया को शाबासी । इसके बाद कोलकाता को सुरूचीपूर्ण तरीके से कैमरे में कैद करने के लिये निकोस एन्ड्रीटसेकिस ने कमाल दिखाया है । कलाकारों के लुक ओर वेशभूषा पर भी अच्छी खासी मेहनत और रिशर्च दिखाई देता है। लेकिन जंहा तक अभिनय की बात आती है तो सुशांत सिंह राजपूत अभिनय से ज्यादा अपने लुक में प्रभावशाली लगते हैं । उनके अलावा स्वास्तिका मुखर्जी अंगूरी देवी के रोल में कही भी प्रभावित नहीं कर पाती जबकि दिव्या मेनन अपनी छोटी सी भूमिका में सहज दिखाई दी ।

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इनके अलावा आनंद तिवारी ने अजीत की भूमिका को ईमानदारी से निभाया है लेकिन डा. अनुकूल गुहा की जटिल भूमिका को नीरज कबी ने अपनी योग्यता से बढ़कर जीया है । सहयोगी भूमिकाओं में मियांग चैंग, शिवम तथा अनिंदय बनर्जी की भूमिकायें भी उल्लेखनीय रहीं । फिर भी अभिनय से कहीं ज्यादा अच्छा फिल्म में वास्तविकता का समावेश है । फिल्म के संगीत की बात की जाये तो फिल्म में आठ संगीतकारों ने चार गीतकारों के शब्दों को करीब सोलह गायक गायिकाओं की आवाज में कंपोज किया है । लेकिन सभी गीत पार्श्व में ही सुने जा सकते हैं । फिल्म ब्योमकेश को अलग दिखाने के लिये कुछ नई बातों में एक नई बात ये है कि ब्योमकेश बक्षी मुगेंर भागलपुर से कोलकाता आया था यानि वो बंगाली नहीं था। फिल्म में उसे भोजपुरी बोलते भी दिखाया है हालांकि मुगेंर भागलपुर में भोजपुरी भाषा नहीं बोली जाती ।अब अगर फिल्म की बात की जाये तो ये फिल्म उन दर्शकों को ज्यादा पंसद आ सकती है जो या तो ब्योमकेश बक्षी को जानते हो या फिर जासूसी फिल्मों के शौकीन हों । लेकिन ये कोई हल्की फुल्की जासूसी फिल्म भी नहीं है इसलिये अगर फिल्म का मजा लेना है तो इसे सर्तकता और पूरी तरह जुड़कर देखना होगा ।


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Mayapuri

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