मूवी रिव्यू: फिल्म‘ धर्म संकट में’ साधारण सी फन फिल्म

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अगर किसी हिन्दू को उसकी अधेड़ अवस्था में जाकर ये पता चले कि उसका जन्म एक मुस्लिम के यहां हुआ था, फिर वो किस तरह यतीनखाने में पहुंचा और बाद में उसे किस प्रकार एक ब्राह्मण गुजराती परिवार ने गोद लिया था तो सोचिये उस पर क्या बीतेगी । इसी थॉट को लेकर निर्देशक फवाद खान की फिल्म ‘धर्म संकट में’का ताना बाना बुना गया है । वैसे ये एक मंगोलियन फिल्म का रीमेक है ।
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परेश रावल एक हंसमुख लेकिन पूजा पाठ से दूर एक ऐसा गुजराती व्यवसायी है जो बाबाओं या उनके आश्रमो से दूर रहता है और एक हद तक हिन्दुवादी भी है । उसका बेटा नीलेश्वर बाबा यानि नसीरूद्दीन षाह का भक्त है क्योंकि उसकी प्रेमिका का पिता भी उसी बाबा का भक्त है। इसीलिये उसका बेटा चाहता है कि उसकी प्रेमिका के पिता को प्रभावित करने के लिये उसका पिता भी कुछ धर्म कर्म में दिलचस्पी ले, लेकिन परेश को उस तरफ जरा भी दिलचस्पी नही परन्तु वो अपने बेटे के साथ है और उसे विश्वास दिलाता है कि उसकी शादी उसी लड़की से होगी जिसे वो चाहता है।फिर भी पत्नि और बेटे के आग्रह पर पर वो एक दो बार आश्रम का भी चक्कर लगा लेता है। एक बार वो अपनी मां के मरने के बाद उसका लॉकर खोलकर देखता है तो उसमें एक डाकूमेन्ट को पढ़ने के बाद उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाती है । दरअसल उसे पता चलता है कि उसका जन्म एक मुसलमान के घर में हुआ था जिसे बाद में एक ब्राह्मण गुजराती ने उसे गोद ले लिया था । अब वो अपने बाप से मिलना चाहता है ।
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उसके पड़ोस में रहने वाले एक मुस्लिम वकील अनु कपूर जिनसे उस की हमेषा तू तू मैं मैं होती रहती है को पेरष अपनी कहानी बताता है , और उनसे अपने पिता को ढूंढने का आग्रह करते हैं । अनु कपूर से पता चलता है कि उसका पिता कोई गलत आदमी नहीं बल्कि अल्लाह का नेक बंदा है । दरअसल जब वो छोटा था तो उसकी अम्मी का इंतकाल हो गया था । बाद में उनकी नोकरी बाहर लग गई तो वो उसे अपने एक रिश्तेदार को सौंप गये ।लेकिन रिश्तेदार ने कुछ दिनों बाद उसे यतीम खाने में दे दिया । बाद में वहीं से उसके हिन्दू पिता ने उसे गोद ले लिया । यतीम खाने का उसूल था कि वे किसी भी बच्चे के बारे में कुछ नहीं बताते थे कि वो किस धर्म का है । और अब उसके पिता एक ऐसी जगह अपनी जिन्दगी के आखिर दिन काट रहे हैं जहां बर्जुगों को रखा जाता है ।
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आज भी उन्हें अपने बेटे का इंतजार है । जब परेश अपने पिता से मिलने जाते हैं तो वहां का इमाम मुरली षर्मा उन्हें उस वक्त तक अपने पिता से मिलने की इजाजत नहीं देता जब तक वो पूरी तरह से मुसलमान न बन जाये । लिहाजा परेश अनु कपूर से एक मुसलमान बनने के लिये वो सब कुछ सीखने की कोशिश करते हैं जो जरूरी है जैसे नवाज पड़ना तथा उर्दू की अच्छी जानकारी होना आदि । उधर परेश का बेटा और बीवी भी एक पंडित को उसके सिर पर बैठा देते हैं कि वो उन्हें कुछ धर्म कर्म के बारे में सिखाये ।इस तरह एक तरफ परिवार, तो दूसरी तरफ पिता से मिलने की ख़्वाईष ।एक वक्त ऐसा आता है जब उसे पूरी दुनिया के सामने अपनी असलियत बतानी पड़ती है । इसके बाद उसका बेटा बेटी और पत्नि उसे छौड़ जाते है । इसके अलावा उस पर मुस्लिम धर्म का अपमान करने पर केस भी हो जाता है ।
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लेकिन यहां उसका केस अनु कपूर लड़ता है और उसे केस से बरी करवाने के अलावा उसके बाप से मिलवाता है लेकिन तब तक बाप बेटे की राह तकता जन्तनषीन हो जाता है । इसके बाद परेष अनु के साथ नालांनद बाबा का भांडा फौडने के लिये उसके आश्रम जा पहुंचता है और वहां पूरी पब्लिक के सामने नीलानंद का पर्दाफाष करता है औरउसकी असलिये सबको बताता है। इसके बाद सब सही हो जाता है ।

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जैसा कि बताया गया है कि ये एक मंगोलियन फिल्म का रीमेक हैं । ओरीजनल में यहूदी और इसाई को लेकर पंगा था । जबकि इसका भारतीय करण करते हुये सबसे बिकाऊ हिन्दु मुस्लिम इषू बनाकर पेष किया गया है । लेकिन फिल्म का जितना मजबूत कन्टेन्ट है उतना ही ढीला स्क्रीनप्ले रहा । फिल्म जो बात कहने की कोषिष करती है वो उतने प्रभावषाली ढंग से नहीं कह पाती । इसलिये इतना बढि़या कन्टेन्ट महज एक फन बन कर रह जाता है । पूरी फिल्म पेरष रावल के कंधो पर टिकी है ।उन्होंने एक कुषल अभिनेता की तरह इस भूमिका को निभाया भी है । हालांकि अनु कपूर ने उनका साथ दिया है लेकिन वे भी बीच बीच में लाउड हो जाते हैं । फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है नसीरूद्दीन षाह । क्योंकि उन्होंने नीलानंद बाबा की भूमिका को इस तरह से निभाया है जैसे कभी कभी बहुत ही सुरीला गायक इतना बेसुरा हो जाये कि लोग उसे सुन कर हैरानी प्रकट करने लगे । अब या तो भूमिका ही उनकी समझ में नहीं आई या फिर उनके नजरिये से उनकी भूमिका में ही दम नहीं था इसलिये उसमें जान डालने के चक्कर में वे उसे और बुरा बना बैठे । लिहाजा फिल्म में दर्षक के लिये मनोरजंन तो है लेकिन सिर्फ मनोरजंन,और कुछ नहीं । इसलिये इसे बस एक साधारण फन फिल्म ही कहा जा सकता है ।


Mayapuri

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