मूवी रिव्यू: फिल्म‘ दिल्ली वाली जालिम गर्लफ्रेंड’ ‘‘जालिम गर्लफ्रेंड नहीं जालिम कार चोर’’

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कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी ‘ खोसला का घोसला’ उस फिल्म और जपिंदर कौर की फिल्म‘ दिल्ली वाली जालिम गर्लफ्रेंड’ को उसकी कार्बन कॉपी कहा जा सकता है । अगर फर्क की बात की जाये तो बस इतना ही है कि खोसला… जमीन पर कब्जे को लेकर थी दिल्ली वाली… कार उठाईगिरों को लेकर है ।

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दिवेन्दु शर्मा दिल्ली में पढ़ाई कर रहा है वंहा उसका जिगरी दोस्त प्रदयुमन सिंह है । एक बार दिवेन्दु एक लड़की प्राची मिश्रा को देखता है तो उस पर फिदा हो जाता है । उसे पता चलता है कि प्राची एक फाइनेंस कंपनी में काम करती है । तो वो अपने दोस्त के साथ प्राची से दोस्ती बढ़ाने के चक्कर में वो उसकी कंपनी से कार लोन ले लेता है । प्राची उसे अपने जन्मदिन पर बुलाती है तो वहां के तामझाम को लेकर कुछ प्रॅाब्लम हो जाती है तो प्राची दिवेन्दु से उस लफड़े को निपटाने के लिये तीस हजार रूपये उधार मांगती है । और जब कार की किश्त भरने के लिये प्राची का दिया हुआ वैक बाउुस हो जाता है तो उसी की कंपनी के लोग कार उठाने आ जाते हैं ।

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पैसे लौटाने की बात आती है तो पैसे देने के बजाये प्राची दिवेन्दु को ही पुलिस की धमकी दे देती है । यही नही दो किश्तों के बाद ही उनकी कार चोरी हो जाती है । दिवेन्दु अपने दोस्त के साथ मिलकर उस चोर का पता लगा लेता है । बाद में पता चलता है कि वो सकेंड हैंड कार बेचने की आड़ में कार चोरी करने का धंधा करने वाले मनोचा यानि जैकी श्राफ का आदमी है । लेकिन कार तो वापिस नही मिलती बल्कि जैकी दिवेन्दु को धमकी देता है कि अब की बार तेरे बाप की गाड़ी होगी तो बोलकर उठावाउंगा । इसके बाद दिवेन्दु अपने दोस्त की दोस्त एक पत्रकार इरा दूबे के साथ मिलकर जैकी का सिटंग ऑपरेशन करता है और एक दिन उसे रंगे हाथ पकड़वा देता है । लेकिन इस बार दिवेन्दु को कार ही नहीं बल्कि इरा के रूप मे एक गर्लफ्रेंड भी मिल जाती है ।

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फिल्म के टाइटल को देखकर फिल्म के कामेडी होने का गुमान था लेकिन कामेडी तो नहीं एक हद तक इसे फनी फिल्म कहा जा सकता है । दिल्ली में एक कार चोर और हीरो के बीच की पंजाबी में कहा जाये तो बसूड़ी है । जिसमें हमेशा की तरह जीत हीरो की ही होती है । दिवेन्दु शर्मा की ये चोथी पांचवी फिल्म है लेकिन अभी तक वो ऐसा कुछ नहीं कर पाया जो उसके लिये प्लस प्वांइट साबित हो यहां भी उसकी भूमिका असरहीन ही रही । जबकि उसके दोस्त की भूमिका में प्रदयुमन सिंह काफी फनी रहा । प्राची हो या इरा दूबे दोनो ही बेदम साबित हुई ।

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फिल्म में पंजाबी किरदार है लेकिन जैकी अपने द्धारा बोली जाने वाली मशहूर भाषा में मिक्स कर पंजाबी बोलने की कोशिश करते हैं। निर्देशक न तो दिल्ली को एक्सपोज कर पाई न ही पंजाबी भाषा को । क्योंकि दिवेन्दु और उसका दोस्त तथा जैकी आदि सारे पंजाबी हैं लेकिन खासकर दिवेन्दु की हिन्दी में जरा भी पंजाबी पुट नही आ पाता । फिल्म अपनी कहानी आराम से कहती हुई आगे बढ़ती है । जिसमें कहीं कोई उतार चढ़ाव नहीं कोई टिवस्ट नहीं । खोसला का घोसला एक बेहतरीन फिल्म थी जबकि ये उतनी ही कमजोर । दूसरे फिल्म का नाम दिल्ली वाली जालिम गर्लफ्रेंड नहीं बल्कि जालिम कारचोर होता तो बेहतर होता ।

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Mayapuri