मूवी रिव्यू: फिल्म‘ दोजख़’ हिंदू मुस्लिम एकता यानि दूर की कोड़ी

1 min


हिन्दू मुस्लिम एकता पर अभी तक न जाने कितनी फिल्में आई हैं । उनमें से कितनी ही फिल्मों में ये संदेश काफी प्रभावषाली ढंग से दिया गया लेकिन लेखक निर्देशक जेग़म इमाम की फिल्म ‘दोजख’ को इस मैसेज को कुछ इस तरह दिया है जो फिल्म तक तो ठीक है लेकिन वास्तविक जीवन में ऐसा मुमकिन नहीं ।
बनारस के पड़ोस में राम नगर कस्बे में मौलवी साहब (ललित मोहन तिवारी) रहते हैं । वे बच्चों की चीजों की एक छोटी सी दुकान चलाते हैं ।

 

movie_5aeed1f59c961d429cecd79e712212f31126275057

उनकी बीवी मर चुकी है और एक बारह साल का बेटा है जान मौहम्मद, जिसे वे बहुत चाहते हैं । लेकिन मां के मरने के बाद जानू कहीं खो जाता है । और जब मिलता है तो मरा हुआ । जाने बेशक मुस्लिम बच्चा था लेकिन उसे मंदिर का पुजारी (नाजि़म खान) भी बहुत प्यार करता है क्योंकि जानू मंदिर में आना या रामलीला में हनुमान की भूमिका करता है । और जब उसकी मां मरती है तो वो अपने अब्बा से वादा करवाता है कि अगर वो मर जाये तो उसे अंधेरी कब्र में न गाढ़ा जाये । इसलिये मौलवी साहब अपने बच्चे को कब्र नहीं दिखाते बल्कि उसका देह सस्कांर करते हैं ।

i5pc2da9m0eiw828.D.0.Garric-Chaudhury-Lalit-Mohan-Tiwari-Dozakh-Movie-Photo

फिल्म के शुरू में ही मौलवी का बच्चा जानू गायब दिखाया है, अंत तक मौलवी अपने बच्चे को ही ढूंढता रहता है । बीच बीच में उसकी पत्नि और बच्चे के दृश्य फ्लैशबैक में दिखाये जाते रहते हैं । लिहाजा दर्शक ये सोच सोच कर हैरान होता रहता है कि आखिर फिल्म बनाने का मकसद क्या है । और लास्ट में जो हिन्दु मुस्लिम भाई चारे का मकसद दिखाया है वो खुद मुसमानों को हजम नहीं होने वाला ।

film dozakh

वैसे भी इस तरह हिन्दु मुस्लिम भाई चारा दिखाना दूर की कौड़ी ही है । वो भी एक मुस्लिम द्धारा ऐसा सोचना तो कतई नमुमकिन है । हो सकता है कि फिल्म की रिलीज के बाद फिल्म को लेकर कन्ट्रोवर्सी न खड़ी हो जाये । हो सकता है कि कट्टर मोलवी निर्देशक जेगम इमाम के खिलाफ कोई फतवा न जारी कर दे । वैसे अपनी रिलीज से पहले फिल्म कई फिल्मी मेलों के चक्कर लगा चुकी है । और फिल्म के लेखक निर्देशक जेगम इमाम पत्रकार रह चुके हैं ।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये