मूवी रिव्यू: फिल्म‘ हंटर’ ‘‘सेक्स के साथ मानसिक दुविधाओं और भावनाओं को तरजीह देती है’’

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एडल्ट फिल्मों की श्रेणी में होंने के बाद भी लेखक निर्देशक हर्षवर्धन कुलकर्णी की फिल्म ‘हंटर’ थोड़ी अलग फिल्म है। सेक्स कॉमेडी जैसे शब्दों को झटक देने वाली ये फिल्म सेक्स दिखाती नहीं, सेक्स की बातें करती है ऐसी बातें जो यार दोस्त सिर से सिर मिलाकर किया करते हैं । खुलेआम ये विषय वर्जित है । हमारी फिल्मों में इसी बात का फायदा उठाते हुए सेक्सी दृश्य दिखाकर दर्शक को भरमाने का काम अक्सर किया जाता रहा है । लेकिन निर्देशक ने इस विषय को एक असरदार तरीके से फिल्म का रूप दिया है।

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मंदार पोंकशे को बचपन में ही सेक्सी फिल्में देखने का चस्का लग गया था । बाद में सेक्स के प्रति उसका जुनून लड़कियों से दोस्ती करने तक पहुंच गया। बड़ा होते होते सेक्स के प्रति उसका आकर्षण इतना बढ़ जाता है कि एक दिन वो सेक्स एडिक्ट बन जाता है । मंदार किसी भी लड़की या औरत को सूंघ कर पता लगा लेता है कि किसे उसकी जरूरत है । इसी संदर्भ में उसकी सेक्स जर्नी में सविता भाभी और ज्योत्सना भाभी जैसी औरतें आती हैं। वो पायल नामक एक लड़की को भी फांसता है । इसी तरह मंदार की जर्नी जारी रहती है जबकि उसके संगी साथी शादी वगैरह कर घर बसा चुके हैं। उस पर भी शादी का दबाव है उन्हीं दिनों उसे एक लड़की तृप्ति मिलती है जिसे वो प्यार करने लगता है ।
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लेकिन यहां उसका प्यार उसे दोहराहे पर ला खड़ा कर देता है क्योंकि एक तरफ उसका भविष्य तृप्ति है तो दूसरी तरफ उसकी वासूगिरी (महारष्ट में ऐसे लड़कों को वासू कहते हैं) है । यंहा फिल्म कुछ कहते हुए कुछ और कहने लगती है जो मंदार का आत्म मंथन है । अंत में आदत से कहीं प्यार बड़ा साबित होता है
जैसा कि देखा जाता है कि अक्सर हमारी फिल्में दर्शक को लुभाने के लिये अपने पोस्टर या ट्रेलर में सेक्स का तड़़का लगाते रहते हैं। हंटर में भी ऐसा किया गया है लेकिन फिल्म में सेक्स नहीं सेक्स की बातें हैं। यहां भी दृश्य हैं लेकिन कमरे के भीतर । फिल्म में सेक्स है लेकिन संवादों में । मंदार पोंकशे की भूमिका में गुलशन देवईया तथा तृप्ति के रोल में राधिका आप्टे ने अपने प्रभावशाली अभिनय से दोनों पात्रों को सजीव कर दिखाया है।
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इनके अलावा सई तम्हाणकर, वीरा सक्सेना तथा सागर देशमुख आदि कलाकारों ने भी सधा हुआ अभिनय किया है । फिल्म दो हजार पद्रह की है लेकिन मंदार के बचपन या उसकी किशोर अवस्था का आवागमन यानि फ्लैशबैक कई जगह कन्फयूजन पैदा करता है । जहां शुरू में कहानी फनी है वहीं मध्यांतर के बाद मुख्य पात्र अपनी अपनी मंजिल को पाने की जुगत में लग जाते हैं। अंत में एक हद तक फिल्म इमोशनल हो जाती है। फिर भी फिल्म सेक्स के साथ मानसिक दुविधाओं और भावनाओं को तरजीह देते हुये अपनी बात कहने में सार्थक है ।
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