मूवी रिव्यू: हिन्दू मुस्लिम की एकता और देशभक्ति का संदेश देती फिल्म ‘जांनीसार’

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रेटिंग ***

उमराव जान, गमन तथा अंजुमन जैसी फिल्मों के सर्जक मुज़फ्फर अली की फिल्म‘ जांनीसार’ में 1857 की पहली बगावत के बीस साल बाद की कहानी है। जो है तो काल्पनिक लेकिन फिल्म में उस दौर के सच्चे संस्मरण हैं ।

कहानी

1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज राजाओं और नवाबों के बच्चों को अपने माहौल में ढ़ालने के लिये उन्हें निजी तौर पर अपनी परवरिश दे कर उनका ब्रेनवॉश करने में लगे थे। उन्होंने ऐसे ही एक देशभक्त मुस्लिम राजा रानी तथा उसके काफिले पर हमला कर उन्हें मार दिया लेकिन उनके बच्चे को पढ़ाई लिखाई के लिये इंगलैंड भेज दिया। बीस साल बाद जब वह राजा (इमरान अब्बास) वापस इंडिया आता है तो पूरी तरह से अंग्रेजीयत में रंगा होता है। उसकी मुलाकात एक नृत्यांगना (पर्नीया कुरैशी) से होती है। पर्नीया उसे बताती है कि आज उनकी पूरी रियायत भूख प्यास से मर रही है । अंग्रेज उनका खून चूस रहे हैं  फिर उसे एक और क्रांतिकारी मुज़फ्फर अली मिलते हैं जो उनके पिता के काफिले में थे और जिंदा बच गये थे । उनसे इमरान को पता चलता हैं कि उसके पिता एक बहादुर इंसान थे। जबकि उसके नाना दिलीप ताहिल उससे झूठ बोलते हैं कि उसके पिता एक एशपरस्त इंसान थे । असलियत पता चलने पर वो अंग्रेजो के विरूद्ध हो जाता है यंहा उसका साथ देती है नूर यानि पर्नीया कुरैशी ।

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निर्देशक

मुज़फ्फर अली ने फिल्म में उसी कालखंड को दिखाया है जब अंग्रेज हिन्दू मुस्लिम राजाओं और नवाबों में फूट डालकर अपने हाथ मजबूत करने में लगे हुये थे। फिल्म में बताया गया है कि 1857 की क्रांति में अंग्रेजो ने खास कर अवध में लोगों पर इतना जुल्म ढाया था कि अवध का एक भी ऐसा पेड़ नहीं था जिस पर दस दस लाशें न टंगी हों । इसके अलावा अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी से उन सारी बातों को इतिहास से उड़ा दिया जो उनके खिलाफ थी । निर्देशक ने ज्यादातर शूटिंग वास्तविक लोकेशंस पर की। कलाकारों के गैटअप और पौशाक उसी दौर की रखी गई हैं। फिल्म अभिनय और तकनीकी तौर पर थोड़ी कमजोर है। लेकिन फिल्म में उस दौर की हिन्दू मुस्लिम एकता को बहुत प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया है ।

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अभिनय

पाकिस्तानी एक्टर इमरान अब्बास अपनी भूमिका में जंचते हैं। उन्होंने अपनी भूमिका को बढ़िया ढंग से निभाया है। पर्नीया बेसिकली एक  क्लासिकल डांसर है उनकी इसी खूबी को देखते हुये उन्हें नूर के रोल में लिया गया । हालांकि फिल्म में डांस काफी कम हैं फिर भी पहली फिल्म के मुताबिक उन्होंने अच्छा काम किया है । इस बार एक क्रांतिकारी की भूमिका में मुज़फ्फर अली भी अपनी अभिनय प्रतिभा से परिचित करवाते हैं। बाकी दिलीप ताहिल, कार्ल वार्टन तथा देशी विदेशी कलाकारों का विशेष  सहयोग रहा ।

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संगीत

फिल्म का सबसे उजला पक्ष हैं संगीत । पाकिस्तान के गायक व संगीतकार उस्ताद शफकत अली खान तथा मुजफ्फर अली ने फिल्म का उम्दा म्यूजिक तैयार किया है। जिसे सुनते हुये एक संगीत भरे खुमार का अहसास होता है ।

क्यों देखें

ऐसे दर्शक जो अंग्रेजो की कपट भरी राजनीति, और उस दौर के राजाओं नवाबों में दिलचस्पी रखते हैं। वे पूरे परिवार के साथ ये फिल्म देख सकते हैं।

 


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Mayapuri

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