मूवी रिव्यू: एक विलक्षण सुपरमैन की अद्भुत कथा ‘मांझी द माउंटनमैन’

1 min


रेटिंग*****

केतन मेहता कितने काबिल निर्देशक हैं ये उनकी अभी तक की फिल्मों से पता चलता हैं लेकिन उन्होंने ‘ मांझी- द माउंटनमैन’ जैसी दो लाइनों की नीरस सी कहानी प्रभावशाली और दिलचस्प तरीके से बताने की कोशिश की हैं कि अगर इंसान कुछ करने की ठान ले तो बड़े बड़े पर्वत भी उसके सामने झुकने के लिये मजबूर हो जाते हैं। उन्होंने फिल्म में बिहार के दशरथ मांझी नामक एक ऐसे शख्स के बारे में बताया है जिसने अकेले महज एक छैनी और हथौड़े से अपनी पत्नि की याद में एक पहाड़  काट कर इतनी चौड़ी सड़क बना दी कि उसमें एक साथ दो ट्रक आ जा सकते हैं। अगर ये कहानी सच न होती तो शायद इसे भी किस्से कहानियों में शुमार कर दिया जाता ।

कहानी

बिहार का एक ऐसा गांव जो आजादी के तेरह साल बाद भी पथरीले पहाड़ों से घिरा था। वहां न तो स्कूल था न ही अस्पताल। यहां तक कस्बे या अस्पताल तक जाने के लिये चालीस मील का घेरा काट कर जाना पड़ता था। उस पर गांव के सरपंच के कर्ज के नीचे दबे छोटी जाति के लोग। इन्हीं में दशरथ मांझी का पिता भी था जिस पर जमींदार का कर्ज था। उसे उतारने के लिये जब उसके बेटे दशरथ को जमीदार की गुलामी में देने की बात होती है तो दशरथ वहां से भाग जाता हैं लेकिन इससे पहले उसका बाल विवाह हो जाता है। करीब सात साल बाद दशरथ मांझी अपने गांव वापस आता है लेकिन इतनी अरसे में भी वहां कुछ नहीं बदला था। यहां तक जब वो अपनी बीवी राधिका आप्टे को लेने जाता है तो उसका ससुर उसके सामने पैसो की मांग करता हैं। एक दिन दशरथ को अपनी पत्नि की दूसरी शादी का पता चलता है तो वो अपनी पत्नि को भगा लाता है।

Picture8-938x625

इस बीच उसका एक बच्चा भी हो जाता है लेकिन दूसरे बच्चे के समय राधिका पहाड़ से फिसल जाती है। सीधा रास्ता न होने की वजह से राधिका मर जाती है लेकिन उसका दूसरा बच्चा बच जाता है जो एक लड़की है इसके बाद दशरथ प्रण करता हैं कि वो पहाड़ काट कर रास्ता बनायेगा और वो महज एक छैनी और हथौड़े के बल पर इस काम में जुट जाता है। लोग बाग उसे पागल समझते हैं लेकिन उन सब से बेपरवाह मांझी अपने काम में लगा रहता है। इस बीच गांव का सरपंच मांझी के नाम सड़क बनवाने के एवज में सरकार से मोटी रकम लेकर खा जाता है। मांझी इस बात की शिकायत उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से करने के लिए पैदल दिल्ली पहुंचता हैं लेकिन उन दिनों देश में इमरजेंसी लगी थी इसलिये वो सफल नहीं हो पाता। फिर भी उसकी हिम्मत नहीं टूटती लिहाजा एक बार फिर वह अपने काम में जुट जाता है। दिन बीतते हैं फिर साल। इस तरह करीब बाईस साल बाद मांझी पहाड़ काट कर सड़क बनाने में कामयाब हो जाता है ।

1280x720-gO2

निर्देशन

सबसे पहले तो आश्चर्य कि केतन मेहता ने आसान सा लेकिन फिल्म के हिसाब से एक जटिल विषय चुना। उसके बाद एक सच्ची कहानी पर उनकी गहरी रिसर्च। बाद में वह असली लोकेशनों पर जाकर दशरथ मांझी नामक एक ऐसे शख्स की अविश्वसनीय कथा को सेल्युलाइट पर इस तरह से उतारते हैं कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। एक अदना से गरीब आदमी ने महज छैनी और हथौड़े से पूरा पहाड़ काट कर सड़क बना दी । इसलिये क्योंकि आगे कोई उसकी पत्नि की तरह बेमौत न मारा जाये। उस शख्स को आम आदमी तो हरगिज नहीं कहा जा सकता। इसलिये उसे नाम दिया सुपरमैन या माउंटनमैन । केतन ने वास्तविक लोकेशन के आस पास के पहाड़ों को लेकर शूट किया जिसमें स्पेशल इफेक्ट्स का बेहतरीन इस्तेमाल किया। यही नहीं एक नीरस सी कहानी में इमोशनल लव स्टोरी है, उस वक्त के जमींदारों के जुल्म का शिकार छोटी जाति के लोगों पर ढाए गए जुल्मों को दर्शाया गया हैं। उनके जुल्म के खिलाफ नक्सली भी हैं। इन सब को कहानी में गूंथकर जो फिल्म बन कर सामने आई वो विलक्षण और अद्भुत थी ।

manjhi

अभिनय

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष हैं फिल्म की कास्टिंग। इसे केतन मेहता की दूरदर्शिता ही कहा जायेगा कि उन्होंने उस वक्त मांझी के किरदार में नवाजुद्दीन को साइन किया था जब उसकी फिल्म ‘कहानी’ रिलीज हुई थी। उन्होंने महज एक फिल्म से ही नवाज की प्रतिभा को पहचान लिया था। जहां तक नवाज की बात की जाये तो ऐसा लगता हैं कि मांझी की आत्मा उसमें समा गई हो। क्योंकि मांझी के रूप में उसके अभिनय से सजा एक एक सीन देखते बनता है यहां तक कि कई दृश्यों को देखते हुये रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस फिल्म के बाद बेशक नवाज बॉलीवुड के गिने चुने सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं की जमात में जा बैठे हैं । राधिका आप्टे ने जिस प्रकार मांझी की पत्नि फल्गुनी की भूमिका को जिया हैं उससे पता चलता है कि वो एक बेहतरीन अभिनेत्री है। जमींदार की छोटी छोटी भूमिका में पहले तिग्मांशु धूलिया फिर पंकज त्रिपाठी उन भूमिकाओें को जैसे जिंदा कर देते हैं। इसी तरह प्रशांत नारायण भी छोटी सी भूमिका में अपने अच्छे अभिनेता होने का एहसास करवाते हैं। मांझी के पिता की भूमिका को एनएसडी से पास आउट जिस कलाकार ने प्रभावशाली अभिव्यक्ति दी है, उसकी हाल ही में मुत्यु हो चुकी है। अफसोस कि उस प्रतिभाशाली कलाकार के नाम से अपरिचित हूं।

manjhi-mountain-man-1

संगीत

लगता हैं संदेश शांडिल्य ऐसी ही फिल्मों में संगीत देने के लिये बने हैं, क्योंकि शुरू से अंत तक उनका संगीत अलग नहीं बल्कि कहानी से जुड़ा लगता है। केतन मेहता और दीपक रमोला के गीतों को संदेश ने अलग ही अभिव्यक्ति दी है क्योंकि उनके गीत भी अभिनय करते प्रतीत होते हैं ।

क्यों देखें

अगर किसी काम को करने का निश्चय कर लिया जाये तो उस निश्चय के आगे पहाड़ भी झुक जाते हैं। यहां एक ऐसा ही शख्स दशरथ मांझी आपको इस बात का विश्वास दिलाता है कि इन्सान के निश्चय के आगे बड़ी से बड़ी चीज भी छोटी हो जाती है। लिहाजा ये फिल्म नहीं बल्कि एक ऐसी प्रेरणा दायक कथा है जिसे देखकर आपको  भी कुछ करने की इच्छा पैदा होने लगती है। इसलिये यह फिल्म सपरिवार न देखना आपकी सबसे बड़ी क्षति है ।

 


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये