मूवी रिव्यू: कहीं से कहीं तक नहीं ‘ पी से पीएम तक’

1 min


वो कहते है न कि हर किसी का एक वक्त होता है । जाने भी दो यारो, कभी हो कभी ना, क्या कहना आदि उत्कृष्ठ फिल्मों के लिये निर्देशक कुंदन शाह को आज भी याद किया जाता है । लेकिन करीब दस साल बाद निर्माता जयंती लाल गाढ़ा ने उनकीे एक बार फिर फिल्म ‘ पी से पी एम तक’से वापसी करवाई लेकिन ये वापसी पूरी तरह से फ्लाॅप साबित हुई ।
कहानी

एक बेहद सस्ती लेकिन खूबसूरत वेश्या मीनाक्षी दीक्षित अपने धंधे में पुलिस का ज्यादा दख्ल देख उनसे बचकर सतारा भाग आती है ।यहां राजनीति का माहौल हैं क्योंकि सीएम के लिये चुनाव होने वाले हैं । एक पार्टी में अजंन श्रीवास्तव, तथा मौजूदा सीएम हैं । दूसरी पार्टी में अखिल मिश्रा हैं इनके बीच एक और बंदाहै यशपाल शर्मा, उसके पास चालीस एम एल ए हैं और उसका सपना सीएम बनने का है अजंन के पार्टी के सिरमौर हैं वरिष्ठ नेता भरत जाधव ,जन्हें लड़कियों का बहुत शौक है। उनकी भतीजी की षादी इंसपेक्टर इन्द्रजीत सोनी से होने वाली हैं । लेकिन परिस्थति ऐसी बन जाती हैं कि इन्द्रजीत को मीनाक्षी यानि कस्तूरी से सामूहिक विवाह सभा में विवाह करना पड़ जाता है । इसके बाद दोनों तरफ से मात और शह का खेल कुछ इस तरह चलता है कस्तूरी को सीएम बना दिया जाता है । और एक दिन उसके पास पीएम बनने तक का आॅफर भी आ जाता है ।

p-se-pm-tak1

निर्देशन

बड़े दुख के साथ कहा जाता है कि अब कुंदन शाह जैसे निर्देशक का वक्त नहीं रहा । उन्होंने एक ऐसी बचकानी फिल्म बनाई हैं कि यकीन ही नहीं होता कि ये कुदंन शाह जैसे ब्रिलियंट डायरेक्टर की फिल्म है । क्योंकि पहले तो कथा फिर पटकथा इस कदर कमजोर हैं कि दर्शक फिल्म देखते हुए हष हष करने लगता है । फिल्म देखते हुए लगता है जैसे कुदंन जी ने सारे कलाकारों को खुला छोड़ दिया हां । इसलिये जिसे जो अच्छा लग रहा था वो वही कर रहा था ।यहां तक सीएम तक अधकचरी काॅमेडी करने की कोशिश में लगा हुआ था ।
अभिनय

अजंन श्रीवास्तव, यशपाल शर्मा, भरत जाधव,अखिलेन्द्र मिश्रा,मुश्ताक खान, आनंद काले,वेदिश प्रेरणा, इन्द्रजीत सोनी,चिन्मय जाधव । ये सभी बहुत ही बेहतरीन अदाकार है लेकिन इस बार इनके लिये कुछ करने के लिये था नहीं सिवाह फूहड़ कामेडी के । यहां तक वीरेन्द्र सक्सेना, दीपक षिर्के तथा उपासना सिंह जैसी अभिनेत्री को पूरी तरह से जाया कर दिया गया । फिल्म की नायिका साउथ की जानी मानी अभिनेत्री है बेशक उसने अपनी भूमिका पूरे आत्म विश्वास से की लेकिन वो भ अपने आपको ओवर और लाउड होने से नहीं रोक पाई । जाने भी दो यारों की तरह यहां भी एक मरे हुए नेता को जिन्दा दिखाते हुए काॅमेडी करने की कोशिश की गई लेकिन जाने भी दो…में जितना अच्छा सतीश शाह कर गये थे भरत जाधव उनके सामने कहीं भी नहीं टिकते । हालांकि उन्होंने अपनी तरफ से लोगों को हंसाने की कोशिश की दूसरे वे आज के बेहतरीन अभिनेता हैं लेकिन अति कमजोर पटकथा के सामने वे विवश थे ।

p-se-pm-tak

निर्माता

फिल्म के निर्माता जयंती लाल गाढ़ा बधाई के पात्र है जिन्होंने एक वरिष्ठ निर्देशक का सम्मान करते हुये उन्हें दस साल बाद एक मौका दिया । लेकिन कुंदन शाह उस मौके का फायदा नहीं उठा पाये ।

क्यों देखें

अगर दर्शक निर्देशक कुंदन शाह के नाम को देखकर फिल्म देखने जाना चाहे तो ये उनकी सबसे बड़ी भूल होगी । क्योंकि फिल्म में कुदंन शाह दूर दूर तक नहीं हैं ।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये