मूवी रिव्यू: ‘ किस्सा’ (पंजाबी) उत्तराधिकारी न होने की त्रासदी

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किसी आसान सी बात को कहने के लिये निर्देशक अनूप सिंह ने अपनी पंजाबी फिल्म ‘ किस्सा’ का किस्सा इतने कांपलिकेटिड तरीके से बयान किया है कि अंत तक दर्शक के कुछ पल्ले नहीं पड़ता ।

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इरफान खान यानि -सरदार अंबर सिंह- रिफ्यूजी है जो इसलिये दुखी है कि उसकी पत्नि टिस्का चोपड़ा- ने उसे एक भी लड़का पैदा करके नहीं दिया । अगली बार भी चोथी लड़की ही होती है तो इस बार अंबर सिंह लड़की को ही लड़का मानते हुए उसका नाम कंवर सिंह यानि -तिलोत्मिा शोमी- रखता है और बाकायदा एक लड़के की तरह उसकी परवरिश करता है । यही नहीं एक दिन एक लड़की नीली रशिका दुग्गल- से उसकी शादी भी कर देता है । नीली को जब कंवर की असलियत का पता चलता है तो वो वहां से भाग जाना चाहती है लेकिन अंबर सिंह उसे पकड़ उससे खुद कवंर के नाम की औलाद पैदा करना चाहता है लेकिन कंवर ऐसा नहीं होने देती वो अपने पिता को गोली मार देती है । बाद में कवंर और नीली को टिस्का अपने मायके के घर भेज देती है जंहा अब कोई नहीं रहता । वहां नीली कंवर को समझाती है कि ये राज कब तक बना रहेगा । इसलिये तुझे असलियत में आना ही पड़ेगा । बाद में गांव वालों को उसके लड़की होने का शक हो जाता है तो नीली उसे वहां से भगा देती है लेकिन उसके अपने घर में भी उसकी मां और बहने आग में जलकर मर चुकी हैं लेकिन उसका बाप आज भी जिंदा है । वो अब नीली को अपनाना चाहता है । इसलिये कंवर को मार कर नीली से जब अपनी इच्छा जाहिर करता है तो वो भी आत्महत्या कर लेती है ।
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फिल्म शुरू होती है जब विभाजन के समय पाकिस्तान में गये पंजाब के लोग इधर आते हैं । उन्हीें में अंबर सिंह का परिवार भी है । उसी दौरान उसे तीसरी बेटी पैदा होती है । लेकिन उसे तो बस एक बेटा चाहिये इसलिये जब चौथी लड़की पैदा होती है तो उसे ही लड़का मानते हुए उसका पालन पोषण लड़के की तरह करना शुरू कर देता है । वहां से फिल्म नकली होना शुरू हो जाती है । जब अंबर सिंह लड़का बने लड़की को पहलवान बनाने के लिये एक गुरू के हवाले कर देता है । उसके बड़ा हो जाने पर भी उसे उसकी मां के अलावा कोई नही पहचानता की वो लड़की है उसकी जवान बहने भी नहीं ।यही पर बस नहीं होता अंबर सिंह अब कंवर को अपने बिजनिस में भी शामिल कर लेता है । कंवर अपने पिता का सारा काम संभालती है वो ट्रक चलाती है वो अपने पिता के साथ शिकार पर जाती है । नकलीपन की पराकास्टा जब अंबर एक लड़की नीली से कंवर की शादी करवा देता है और फिर स्वंय उसके साथ सोना चाहता है । लेकिन उसका विरोध उसकी पत्नि ने न तो शादी के वक्त किया और न ही बाद में । अंत में भी जो कुछ होता है उस पर यकीन करना दुर्भर हो जाता है ।
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फिल्म खत्म भी नाटकीय तरीके से होती है । फिल्म का उज्जवल पक्ष है कलाकारों का उच्चस्तरीय अभिनय । इरफान खान ने अंबर सिंह की जटिल भूमिका को जिस तरीके से निभाया है उससे उनका कद और ऊंचा हो जाता है । उनके अलावा टिस्का चोपड़ा ने भी प्रभावशाली अभिनय किया है लेकिन लड़की और लड़के के बीच झूलती तिलोत्मा ने असहाय, मजबूरी और पीड़ा को एक सक्षक्त अभिनेत्री की तरह निभाया है और उसका साथ दिया नीली के रूप में रशिका दुग्गल ने । फिल्म की लोकेशसं तथा बैकग्राउंड म्युजिक अच्छा है । फिल्म कई फिल्मी मेलों का सफर तय कर चुकी है । और शायद फिल्म बनाई भी फिल्म फेस्टिवल के लिये ही हैं ।


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Mayapuri

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