मूवी रिव्यू: ‘राॅय’ साल की टाॅप कन्फ्यूजन क्रिएट करती फिल्म

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रणबीर कपूर, अर्जुन रामपाल तथा जैकलीन फर्नांडीज जैसे सितारों और भूषण कुमार जैसे बडे़ प्रोडयुसर के साथ किसी फिल्म से डायरेक्शन में डेब्यु करना किस्मत की बात हो सकती है और ऐसे अवसर को एक ऐसी कन्फ्यूजन भरी कहानी की वाली फिल्म में बर्बाद कर देना,अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ा मार लेना नहीं तो और क्या है । लेखक निर्देशक विक्रमजीत सिंह ने फिल्म ‘राॅय’ को लेकर बिलकुल यही किया है ।

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अर्जुन रामपाल एक बिग और सफल फिल्मों का राइटर डायरेक्टर है ।उसके अफेयर नाम से नहीं बल्कि गिनती से पहचाने जाते हैं । उसकी फिल्म ‘गन्स’के दो पार्ट बन चुके है और हिट हो चुके हैं लिहाजा अब वो इसका तीसरा पार्ट भी बनाना चाहता है । लेकिन कहानी का अभी तक कोई अता पता नही । दरअसल उसकी सीरीज का हीरो राॅय एक चोर है । बाद में वो प्रोड्यूसर के दबाव में आकर बिना कहानी के ही मलेशिया फिल्म बनाने के लिये निकल पड़ता है । वहां उसकी मुलाकात लंदन की आर्ट फिल्मों की राइटर डायरेक्टर जैकलीन से मुलाकात होती है । उससे मिलने के बाद उसके दिमाग में कहानी भी आकार लेने लगती है ।
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इस बार उसकी कहानी के हीरो राॅय यानि रणबीर कपूर के साथ वो जैकलीन अक्स को ही रखता है । लेकिन कहानी उस वक्त रूक जाती है जब जैकलिन को लगता है कि अर्जुन के लिये वो भी महज उसके होने वाले अफेयर्स में एक गिनती मात्र है। इसलिये वो उसे छौड़ वापस लंदन चली जाती है लेकिन इस बार वो वाकई जैकलिन से प्यार करना लगा है । जैकलीन के जाने के बाद वह भी बिना फिल्म बनाये वापस आ जाता है । यहां आने के बाद उस पर प्रोडयूसर का दबाव,और उसके पिता अनुपम खेर का गुजर जाना उस पर भारी पड़ता है और एक बार फिर जैकलीन का उसे ठुकरा देना तो लगभग तौड़ कर देता है लेकिन वो एक बार फिर उठता है और फिल्म पूरी करता है इस बार भी उसकी फिल्म हिट साबित होती है और इस बार जैकलिन भी उसे निराश नहीं करती ।
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राॅय एक कन्फ्यूजन भरी एक ऐसी बेहद उबाऊ फिल्म साबित होती है जिसे देखते हुये एक वक्त तक दर्शक अपने बाल नौंचने तक तैयार हो जाता है । फिल्म का कोई भी किरदार चाहे वो रणबीर कपूर हो,अर्जुन रामपाल या जैकलीन हो,वो भी डबल रोल में या फिर एक अजीब सा डिटेकिटव रजत कपूर जो राॅय का पकड़ने के लिये सोलों से कोशिश कर रहा है , एक बार भी हंसने को तैयार नहीं यानि सारे किरदार ऐसे लगते हैं जैसे उन्हें नींद में चलने की बीमारी हो । इधर दर्शक की ये परेशानी है कि आखिर डायरेक्टर अपने किरदारों से क्या कहलवाना चाहता है लेकिन वो अंत तक समझने में नाकाम साबित होता है उस बेचारे की बौर होने की कोई सीमा ही नहीं हैं जैसे उसे शुरू से नींद में चलते किरदार बौर करते हैं वे क्या कर रहे हैं क्यों कर रहे हैं पता नहीं ।
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अभिनय की बात जाये तो यहां ये बताना मुश्किल होगा कि रणबीर कपूर ने ज्यादा घटिया एक्टिंग की या अर्जुन नाम पाल ने या फिर जैकलिन ने घटिया एक्टिंग के साथ हिन्दी बोलने में, या फिर रजत कपूर ने और याद रहे कि इनमें कई नाम अपने अभिनय के लिये याद किये जाते रहे हैं । फिल्म में गाने भी है उनमें से कुछ बाहर सुनने में अच्छे भी लगे लेकिन फिल्म में उन्हें सुनने का दर्शक के पास मादा ही कहां बचता है । और जब फिल्म खत्म होने के बाद वो चैन की सांस लेता हुआ बाहर निकलता है तो उसके मुंहू से निकलता है कि इस साल की टाॅप क्न्फयूजन क्रिएट करती फिल्म कौन सी ? ‘राॅय’ ।


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Mayapuri

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