मूवी रिव्यू: ‘शमिताभ ’ अभिनय के नये आयाम स्थापित करती

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चीनी कम, पा जैसी औजस्वी फिल्में बनाने वाले लेखक निर्देशक आर. बाल्की ने एक बार फिर अपने फेवरेट अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘शमिताभ’में उनसे एक अलग सी भूमिका करवाते हुए उन्हें और खुद को एक सीढ़ी और ऊपर ला खड़ा किया है । लेकिन इस बार अमिताभ अकेले नहीं बल्कि उनके साथ फिल्म में साउथ इंडियन फिल्मों के स्टार धनुष तथा कमल हासन की दूसरी बेटी अक्षरा हासन भी है जिसने इस फिल्म से डेब्यु किया है।

Big-B-Akshsha-Dhanush-Shamitabhधनुष बचपन से ही गूंगा है लेकिन उसे एक्टिंग का जुनून है । इसलिये वो किसी भी तरह फिल्म एक्टर बनना चाहता है । लिहाजा वो फिल्मों काम करने के लिये मुबंई भाग जाना चाहता है। लेकिन उसकी मां को पता है कि एक अपाहिज कभी एक्टर नहीं बन सकता इसलिये वो नही चाहती कि वो मुंबई जाये । बाद में मां के कहने पर वो बस कंडेक्टर बन जाता है लेकिन मां के मरते ही वो फौरन मुबंई की तरफ रूख करता है । यहां उसे एक फिल्म की एडी अक्षरा मिलती है जो उसके टेलेन्ट से प्रभावित हो उसके बारे में एक डायरेक्टर को बताती है लेकिन वो साफ मना कर देता है ।

Untitled-2तब उसके डाॅक्टर पिता अक्षरा को बताते हैं कि अब विदेश में एक नई तकनीक इजाद हुई है जिसमें आॅपरेशन के तहत गले में एक माइक्रोमाइक फिट कर दिया जाता है । बाद में वो किसी और कि आवाज को चार सो फिट की दूरी तक से इस्तेमाल कर सकता है । अक्षरा अपने डाॅक्टर पिता की मदद से धनुष का वो आॅपरेशन करवाती है इसके बाद उसके लिये आवाज ढूंढती हैं जो उसे एक महाशराबी और चिड़चिडे़ शराबी अमिताभ के रूप में मिलती है । दरअसल अमिताभ भी कभी एक्टर बनने आये थे लेकिन उन्हें और उनकी आवाज को फिल्म वालों ने जरा भी पंसद नही किया । इस असफलता ने उन्हें शराबी बना दिया । अमिताभ ने अब अपना आशियाना एक कब्रिस्तान को बनाया हुआ है ।

shamitabh-movie-hd-wallpapers-3-01जंहा वे कब्र खोदने वाले के साथ रहते हैं । अक्षरा उन्हें धनुष की आवाज बनने के लिये विद एग्रीमेंट एपायंट करती है । इसके बाद जब नया नाम रखने की बारी आती है तो धनुष अपने नाम का आखरी अक्षर और बाकी के अक्षर आमिताभ के नाम के लेकर नया नाम रखता शमिताभ । इस जोड़ी की पहली ही फिल्म डुपर हिट साबित होती है लेकिन बाद में नई फिल्मों के चयन के लिये दोनों के बीच इगोक्लैश हो जाता है। अमिताभ का कहना है कि मेरी आवाज के बल पर ही वो स्टार है जिस दिन मेरी आवाज नहीं रहेगी उस वो भी फिनिश हो जायेगा । लिहाजा आगे दोनों अलग अलग काम करते हैं लेकिन दोनों की ही फिल्में पिट जाती हैं तब अक्षरा उन्हें बताती है कि वे दोनों एक दूसरे के बिना कुछ नहीं हैं यानि दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं । इसके बाद एक बार फिर दोनों एक साथ काम करने के लिये राजी हो जाते हैं । और जब अपनी नई फिल्म के मुहूर्त में शमिल होने के लिये जाते हैं तो रास्ते में उनकी गाड़ी का एक्सिडेंट हो जाता है । एक्सिडेंट के बाद अमिताभ की आवाज चली जाती है और धनुश वाकई फिनिश यानि मर जाता है ।

Amitabh-Bachchan-in-a-scene-of-Shamitabh

फिल्म शराबी के बाद एक बार फिर अमिताभ शराबी की भूमिका में हैं लेकिन दोनों भूमिकाओं में जमीन आसमान का फर्क है क्योंकि शराबी के अमिताभ से शमिताभ का षराबी अमिताभ बहुत ऊपर है और पहले से कई गुणा परिपक्व भी । फ्रस्टिड होकर बने षराबी को जिस तरह से अमिताभ ने जीया है वैसा शायद वे ही कर सकते हैं । लेकिन रांझणा जैसी हिट फिल्म से हिन्दी फिल्मों में आये साउथ के स्टार धनुश ने भी एक गूंगे शख्स को जिस शाइस्तगी से अमिताभ जैसे महान अभिनेता के सामन अभिनीत किया हैे, वो उनके एक बेहतरीन अदाकार होने का पुख्ता सुबूत है ।

ये दोनों तो अनुभवी अदाकार है लेकिन अक्षरा हासन जो महज उन्नीस बीस साल की बच्ची । उसे सो नबंरो से पास किया जा सकता है क्योंकि उसने अपनी डेब्यु फिल्म में दोनों अदाकारों के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ बढि़या अदाकारी करते हुये ये बताने की कोशिश की है कि वो भी बेहतरीन अदाकार मां बाप की औलाद है । इनके अलावा एक चैथा शख्स है कब्रिस्तान में कब्र खोदनेवाला अंजाना सा कलाकार, वो भी अपनी अदाकारी से प्रभावित किये बिना नहीं रहता । इनके अलावा धनुष के बचपन की भूमिका करता बाल कलाकार जब तक फिल्म में रहता है दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान बनी रहती है ।

फिल्म के लेखक निर्देशक बाल्की की बात की जाये तो दर्शक इस बात को पहले से ही जानता था कि अगर बाल्की हैं तो कुछ जरूर अलग देखने को मिलेगा । बाल्की उसके विश्वास पर खरे साबित होते हैं । उनका अमिताभ प्रेम फिल्म के हर फ्रेम में दिखाई देता ही है लेकिन धुनष और अक्षरा पर भी उनकी मेहनत साफ दिखाई देती है । फिल्म के संगीत के बारे में बात की जाये तो वो कहानी में गुंथा हुआ है लेकिन अमिताभ द्धारा गाये गाने के फिल्मांकन में उन्हें टाॅयलेट के कमोड पर बैठाकर प्रांउटिंग करना समझ से बाहर है दूसरे बाद में भी पूरे गाने में कमोड को हाईलाइट करना, एक हद तक भद्दा लगता है । बाल्की ने बेशक अमिताभ को लेकर सारी अच्छी फिल्में बनाई हैं लेकिन वे सिर्फ क्लास तक ही सीमित थी मास के लियेे नहीं । ये फिल्म भी क्लास के लिये है, मास के लिये नहीं । एक लाइन में अगर शमिताभ के बारें में कहा जाये तो एक बार फिर इसमें अमिताभ ने अभिनय के नये आयाम स्थापित किये हैं ।


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Mayapuri

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