मूवी रिव्यू: ‘एक भी वजह नहीं,देखने की’ ‘ वैलकम टू कराची’

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आशिष आर मोहन इससे पहले भी अक्षय कुमार के साथ एक फ्लॅाप फिल्म बना चुके हैं ।‘ वैलकम टू कराची’ में उनका ये क्रम जारी है । ये शायद पहली ऐसी पहली फिल्म में जिसमें पाक और इंडिया दोनों की घटनाओं को समान रूप से कुछ ऐसे यूज किया गया है कि दोनों तरफ के दर्शक फिल्म का भरपूर मजा लेने का आतुर थे लेकिन निर्देशक ने सब गुड़ गोबर कर दिया । कहानी शम्मी (अरशद वारसी) और केदार (जैकी भगनानी) दोनों लंगोटिया यार है लेकिन दोनों ही परले दर्जे के बेवकूफ भी हैं । इनमें से केदार अमेरिका जाना जाता है । हालांकि उसके पिता का कू्रज है जिसे वे किराये पर देते हैं ।

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एक बार दोनों उसी क्रूज के तहत दुर्घटना के शिकार बन कराची पहुंच जाते हैं । वहां उन्हें इंडियन जासूस समझ लिया जाता हैं लिहाजा उनके पीछे पाकिस्तानी इन्टेलीजेन्स ऐजेन्ट लाॅरेन लग जाती है । लेकिन वे एक के बाद एक अलग अलग संगठनों के हाथों का शिकार बनते रहते हैं । एक दिन ऐसा भी आता है कि उनके द्वारा किये गये कारनामें का श्रेय अमेरिका लेना चाहता है । लेकिन पाकिस्तान अमेरिका को झूठा करार देते हुए दोनों का अपनी इन्टेलीजेन्स के ऐसे जांबांज ऑफिसर घोषित कर देता है जिन्होंने तालिबान के पूरे जखीरे को अकेले उड़ा दिया । अंत में वे अमेरिका के ऐजेंटों की मदद से वापस इंडिया लौट पाते हैं । अभिनय फिल्म में जैकी की भूमिका को देखकर पता चलता है कि इस भूमिका को इरफान खान जैसा ब्रिलियंट एक्टर कैसे निभा पाता । बेशक इरफान के बाद भूमिका में काफी तब्दिली भी की गई लेकिन कितनी ? शायद इरफान को पहले से आभास हो गया था इसीलिये वे फिल्म से अलग हो गये ।

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जंहा तक जैकी की बात की जाये यंगिस्तान में उसने जो उम्मीद जगाई थी इस फिल्म के द्वारा उस उम्मीद को उसने और आगे बढ़ाया है । उसका गुजराती टोन में बोलना, उसके द्वारा की गई मेहनत को दर्शाता है । अरशद वारसी जैसे काॅमेडी के माहिर एक्टर अपनी अदाकारी ढंग से नहीं दर्शा पाये । कहने को तो लाॅरेन फिल्म की नायिका है लेकिन उसके फिल्म में मुश्किल से तीन या चार साधारण से सीन्स है। एक गीत में उसकी डांसिंग प्रतिभा को यूज किया है लेकिन वहां भी वे बेअसर साबित रही ।बाकी आर्टिस्टों का जिक्र करना बेकार ही होगा । निर्देशन जैसा कि बताया फिल्म की शुरूआत से उम्मीद जगाई जाती है कि एक अच्छी काॅमेडी फिल्म मिलने वाली है लेकिन जल्द ही एहसास हो जाता है कि दर्शक गलत सोच रहे थे ।

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क्योंकि फिल्म में कहानी है ही नहीं । और जो थोड़ी बहुत हैं भी तो निर्देशक ने उसके साथ भी सब गुड़ गोबर कर दिया । यानि फिल्म देखते हुए आपको शिद्दत से वो मुहावरा याद आता है कि कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानमति ने कुनबा जोड़ा । म्यूजिक जब फिल्म में मन नहीं लगता तो उसका कुछ भी अच्छा नहीं लगता । इसीलिये दर्शक की म्यूजिक के बारे में भी कोई अच्छी राय नही बन पाती । फिल्म क्यों देखें सच तो यही है कि एक भी ऐसी वजह नही जिसके लिये फिल्म देखी जा सके ।


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Mayapuri

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