बॉक्स ऑफिस रिव्यु – फिल्म ‘बदलापुर ब्वायज’

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कबड्डी जैसे पौराणिक खेल को लेकर, एक सार्थक प्रयास
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ये बहुत बड़ा परिवर्तन है कि अब दर्शक को खेलों पर बनी फिल्में भी खूब पंसद आ रही हैं ।  चक दे इंडिया,भाग मिल्खा भाग और मैरी काॅम जैसी स्र्पोट पर बनी सफल फिल्मों में अब करम मूवीज बैनर और लेखक निर्देषक शैलेश वर्मा की फिल्म‘बदलापुर ब्वायज’भी शामिल हो चुकी है । ये  हमारे पौराणिक खेल कबड्डी पर आधारित एक ऐसी फिल्म हैं जिसमें रोमांच के साथ एक संदेश भी  है ।

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बिहार में बदलापुर एक ऐसा गुमनाम गांव है जिसका प्रदेश के मुख्यमंत्री तक को पता नहीं । इसलिये वहां कोई प्रौग्रेस नहीं । बहुत पहले गांव का मुखिया उदय श्रीवास्तव कुछ लोगों के साथ कलैक्टर से मिलकर गुजारिश करने गया था कि खेती के हालातों में सुधार लाने के लिये बदलापुर गांव के लिये एक नहर बनवाने के लिये मुख्यमंत्री से अप्रोच कर दें । लेकिन कलैक्टर उल्टा उन्हें ही भाषण दे देता है तो गांव का एक बंदा कलैक्टर का चेतावनी देता है कि अगर उसने उनकी बात पंदरह दिनों के भीतर मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंचाई तो गांव का एक आदमी हर रोज आत्मदाह करना शुरू कर देगा उनमें सबसे पहला नाम उसका होगा । जब उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया जाता तो वास्तव में वो शख्स आत्मदाह कर लेता है ।

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लेकिन गांव वाले उसकी कुर्बानी को पागलपंथी कहते हुये मजाक उड़ाते हैं। यही नहीं, बाद में उसके बेटे निशान को  पागल का बेटा कहने लगते हैं । निशान गांव के जमींदार अमन वर्मा की नोकरी में बड़ा होता है । उसे को कबड्डी का जुनून तक शौक है लेकिन गांव की टीम में उसे खेलने नहीं दिया जाता । इसलिये वो अकेला ही कबड्डी की प्रेक्टिस करता रहता है । एक दिन उसे षहर से आये कबड्डी कोच अनु कपूर देख लेते हैं और उसे कल का प्रतिभावान खिलाड़ी मानते हुये प्रौत्साहित करते हैं । दरअसल बदलापुर की कबड्डी टीम हारने के लिये मशहूर हैं । एक बार टीम में निषान को खेलने का मौंका मिलता है तो उसके खेल को देख गांव में मेहमान आई एक लड़की सरन्या मोहन उसे प्यार करने लगती है । एक दिन निशान पेपर में पढ़ता हैं कि शहर में कबड्डी की बड़ी प्रत्योगिता होने जा रही है, उसमें अगर उसके गांव की टीम को खेलने का मौंका मिल जाये तो उसे वहां के चीफगेस्ट मुख्यमंत्री से मिलने का अवसर मिल जायेगा और वो उनसे गांव के विकास को लेकर वो बात कह पायेगा जो बरसों पहले उसके पिता कहना चाहते थे । उनकी टीम शहर आ जाती है । वहां उनकी मुलाकात अनु कपूर से होती हैं तो वे उन्हें समझाते हैं कि ये स्टेट लेबल का टूर्नामेंट है इसमें वे डायरेक्ट नहीं खेल सकते । दूसरे गांव और यहां की कबड्डी के रूल भी अलग हैं जिनके बारे में उन्हें कुछ नहीं पता । इसलिये वे इस बार सिर्फ इस गेम को देखें और समझे । अचानक एक टीम का एक्सिडेंट हो जाता है । इसलिये अनु कपूर की बदौलत बदलापुर की टीम को  सीधे स्टेट लेबल पर खेलने का मौंका मिल जाता है । अनु टीम को समझाते हैं कि वे अभी तक इसलिये हारते आये हैं क्योंकि वे अपने लिये खेलते हैं टीम के लिये नहीं ।

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अगर वे टीम के लिये खेले औरमिलकर खेलें तथा सामने वाली टीम का डर  निकाल दे तो वे भी विजेता बन सकते हैं । रेल्वे टीम जिसके अनु कपूर कोच हैं का कॅप्टन बदलापुर टीम को लेकर  उनसे बदतमीजी कर देता है ता अनु कपूर वहां से रिजाइन कर बदलापुर ब्वायज टीम के कोच बन जाते हैं । उनकी कोचिंग में बदलापुर टीम आश्चर्यजनक तौर पर  सारी टीेमों को हरा कर  सेमी फाइनल तक पहुंच जाती है लेकिन इस बीच रेल्वे टीम का कॅप्टन निशान कोबुरी तरह घायल करवा देता है । लेकिन निशान घायल होते हुये भी फाइनल में खेलने का निर्णय लेता है और फाइनल में अपनी टीम को जीत हासिल करवाने के बाद दम तौड़ देता है । लेकिन इस बार उसकी कुर्बानी जाया नहीं होती क्योंकि उसके बारे में अनु कपूर मुख्य मंत्री को बताते हैं कि बरसों पहले उसके पिता की कुर्बानी को पागल करार दिया गया था । इसलिये कबड्डी उसके लिये एक खेल नहीं बल्कि एक मिशन था, जिसके लिये उसने अपनी जान तक दे दी । लिहाजा मुख्यमंत्री के प्रयास से गांव में इतना विकास हुआ कि पूरा गांव सम्पन हो गया ।

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फिल्म के लेखक शैलेश वर्मा की बतौर डायरेक्टर ये पहली फिल्म है । शैलेश वर्मा ने अपने कॅरियर की शुरूआत टीवी से की थी । उसके बाद उसने अनिल शर्मा जैसे मेकर की फिल्में लिखी और अब वे इस फिल्म से निर्देशक बने और सफल साबित हुये ।हांलाकि इन दिनों एकाएक कबड्डी को आगे बढ़ाने के लिये अभिशेक बच्चन जैसे स्टार भी आगे आये हैं । उनकी बाकायदा अपनी एक टीम है । लेकिन शैलेश ने इस खेल पर उतनी ही उम्दा फिल्म बनाई है जितना कि स्र्पोट पर कुछ और फिल्में बनी है ।

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कबड्डी जैसे खेल में भी उन्होंने वही उत्साह और रोमांच भर दिया है जो क्रिकेट में दिखाई देता है । उन्होंने खेल के माध्यम से सरकारी तंत्र पर तीखा प्रहार करते हुये बताया है कि किस प्रकार अफसर शाही गरीब किसानों का शोषण करती है । इसके अलावा फिल्म में खेलों में भ्रश्ट पाॅलिटिक्स का भी प्रभावशाली ढंग से पर्दाफाश किया है । ये सब दिखाते  हुये  शुरू से अंत तक निर्देशक ने कहीं भी फिल्म को बोझिल या सुस्त नहीं होने दिया । जहां तक कलाकारों की बात की जाये तो निर्देशक ने अपनी स्क्रिप्ट पर भरोसा जताते हुये ज्यादातर नये कलाकारों को मौंका दिया और उनसे बेहतर काम करवाया  है  जैसे निशान ननैया, इससे पहले कुछ साउथ की फिल्में कर चुके है वे अपनी भूमिका में खूब फबे हैं । सरन्या मोहन खूबसूरत लगी है गानों में पता चलता हैं कि वो एक निपुण डांसर है । पूजा गुप्ता को ज्यादा स्पेस नहीं मिल पाया इसलिये उसकी भूमिका रजिस्टर्ड नहीं हो पाती । गांव के मुखिया के तौर उदय श्राीवास्तव ने बढ़िया काम किया हैं । अमन वर्मा भी छोटी सी भूमिका में ठीक ठाक रहे । लेकिन फिल्म के दो मजबूत पाये रहे अनु कपूर और किशोरी शहाणे । दोनो ने ही अपनी भूमिकाओं में अपने अनुभव का खूबसूरती से इस्तेमाल किया ।फिल्म का संगीत कहानी में गुंथा हुआ है । फिल्म का लुक  तथा लोकेशंस सभी कहानी को वास्तविकता प्रदान करते है। अंत में कहना होगा कि स्र्पोट पर बनी बदलापुर ब्वायज जैसी संदेशात्मक छोटे बजट की फिल्मों के लिये प्रशासन की जिम्मेदारी बन जाती है कि वे ऐसी फिल्मों को देशभर में टेक्स फ्री करें जिससे फिल्म तक आम दर्शक अपनी पहुंच बना सके ।


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Mayapuri

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