फिल्म ‘कोर्ट’ (सेमी मराठी) आम दर्शक से दूर, फिल्म फेस्टिवल की फिल्म

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अक्सर देखा गया कि ढेर सारे फिल्मी मेला में घूमने वाली और वहां से इनाम इकराम हासिल करने वाली फिल्में मनोरजंन करने आये दर्शकों को ये सोचने पर मजबूर कर देती है कि वो उन मनोरजंन हीन फिल्मों पर क्यों पैसा खर्च करे । निर्देषक चेतन्य तम्हाणे की फिल्म ‘कोर्ट ’ कितने ही फिल्म मेलों में घुम चुकी ऐसी ही फिल्म है ।

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कहानी के बार में अगर बताया जाये तो फिल्म में एक गटर साफ करने वाला शख्स आत्महत्या कर लेता हैं लेकिन उसे आत्महत्या करने के लिये प्रेरित करने का इल्जाम एक सोशल लोकल सिंगर पर लग जाता है । उसी को लेकर बताया गया है कि बाद में हमारी अदालतों में ऐसे हजारों केसों का लेकर क्या सिस्टम हैं क्यों वे सालों साल चलते रहते हैं ।

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फिल्म में बताया गया है कि हमारे कोर्ट असलियत में क्या और कैसे हैं । वहां क्या होता है और कैसे होता है। लेकिन दर्शक को क्या पड़ी है कि वो अपनी जब से पैसे खर्च कर ये सब देखे । हो अगर कोई कहानी है और उससे कोर्ट जुड़ा है तो भी कुछ बात बने लेकिन खाली कोर्ट की कार्यवाही कैसे होती है, एक वकील की जाति जिन्दगी उसके घर का माहौल और सरकारी वकील जो कि एक लेडीज है उसका घर उसकी जाति जिन्दगी ।  कुछ अरसा पहले एक फिल्म आई थी ‘जॉली एल एल बी’ उस फिल्म में भी हमारी अदालतों की कार्यवाहीयों को प्रभावशाली ढंग से उजागर किया था लेकिन साथ ही उसमें एक कहानी थी, इमोशन था और और बढ़िया कन्टैन्ट था । इसीलिये वो फिल्म हर दर्षक वर्ग ने पंसद की थी । लेकिन भला दर्षक को कोर्ट और वकीलों की जाति जिन्दगी से क्या लेना देना । फिल्म जैसे षुरू होती है वैसे ही अचानक खत्म हो भी जाती हैं  ये फिल्म कथित बुद्धिजीवी दर्षक ही देखेंगा, वरना आम दर्शक तो अपने आपको ठगा सा महसूस करता हुआ सिनेमा हाल से बाहर निकलता है।

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Mayapuri

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