बॉक्स ऑफिस रिव्यु : फिल्म‘ खामोशियां’ – डर है लेकिन पकड़ नहीं

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भट्ट कैंप के चर्चित जॉनर हॉरर थ्रिलर से ही उनके एक और रिश्तेदार करन दारा ने फिल्म ‘खामोशियां’ से निर्देशन में डेब्यु किया है । इस फिल्म की कहानी भी प्रेत और आत्माओं के जाल में पिरोई गई है ।
अली फज़ल एक राइटर है लेकिन वो एक अधूरा आदमी है ऐसा अधूरा शख्स जो एक काम भी पूरा नहीं कर पाया । न ही अपनी प्रेमिका देबुना चौधरी से शादी कर पाया और न ही दो दो किताब शुरू करने के बाद उन्हें कंपलीट कर पाया । जब उसे इस बात का एहसास होता है तो अपने आपको पूरा करने के लिये कहीं दूर काशमीर जैसी जगह चला जाता हैं  और एक टूरिस्ट होटल में ठहरता है जहां उसे जल्दी ही एहसास हो जाता है कि वहां किसी आत्मा का साया है । वहां उसके अलावा  एक और इन्सान है और वो है उस होटल की मालकिन सपना पब्बी । सपना से उसे पता चलता है कि वहां सिर्फ वो और उसके अपाहिज पति गुरमीत चौधरी ही रहते हैं । धीरे धीरे कड़िया खुलनी शुरू होती हैं तो अली को पता चलता है कि सपना का पति जिन्दा नहीं है । वो उस होटल में अपने पति की आत्मा की कैदी है । इस बीच वो सपना से प्यार करने लगता है सपना भी उसे चाहती है । तब वो सकंल्प लेता है कि कैसे भी वो सपना को उस आत्मा से आजाद करवा कर ही दम लेगा । इस तरह अली को एक मकसद मिल जाता है जो बाद में उसकी नई किताब का विषय भी बनता है ।
इस तरह की फिल्मों में किरदार लगभग एक जैसे ही होते हैं । इसलिये दर्षक फिल्म देखते हुये संभल कर बैठता है जिससे वो अचानक डर न सके जैसे कि ऐसी फिल्मों में डराने की कोशिश की जाती है । फिर भी इस बार निर्देशक करन दर्शक को कई जगह अपनी सीट से उछलने के लिये मजबूर करने में कामयाब रहे हैं । अली फज़ल ने एक उपन्यासकार की भूमिका को भली भांती निभाया है । गुरमीत चौधरी फिल्म में सरप्राइज की तरह हैं । सपना पब्बी बस ठीक ठीक रही । छोटे रोल में देबुना चौधरी भी दिखाई देती हैं । विक्रम भट्ट की कहानी में नयापन है । जिसे निर्देशक करन दारा ने कुशलता से अंजाम तक पहुंचाया । बैकग्राउंड म्युजिक कई जगह थ्रिल पैदा करता है । फिल्म के हॉरर सीन कई जगह डराने में सफल हैं । बावजूद इसके फिल्म दर्शकों की पसंद पर खरी साबित नहीं हो पायेगी क्योंकि फिल्म में डर है लेकिन पकड़ नहीं ।


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Mayapuri

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