बी आर चोपड़ा, वो अमर हस्ती जिनकी अमिट कृतियाँ आज भी सर चढ़ कर बोल रही हैं

1 min


★सुलेना मजुमदार अरोरा★

कोविड 19 के माहौल में कल्ट फिल्मों और कल्ट टीवी सीरीज़ के मेकर, बी आर चोपड़ा कृत  ‘महाभारत’ की गूँज, ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन’ आज घर घर में सुनाई दे रही है। यही गूँज पचास के दशक से अस्सी के दशक तक के सुनहरे दौर में बी आर चोपड़ा कृत प्रत्येक फ़िल्म की पहचान बन गई थी जब वे सिनेमा जगत के पुराने ढर्रे और परम्पराओं को चुनौती देती अपनी फिल्मों , जैसे  ‘नया दौर,  साधना, कानून, गुमराह, हमराज़, द बर्निंग ट्रेन, इंसाफ का तराजू, निकाह, आवाम, जैसी फिल्मों में एक तरह की क्रांति का बिगुल बजाने लगे थे। आज  फिर से उन फिल्मों की यादों के साथ याद आ रही है बी आर चोपड़ा जैसे दिग्गज से वो मुलाकातें जो आज से इक्कीस वर्ष पहले अक्सर  हुआ करती थी। मेरे लेखन गुरु स्व पन्नालाल व्यास जी ने मुझे बताया था कि मायापुरी के प्रोपराइटर तथा तत्कालीन संपादक श्री ए पी बजाज जी  के साथ बी आर चोपड़ा जी के बहुत पुराने  और घनिष्ठ पारिवारिक सम्बंध थे, जिसके चलते जब जब बजाज साहब दिल्ली से मुंबई आते वे बी आर चोपड़ा जी के साथ जरूर मिलते थे और चोपड़ा जी जब दिल्ली जाते तो बजाज साहब उनका पूरा ख्याल रखते थे।

  इस जानकारी के बाद जब जब बड़े बजाज जी मुम्बई आकर चोपड़ा जी से मिलने जाते मैं भी उनके साथ हो लेती थी। ये मुलाकातें कभी उनके ऑफिस में, कभी नटराज स्टूडियो तो कभी सेठ स्टूडियो में होती थी। मुझे याद है ऐसे ही एक मुलाकात के दौरान चोपड़ा साहब और बजाज साहब में पुराने दिनों की बातें छिड़ गई। दोनों अन डिवाइडेड पंजाब के कैपिटल लाहौर से थे, मायापुरी ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन उन दिनों भी अरोरबंस प्रेस के नाम से मशहूर थी और बी आर चोपड़ा, एम ए करने के बाद फ़िल्म पत्रकार के रूप में कई पत्र पत्रिकाओं में लिखने लगे थे , सम्पादक ए पी बजाज और लेखक बी आर चोपड़ा की मुलाकातें इसी सिलसिले में हुई थी, इन्ही दिनों बी आर चोपड़ा की दोस्ती बजाज साहब के दोस्त आई एस जोहर के साथ भी हुई और चोपड़ा जी ने आई एस जोहर की एक स्क्रिप्ट पर आधारित फिल्म ‘चाँदनी चौक’ की नींव रखी लेकिन अचानक लाहौर में भयानक मारा कट्टी शुरू हो जाने से चोपड़ा परिवार को वहाँ से भागना पड़ा। फिर भारत पाकिस्तान के विभाजन हो जाने से चोपड़ा परिवार और बजाज परिवार दोनों दिल्ली शिफ्ट हो गए जहां बजाज साहब अपनी अरोरबंस प्रेस को नई ऊँचाइयों की तरफ ले जाने की ओर प्रयासरत हो गए और चोपड़ा साहब ने मुंबई जाकर फ़िल्म ‘करवट’ का निर्माण शुरू कर दिया।

बातचीत के बीच वे बोले, “बजाज साहब, आपको पता है,  मैं कभी हार मानने वालों में से नहीं हूँ, लेकिन हूँ तो इंसान ही न, मुंबई में नया था, बड़ी हिम्मत से एक के बाद एक फिल्में बनाई थी, करवट, शोले (पुरानी) चाँदनी, साहिल, लेकिन ये सारी फिल्में फ्लॉप हो गई, मन कुछ ऐसा टूटा कि इस छलावे की दुनिया को छोड़ वापस दिल्ली आ जायूँ, वहाँ आप सबसे मिलकर फिर से प्रेस की दुनिया जॉइन कर लूँ लेकिन मेरा जिद्दी मन आड़े आ गया, मुझे धिक्कारने लगा कि हार कैसे मान गया तू? और फिर मैंने अपने टूटे बिखरे बजूद को फर्श से एक एक करके  चुना और डटकर खड़ा हो गया। वो दिन और आज का दिन मैंने पलट कर पीछे नहीं देखा।” पन्नालाल व्यास जी ने उनसे पूछा था “आपने उस रूढ़िवादी ज़माने में ऐसी ऐसी फिल्में बनाई जो विवादस्पद कहलाई जाती थी, जैसे  विवाहिता स्त्री का पर पुरुष से रिश्ता जोड़ना, किसी वेश्या को भद्र समाज में स्थान मिलना, और तो और नाजायज सन्तान को समाज द्वारा स्वीकारा जाना,  आपको समाज द्वारा अपनी फिल्मों को अस्वीकृत होने का डर नहीं लगा?”

इस प्रश्न पर चोपड़ा साहब ठठाकर हँस पड़े और बोले, “ये प्रश्न आप आज कर रहें हैं, मैं तो उस ज़माने के बड़े बड़े फ़िल्म कारों से रोज़ इस तरह के प्रश्न सुना करता था, बल्कि वे सब तो मुझे धमकी भरा उपदेश देते थे कि “बलदेव (बलदेव राज) सुधर जाओ, अंगारों से मत खेलो, मुश्किल से इंडस्ट्री में जगह बनाई है वहां से उठा कर यही इंडस्ट्री तुम्हे चुटकी में बाहर फेंक देगी, हम लोगों की तरह फिल्में बनाओ जो समाज स्वीकारे, औरत की आंखों में शोले नहीं आँसूं ही होने चाहिए, उसकी आँचल में हिम्मत नही सिर्फ दूध होना चाहिए, और वेश्याओं को सम्मान देने जाओगे तो मुँह की खाओगे।” लेकिन मैंने किसी की नहीं मानी, महान फिल्मकार महबूब साहब ने भी मुझसे खुद मिलकर कुछ ऐसे ही कहा था कि इतनी हिम्मत ठीक नहीं , मैंने उनसे भी आँखे मिला कर कहा था, “मैं चाहे डूब जाऊं या खाक में मिल जाऊँ लेकिन फिल्में तो वही बनाऊँगा जो मेरा दिल चाहेगा, और मैं जीवन भर वही करता रहा। मैं समझता हूँ कि फिल्मों में व्यावसायिक मनोरंजन, सस्पेंस, थ्रिल म्यूज़िक, दिल छूने वाले गीत, हिम्मत बढ़ाने वाले गाने (ना मुँह छुपा के जिओ, ये देश है वीर जवानों का, तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा जैसे उनकी फिल्मों के गीत,) के साथ साथ समाज सुधारक मैसेज ज़रूर होना चाहिए, मैंने ऐसी ऐसी रिस्की और विवादास्पद विषयों पर फिल्में बनाई जिसे एस मुखर्जी, महबूब, राजकपूर, बासु भट्टाचार्य जैसे महान फ़िल्म मेकर्स ने बनाने से मना कर दिया।

लेकिन शायद मेरी सोच और मेहनत का कॉम्बिनेशन टैली कर गया और मेरी लगभग सारी फिल्मों ने सफलता प्राप्त की (जो सफल नहीं भी हुए वो भी चर्चे में रही) और एक दिन जब मेरी फिल्म की सफलता का उत्सव मनाया जाने लगा तो खुद महबूब साहब ने उसमें चीफ गेस्ट बनने की इच्छा जाहिर की और कहा, “मुद्दई लाख बुरा चाहे क्या होता है, वही होता है जो मंजूरे खुदा होगा है। वेश्यावृत्ति पर जो फ़िल्म मैंने बनाई थी ‘साधना’ जिसपर कहा गया था कि भद्र घर की औरतें इस फ़िल्म को दुत्कार देगी लेकिन मैंने खुद हर सिनेमाघर में जा जा कर देखा तो दंग रह गया, दर्शकों में स्त्रियों की तादात पुरूषों से ज्यादा थी। कमाल की बात ये थी कि ‘साधना’ से पहले जो भी फिल्में वेश्याओं पर बड़े बड़े दिग्गज़ फ़िल्म मेकर्स (जैसे वाडिया, विजू भट्ट) ने बनाई उसे दर्शकों ने नकार दिया।” बी आर चौपड़ा से हमारी हर मुलाकात की हर बात उनके जोश और जुनून की बानगी होती थी, ‘एक ही रास्ता’ का विवादास्पद विधवा विवाह हो, ‘नया दौर’ का मशीन से मानव शक्ति का टकराव, ‘साधना’ का वेश्यावृत्ति और वेश्या को एक अलग नज़र से तौलने की कोशिश, ‘कानून’ का मर्डर मिस्ट्री, ‘गुमराह’ का शादीशुदा रिश्ते में व्यभिचार (जिसके लिए उन्हें बेस्ट हिंदी फ़िल्म का इंडियन नैशनल फील्म अवार्ड हासिल हुआ) ‘हमराज’ का अर्थपूर्ण सस्पेंस थ्रिलर (जिसके लिए उन्हें पहली बार इंडियन नेशनल  फिल्म फ़ॉर बेस्ट डाइरेक्टर अवार्ड हुआ) ‘इंसाफ का तराज़ू’ जिसमें रेप जैसे क्राइम पर फोकस किया, उनकी हर फिल्म एक मिसाल कायम कर गई।

बी आर चोपड़ा का वजूद जो शुरुआत के फिल्मी सफर में किरचों में बिखर गया था वो आगे हिंदी सिनेमा के इतिहास में विराट ऊंची कद काठी के साथ ऐसा तन कर खड़ा हुआ कि उन्हें जब दादा साहेब फाल्के अवार्ड प्रदान किया गया तो वो दादा साहेब फाल्के अवार्ड का सार्थक होना माना गया। 22 अप्रैल 1914 को जन्में बलदेव राज चोपड़ा का 5 नवम्बर 2008 को देहावसान होने से सिनेमा जगत की अपूर्ण क्षति अवश्य हुई परन्तु वे जो कर गए वो अमिट अमर रह गया। वे सिर्फ एक धुरन्धर फ़िल्मकार ही नहीं बल्कि एक अच्छे इंसान और अपने सात भाई बहनों में से एक ऐसा भाई भी साबित हुए जिसने सबका केअर किया, बताया जाता है कि अपने छोटे भाई यश चोपड़ा को सही दिशा दिखाने और फ़िल्म इंडस्ट्री में खड़ा करने वाले बी आर चोपड़ा ही थे, जिन्होंने फ़िल्म ‘धूल का फूल’ की जिम्मेदारी यश को सौंपकर उन्हें भी अर्थपूर्ण फ़िल्म मेकिंग की राह पर खड़ा किया। ‘धूल का फूल’ भी अवैध सन्तान की विवादास्पद विषय पर आधारित थी।

★सुलेना मजुमदार अरोरा★


Like it? Share with your friends!

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये