दिल दा मामला है.. कुछ ते करो सजन – चच्चा फिल्मी

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चच्चा फिल्मी आज एक नये ही अंदाज में नजर आये। हाथ में डफली, पावों में घुंघरू.. और ढेढ पंजाबी कपड़े पहने पूरे मौहल्ले में दनदनाते फिर रहे थे।
“नी मैं कमली यार दी कमली” अपने फटे ढोल से गल्ले से बेसुरा डकार लेकर गाये जा रहे थे। मैंने बामुश्किल उन्हें रोका।
“क्या बात चच्चा, आज ये सूफ़ीयाना बुखार क्यों चढ़ गया तुम्हें ?” मैनें उनको डफली बजाते हुये रोका और बोला।
“दिल दा मामला है.. कुछ ते करो सजन, तौबा खुदा के वास्ते.. राइटर, अब तो डरो सजन.. दिल.. दा मामला है।“ चच्चा उछल उछल कर लहराते हुये झूलझूलाये।
“लगता है गुरदास मान जी से मिल कर आ रहे हो चच्चा, तभी बासी कढ़ी में उबाल आ रहा है। तभी मामला गड़बड़ है।“ मैनें अपने दातों के पिछवाड़ें हंसी दबाते हुये पूछा।
‘’क्या बात कर रहे हो हुजूर.. मान साहब तो मेरे बचपन के लगोंटिया यार है। पटियाले में बीर जी के मंदिर में हम इकट्ठे नाटक की रिहर्सल किया करते थे। दर्शन की ढोलकी पर गाने गाया करते थे। अरे पटियाला से दिल्ली उनकी शादी तक मैनें करवाई थी। तुम क्या जानो राइटर बाबू।“ चच्चा फिल्मी गुरदास मान स्टाइल हाथ लहरा के पिनपिनाए।
“क्या फलतू की बात करते हो चच्चा, तुम भला उन्हें कैसे जानते हो, तुम तो सारी उम्र लखनऊ की गलियों में कंचे खेलते रहे हो।
जवानी तुम्हारी मुजफ्फर नगर में रेवड़ी और मूंगफली बेचते गुजरी है और ये नासपीटा बुढ़ापा यहां बरेली के सुरमा बाजार में पान की पीकें लहराते गुजर रहा है। भला, पंजाब की शान, गुरदास मान से तुम्हारा क्या जोड़ ?” मैनें उनकी पोल पट्टी खोलते हुये कहा।
“ओहे होये.. वाह रे मेरे कलम के कचरे, तू बड़ा स्याना बन रहा है। अरे 1982 में मैनें ही उन्हें पहला चांस दिया था टी वी पर.. दिल दा मामला.. गाने के वक्त.. और तो और उन्हें मुंबई भी मैं ही लेकर गया था.. उन्हें बेलस्काट टावर में 19 वीं मंजिल पर फ्लैट मैनें ही लेकर दिया था। पंजाबी फिल्मों को सुपर हिट बनाने में गुरदास मान का सबसे बड़ा हाथ है तो मेरा पूरा शरीर लगा है.. अरे उस दिन मेरे साथ संजीव छिब्बर के ऑफिस में रोटी खाते खाते उनको ‘रोटी’ गाना याद आया और उन्होंने लिख दिया।“ चच्चा बिना ढील दिये छौड़ते हुये फुसफुसाए।
“पर चच्चा, मान साहब पिछले 35 सालों से अपनी सबसे ऊंची पायदान पर कायम है। आज उन्होंने एक गीत ऐसा नहीं लिखा जो परिवारिक ना हो। और आप तो किसी परिवार या मोहल्ले में रहने लायक नही हो चच्चा।“ मैनें गुस्से में चच्चा को डांटते हुये कहा।
चच्चा फिल्मी ने जवाब नही दिया बस डफली बजाते हुये ‘हीर’ गाते गली में गायब हो गये।
पर बात सच्ची याद दिला गये कि अगर पंजाबी संगीत को पाक पवित्र और खुदाई नूर का रूतबा मिला है तो उसमें सबसे बड़ा योगदान गुरदास मान की कलम व गायकी का है। उनको सभी प्यार करते हैं। युगों युगों तक उनकी आवाज़ हमें अदब, रूहानियत व जहनियत का सुकून देती रहेगी।
                                                                                                                                                                                                  (लेखक हरविन्द्र मांकड़)

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