चच्चा फिल्मी से बड़ा खिलाड़ी कोई नही…! चच्चा फिल्मी

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मैं अक्सर सोचता हूं कि अगर हिन्दी फिल्मों में फिटनेस फंडा यदि कोई जानता है तो वो है अक्षय कुमार। पहली फिल्म से लेकर आज तक उन्होनें अपनी ताजगी व फिटनेस बरकरार रखी है। तभी उन्हें परफेक्ट खिलाड़ी कुमार भी कहा जाता है। यह बात कल रात मैनें चच्चा फिल्मी से इस बात का जिक्र कर दिया था। बस आज सुबह ही मौहल्ले में ‘हुदहुद’ आ गया। चच्चा कभी एक छत से दूसरी छत कूद रहे थे तो कभी कॉकरोच की मूंछ पकड़ कर फियर फेक्टर दिखा रहे थे।

“क्या बात है चच्चा, लगता है रात की बात बदहजमी बन कर गैस बन गई। तभी पूंछ कटे लंगूर की तरह गुलाटियां खा रहे हो।“ मैनें मानों ना जानने वाली भाषा में उनको कहा। “खिलाड़ी चच्चा कहो बर्खुरदार.. अब चच्चा खिलाड़ियों के खिलाड़ी बन गये हैं। शौकीन बन गये हैं। खतरों के खिलाड़ी का अगला सीजन मैं अपने मोहल्ले की पानी की टंकी पर चढ़कर पिनपिनाउंगा।“ चच्चा फिल्मी कॉकरोच को मेरे ऊपर फेंक कर बुलबुलाए।

“कैसी अहमकों जैसी बातें करते हो चच्चा! अक्षय कुमार सीरियस, कॉमेडी, एक्शन हर तरह के रोल कर-कर के अपने आप को काबिल सिद्ध कर चुके हैं और आप..आप तो पांचवी क्लास के बाद मदरसे को तलाक तलाक तलाक कहकर अपनी कंचे खेलने वाली टीम में जा घुसे थे।“ मैनें चच्चा की एकमात्र सूख चुकी रग पर हाथ रखा।

“लाहौल विला कुव्वत.. तुम नामाकूल के नामाकूल ही रहे राइटर की दुम.. अरे वो कहां का खिलाड़ी.. वो तो ट्विंकल खन्ना का कमाल है.. वो उसे एकदम फिट रखती है। उसको योगा करवाती हैं। भई काका की बेटी है.. तभी तो अक्षय सुपर स्टार बना हैं। मैं तो मियां, तुम्हारी चच्ची की वजह से मात खा गया। वर्ना आज मेरी भी चालीस इंच की छाती होती.. मैं भी कराटे व मार्शल आर्ट का मास्टर होता.. खिलाड़ियों का खिलाड़ी होता.. दगा दे गई दीमक लगी किस्मत.. वर्ना एक जमाने में अक्षय कुमार को पायजामा पहनना मैनें सिखाया। उसको राजेश खन्ना का दामाद मैनें बनवाया। फिल्म दिलवाई.. पर आज देखो.. बस चच्ची मनहूस दगा दे गई.. वर्ना..” चच्चा अपनी धुन में बकबकाते बाहर निकाल गये।

कितना कड़वा सच है यह, हम अपनी नाकामियों का घड़ा हमेशा दूसरों के सर पर फोड़ते हैं। दूसरों की सफलता को आसान समझते है। यह भूल जाते हैं कि अक्षय कुमार ने अपने काम और फिटनेस को बरकरार रखने के लिए कड़ी मेहनत की है। तभी वो इस मुकाम पर है। चच्चा फिल्मी को कौन समझाये कि दूसरों की सफेद कमीज देखकर अपनी कमीज नही फाड़नी चाहिए।

                                                                             (लेखक हरविन्द्र मांकड़)


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