‘बच्चन साहिब खाते क्या है? चच्चा फिल्मी

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chcha filmi1 सात हिन्दुस्तानियों में से एक गूंगा हिन्दुस्तानी जो जब तक नहीं बोला लोगों ने समझा शायद उसमें बोलने की ताकत ही नही है। पर जब उसने अपनी जुबाना पर लगी जंजीर तोड़ी तो भारतीय सिनेमा को वो नगीना मिला जिसकी चमक आज तक जगमगा रही है। मैं अमिताभ बच्चन जी की बात कर रहा हूं। जिस उम्र में लोग रिटायर होकर घर में खटिया तोड़ते है, उस उम्र में बच्चन साहिब सरे आम कहते है कि बुढ्डा होगा तेरा बाप।

पर मैं अपनी आखों पर विश्वास का चश्मा नहीं पढ़ा पाया जब मैनें चच्चा फिल्मी को आगे से कमीज को गांठ मारे देखा। मुंह में बनारस का पान डाले देखा और एक हाथ कमर पर और दूसरा अदा से आगे कर के ‘ऐय’ बोलते सुना।

‘क्या बात चच्चा, यह तुमने खाल कब से बदल ली। केंचूंए से नागराज बनने का ख्याल कैसे आ गया ? मैं हक्का-बक्का उनकी अमिताभ स्टाइल परफार्मेंस देख कर सकपका रहा था।

‘अरे कलम के अधमरे छछुंदर मैं को कालिया हूं काला पत्थर हू ‘पा’ हूं रिश्ते में तो हम तुम्हारे चच्चा लगते है नाम है चच्चा फिल्मी पिनपिना कर अपने हिचकोले खाते नाजुक बदन को किसी तरह संभालते हुये कुलबुलाए।

‘पर चच्चा’ यह अचानक ‘डॉन’ बनने का ख्याल कैसे आया ? अमिताभ की नकल करने वालों की तो मायानगरी में लाइन लगी है “तुम कहां खड़े रह पाओगे” मैंने चच्चा फिल्मी की मिचमिचाती आंखों में आखें घुसेड़ कर कहा।

‘लो कर लो बात अरे हम जहां खड़े हो जाते है, लाइन वही से शुरू हो जाती है। पर राइटर, एक बात मुझे ना अमिताभ बच्चन के “शैफ का पता चाहिए” चच्चा बनावटी अदा से हिनहिनाते हुये बड़बड़ाए।

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‘‘क्या इरादा है चच्चा… भला तुम उनके रसोइए से मिल कर क्या करोगे?’’ मुझे वाकई आश्चर्य हुआ कि चच्चा को यह कहां की कौड़ी सूझी।
‘‘अरे मेरे टूटे पेन वाले कहानीकार, जरा सोच… अमिताभ बच्चन का रसोइया आखिर ऐसा क्या पका के खिलाता होगा जो इस उम्र में भी वो जवान जवान लोगों को एक्टिंग में पानी पिला रहे हैं। कई महारथी बाॅलीवुड में आये और अपनी लुंगी समेट कर चले गये। पर अपने बच्चन साहिब.. उसी फुर्ती से, उसी ताकत से एक के बाद एक फिल्में ठोके जा रहे हैं। यह कमाल उनका नहीं है… यह तो उनके रसोइए का करिश्मा है, जो ना जाने क्या तिलस्मी व्यंजन खिलाता है कि बिग बी दिनों दिन निखरते चले जा रहे हैं।’’ चच्चा फिल्मी पूरे जोश में दनदनाए।
बात बेशक चच्चा फिल्मी के दिमाग से निकली हो पर इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि यह भारतीय सिनेमा के लिए गर्व की बात है कि इतने वर्षों से यह सितारा अपनी चमक दिन प्रतिदिन चैगुनी कर रहा है।
हम तो दुआ करते हैं कि अमिताभ बच्चन जुग जुग जीयें और चच्चा फिल्मी जैसे उनके दीवाने कभी बनारस का पान चबाए या विजय बनकर ‘दीवार’ लाघें.. बस उनकी फिल्मों का ‘सिलसिला’ सदा  यूं ही चलता रहना चाहिए।

(लेखक हरविन्द्र मांकड़)

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