होली तो होती थी राजकपूर की – चच्चा फिल्मी

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हाथ में पिचकारी, जेब में गुलाल, पूरी तरह रंगों से सनसनाते चच्चा फिल्मी पूरे मौहल्ले में दनदनाते फिर रहे थे। सामने कोई बच्चा आ जाये या बुजुर्ग या कोई मोहतरमा, चच्चा की पिचकारी पान की पीक से भी तेज धार से सामने वाले को कलर टीवी बना रही थी।
मैं मना करता रह गया पर चच्चा फिल्मी भला कहां मानने वाले थे। शोले फिल्म का गाना डकारते हुए मुझ पर पिचकारी फुसफसाते हुए हिलहिलाए।
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‘‘अरे, चच्चा, मेरे नये कुर्ते का बोलो राम कर दिया’’ मैं अपने नये कुर्ते पर लगे रंगों को देखकर तिलमिलाया।
‘‘बुरा ना मानो होली है… राइटर की दुम… होली के दिन गुस्सा नहीं करते। हेमा मालिनी ने धमेन्द्र की होली का बुरा नहीं माना, कैटरीना ने रणबीर कपूर की पिचकारी को अपना लिया, फिर भला तू कहानीकार क्यों फुनफुना रहा है।’’ चच्चा फिल्मी अपने टूटे दातों से हवा छोड़ते हुए पिनपिनाएं
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‘‘अरे चच्चा, आजकल की होली भी खाक होली है। होली तो होली थी पुरानी फिल्मों की, सुनील दत्त की ‘जख्मी’ फिल्म की होली, धर्मेन्द्र की ‘फागुन’ फिल्म की होली, अमिताभ बच्चन की ‘सिलसिला’ फिल्म की होली… आजकल तो रंग भी नकली हैं और हीरो हीरोइन भी।’’ मैंने चच्चा को गुलाल लगाते हुए कहा।
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‘‘ओये होये…मेरी पिलपिलाती रंगों को जगा दिया राइटर..होली तो होती थी राजकपूर साहब की.. सारा बाॅलीवुड उनके आर.के. स्टूडियो में इकट्ठा होता थां एक बड़ा-सा तालाब टाइप हौज था। रंगों से भरा हुआ। सबको उठा उठा कर उसके फेंका जाता था। ओहे.. होये… क्या सैक्सी हीरोइन लगती थी जब गीले बदन, रंगों से नहाई हौज में से निकलती थी।’’ चच्चा पुराने जमाने की यादों में खोकर कुलबुलाए।
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‘‘चच्चा, वैसे कुछ साल पहले तक वो अपने बच्चन साहब। सुभाष घई जी की होली भी रंगदार हुआ करती थी, पर ‘सिलसिला’ वाला सिलसिला क्या टूटा… ना रेखा जी की मदमस्त जवानी रही… ना बच्चन साहब एन्गरी यंग मैन रहे। गुड्डी ने उन्हें ऐसा जलसा से बसेरा किया कि होली का मजा ही खत्म हो गया।’’ मैंने भी होली के गुब्बारे की तरह रंग बखेरते हुए कहा।
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‘‘भतीजे, जो बीत गया सो बीत गया…अब तो ‘बलम पिचकारी’ का जमाना है। वरूण धवन आलिया भट्ट को रंग दिखाता है। सलमान खान को कोर्ट कचहरी में ही होली खेलना पसंद है। शाहरुख के बंगले के बाहर जिस रैंप पर होली खेलते थे वो कॉरपोरेशन ने तोड़ दिया है। ऋतिक को सुजैन ने होली खेलने से मना कर दिया है.. बस अब तो हम तुम ही बचे हैं…सो प्यारे…रंग लगा ले… होली मना ले।’’ चच्चा रंग उड़ाते गली में गुम हो गये।
play-holi-bollywood-style-1-32220131445541मैं सोच कर मुस्कुरा उठा कि फिल्मी दुनिया में होली भी फिल्मों के प्रमोशन की तरह हो गई है। फेस बुक, ट्विटर पर फोटो डालने के लिए ही रंग लगाया जाता है। दिल से दिल तो आजकल मिलते नहीं पर यही मायानगरी है। होली के बहाने ही सही, गले तो लग ही जाते हैं।

(लेखक हरविन्द्र मांकड़)


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