‘‘वो ग्रेट शो मैन है और मैं लेट शो मैन’’ – चच्चा फिल्मी

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चच्चा फिल्मी एक टूटा हुआ चश्में का लैंस पकड़े आंखें फाड़फाड़ कर दूर तक देखने की असफल कोशिश में लगे थे। कभी दायें लफलफाते, कभी उल्टा होकर खिसखिसाते..यानि दुनिया के हर एंगल को ट्राई करके दिखदिखा रहे थे।
‘‘क्या हो गया चच्चा, ऐसा क्या दिख रहा है इस लैंस से जो आप अपने हड्डियों के ढांचे को इतना कस्ट दे रहे हो?’’ मैंने बड़े आराम से चच्चा फिल्मी के कंधे पर हाथ रख कर कहा।
‘‘ओहो…आ गया राइटर का भूत…पर आज तू सही टाइम पर हिनहिनाया है मेरे कलम के खच्चर, आज में दुनिया को बड़े पर्दे से देख रहा हूँ। जैसा ग्रेट शौ मैन सुभाष घई देखते हैं।’’ चच्चा उम्मीद से कम बलबला कर चहके। मैं हैरान परेशान हुआ। अक्सर चच्चा के सामने होता ही हूँ। ‘‘क्या बात कर रहे हो चच्चा, तुम अपने आप को सुभाष घई समझ रहे हो?’’ मैंने पिलपिला कर उबाल खाया।
‘‘अरे वो ग्रेट शो मैन हैं और मैं लेट शो मैन..क्योंकि मैं थोड़ा-सा लेट हो गया फिल्मी दुनिया में दनदनाने को वर्ना ‘राम लखन’, ‘ताल’, परदेस, कर्ज, सौदागर, कर्मा, कालीचरण, विधाता को मैंने अपने विजन से बनाया होता तो इन फिल्मों की बात ही कुछ और होती।’’

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चच्चा फिल्मी भूसे के तिनकों सा लहरा कर फुसफुसाए ‘‘वाह चच्चा वाह… जिन फिल्मों का नाम आप ले रहे हो ना वो पहले ही इंण्डियन सिनेमा में मील का पत्थर है। और व्हीसलिंग वुड इण्टरनेशनल में सुभाष जी एक्टिंग सिखाते हैं..बादशा हैं वो।’’ मैंने चच्चा को धरती पर वापिस लाने का प्रयास किया।
‘‘अरे भतीजे, वही तो कह रहा हूँ मैं लेट शो मैन हूँ। अगर लेट पैदा ना हुआ होता तो व्हीसलिंग वुड की जगह चच्चा वुड खुला होता। वो जगह हमारे पूवर्जो की है। पांच जन्मों से हम वह एक्टिंग करते आये हैं। वो तो मैंने तरस खाकर सुभाष घई को दे दी कि चलो इन्होंने इतनी फिल्में बनाई है सो इन्हें ही एक्टिंग सिखाने दो… वर्ना… चच्चा फिल्मी किसी से कम नहीं है.. और चला तुम… सुबह सुबह बिलबिलाते आ जाते हो, ना खुद कोई काम करते हो, ना मेरे जैसे लेट शो मैन को करने देते हो’’ चच्चा लैंस को कुर्ते की आस्तीन से पौछते पतली गली से रेंगते हुए निकल लिए।
और मैं हमेशा की तरह सोचने पर मजबूर हो गया कि बाॅलीवुड के पास सुभाष घई जैसा एक नायाब हीरा है जिसने ना केवल बेहतरीन फिल्में बनाई हैं बल्कि फिल्म दुनिया को कई बेहतरीन कलाकार भी दिये हैं। हमें उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने इण्डियन सिनेमा को एक नया आयाम व पहचान दी।

(लेखक हरविन्द्र मांकड़)


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