मैं हूं बैड चच्चा – चच्चा फिल्मी

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कहते हैं बद अच्छा बदनाम बुरा। पर इसके जवाब में बदनाम लोग कहते हैं कि बदनाम होंगे तो क्या नाम ना होगा। बॉलीवुड में तो वैसे भी बदनाम चेहरों की एक अलग पहचान होती है। विलेन होना या ग्रे शेड होना अपने आप में खासियत माना जाता है। जब से हिन्दी फिल्में बनी हैं विलेन का किरदार साथ रहा है। बल्कि वही बदनाम किरदार ही हीरो को हीरो बनाता है। मैं हमेशा बैड मैन का प्रशंसक रहा हूँ। गेट अप ग्रोवर…म.. मेरा मतलब गुलशन ग्रोवर से है जो अपने हर किरदार में एक नया रूप व नया स्टाइल लाकर वर्षों से भारतीय सिनेमा पर छाये हुए हैं। पर जनाब चच्चा फिल्मी को कौन समझाये।
सुबह-सुबह मुर्गे के मुंह धोने से पहले ही अपनी बांस जैसी फटी आवाज में पूरे मौहल्ले में बांग देते फिर रहे थे। ‘‘मैं हूं बैड मैन टू’’… कई लोगों ने तो उन्हें ब्रेड बटर वाला समझ कर ब्रेड की फरमाइश तक कर दी। ‘‘लाहौल विला कुव्वत..’’ अरे क्या समझा है मुझे… मैं बैड मैन हूं… बैडमैन… केसरिया विलायती…’’ चच्चा फटे कुर्ते की आस्तीन से नाम पौछते हुए पिनपिनाए।
‘‘कैसी बातें कर रहे हो चच्चा, कहां हमारे फिल्मी बैडमैन… और कहां तुम। वो अपनी ताकत से हीरो को गंगा जल पिला दें और तुम तो खुद गंगा जल पीने की दहलीज पर खड़े हो’’ मैंने उनकी शेखी को जरा उस्तरा लगाते हुए कहा।
‘‘अच्छा जी…अब हम ऐरे गैरे हो गये…हैं…बेटा, कलमकार… जब तुम्हें नाड़ा बांधना तक नहीं आता था ना, तब से हम विलेन बनना चाहते थे। पूरे कालेज में सबसे बैड बॉय यानि बदनाम हमीं थे। मजाल है कालेज की कोई मोहतरमा हमसे छिड़े बगैर रह जाये। अरे, लड़कियां तो लाइन लगाकर खड़ी होती थी कि बैड चच्चा आयेंगे और उन्हें छेड़कर निहाल करेंगें लड़कों में शर्ते लग जाया करती थी कि चच्चा आज किस मोहतरमा को छेड़कर दिन की शुरूआत करेंगे।’’ चच्चा फिल्मी अपनी कांपती सांसों को इकट्ठा करके बिलबिलाए।
‘‘पर चच्चा, वो बात तो छिछोरे पन में आती है। मैं तो फिल्मों की बात कर रहा हूँ। जहां के बैड मैन अपनी एक्टिंग से अपना लोहा मनवाते हैं। आप गुलशन ग्रोवर के नाखून जितनी भी एक्टिंग कर लो तो खानदान बलिहार जायेगा आप पर।’’मैंने थोड़ा गुस्से में आकर कहा।
चच्चा फिल्मी ने नकली दांतों को किटकिटाया और बिल्ली की आवाज में दहाड़ते हुए फुनफनाए, ‘‘अरे जाओ मियां…गुलशन जी को मैं बचपन से जानता हूं। मैंने ही तो उन्हें ‘अवतार’ फिल्म दिलवाई थी। मैंने ही उनको बैड मैन बनने की सलाह दी थी। देख लो… लड़का कामयाब हो गया। हॉलीवुड तक में अपने हुनर का डंका बजवा आया। शार्गिद किसका है।’’
अब मैं चच्चा फिल्मी को क्या कहता। क्योंकि मैं जानता हूँ, गुलशन ग्रोवर एक बेहद खूबसूरत इंसान है। जो शक्ल व सीरत से भी अच्छा है व दिल से भी। पर्दे पर बुरा आदमी बन कर कहर बरपाता है पर असली जिन्दगी में ना जाने कितनों की हैल्प करता है। सो असली जिन्दगी के इस ‘गुड मैन’ को फिल्मी पर्दा बेशक ‘बैड मैन’ कहे। हम तो उसकी अदाकारी व इंसानियत के सदा दीवाने रहेंगे।

                                                                         (लेखक हरविन्द्र मांकड़)


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