‘‘चाणक्य विध्वंसकारी नहीं है..’’

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-डां.चंद्रप्रकाश द्विवेदी
1991 में दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक ‘‘चाणक्य’’ने काफी हंगामा मचाया था.इस धारावाहिक के लेखक व निर्देशक डां. चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने ही इसमें चाणक्य की मुख्य भूमिका निभायी थी.उसके बाद उन्होनै फिल्म ‘‘पिंजर’, धारावाहिक‘मृत्युंजय’, ‘एक और महाभारत’,‘उपनिषद गंगा’सहित कई धारावाहिक निर्देशित किए.‘जेड प्लस’,‘मोहल्ला अस्सी’व अन्य फिल्में निर्देशित की.इन दिनों फिल्म ‘‘पृथ्वीराज’’का निर्देशन कर रहे हैं.पूरे 29 साल बाद दूरदर्शन पर धारावाहिक ‘‘चाणक्य’’का पुनः प्रसारण हो रहा है.

प्रस्तुत है ‘‘मायापुरी’’के लिए डां.चंद्र प्रकाश द्विवेदी से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंष..

आज से लगभग तीस वर्ष पहले जब आपने सीरियल ‘‘चाणक्य’’ बनाने का निर्णय लिया था,तो उसकी क्या वजहें थीं और प्रेरणा स्रोत क्या था?
-यह उस वक्त की बात है,जब दूरदर्शन पर ‘हम लोग’धारावाहिक आ रहा था.क्योंकि मैं कालेज के दिनों से ही नाटकों से जुड़ा हुआ था और सिनेमा की तरफ कदम बढ़ाना चाहता था.तो मुझे एक विषय की तलाश थी.मेरे नाटकों के विषय हमे’ पौराणिक आख्यान रहे हैं या इतिहास से.इसी के चलते इतिहास के प्रति मेरा झुकाव शुरू से ही रहा है.इसलिए जब मैने मन में विचार किया कि मैं किस तरह की कहानी कहूं,तो विचार आया कि क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी एक इंसान ने संकल्प के आधार पर इतिहास बदला हो.जिसके पास कोई साधन न हो,हम लोग एक आम धारणा में जीते हैं कि विश्व में या हमारे देष में या हमारे समाज में जितने भी परिवर्तन होते हैं,वह परिवर्तन करने वाला कहीं बाहर से आएगा या बड़े परिवार से आएगा और वह साधन संपन्न होगा.जबकि अनुभव यह कहता है कि अक्सर आप देखते है कि इतिहास में जितने भी बड़े परिवर्तन हुए हैं,वह साधन संपन्न लोगो ने नहीं किए हैं.सत्य और संकल्प यह दो उसके आधार होते हैं.भारत के इतिहास पर एक सरसरी निगाह डालने पर मुझे समझ में आया कि चाणक्य,जिसे हम लोग कौटिल्य भी कहते हैं,वह एक ऐसा चरित्र है,जो इसका बहुत अच्छा उदाहरण है.सौभाग्य से मेरे हाथ में उन दिनों विशाखा दत्त लिखित नाटक ‘‘मुद्राराक्षस’’भी पड़ गया.मैंने नाटक पढ़ा,तो मुझे लगा कि यदि मैं धारावाहिक बनाता हूँ,तो मैं इसे क्यों न चुनूूं.दूसरा मैं एक ऐसे संसार की रचना करना चाहता था,जो हमारे अनुभव का हिस्सा न हो.मेरे कहने का तात्पर्य हम वर्तमान में धारावाहिक का केंद्र बनाते है मुंबई , दिल्ली, कलकत्ता या विश्व का कोई भी हिस्सा,जिसे हमने देखा होता है या उसे जिया होता है.या हमने आस पास या किसी सीरियल में देखा हुआ होता है.लेकिन यदि वह ‘रामायण’का काल है या वह ‘महाभारत’का काल है,या गुप्त काल है, या मौर्य काल है या तो किसी प्राचीन भारतीय साहित्य में उसका वर्णन मिलता है,या पुरातत्व की खोज के आधार पर आपकी पुर्नरचना कर सकते हैं.एक ऐसी दुनिया जिससे आप परिचित नही है.मेरे सामने दो बातें थी एक महान व्यक्तित्व और एक ऐसा काल जो आपके अनुभव का हिस्सा नही है.क्या मैं इसे कर सकता हूँ,यह मेरे लिए दूसरी बड़़ी चुनौती थी?तो मैं कह सकता हूँ कि दूरदर्शन के शुरूआती दिनो को देखकर ही मुझे धारावाहिक बनाने की प्रेरणा मिली.

लेकिन ‘‘चाणक्य’’के प्रसारण को लेकर विवाद हुआ.काफी विलंब से प्रसारण शुरू हुआ था.प्रसारण षुरू होने के बाद भी विवाद हुए?

-देखिए,विलंब नही हुआ.मगर जिन्हे कुछ तथ्य नही पता,उन्हे ऐसा लगता होगा.दूरदर्शन की कार्यशैली के अनुसार हमे पहले पहला यानी कि पायलट एपीसोड फिल्माना होता है.उसे स्वीकृति मिलने के बाद अन्य तीन एपीसोड फिल्माने होते हैं.अब पायलट और तीन यानीकि चार एपीसोड स्वीकृत होने के बाद सीरियल के प्रसारण की तारीख मिलती है,तब आगे के एपीसोड फिल्माए जाते हैं.मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उन दिनों सभी धारावाहिक बंगलों में फिल्माए जा रहे थे या ऐसी जगह फिल्माए जा रहे थे, जिसके लिए बड़े सेट की जरुरत नही थी.मैने ‘चाणक्य’ के पायलट एपीसोड के लिए बड़ा सेट बनाया,शूटिंग के बाद उसे तोड़ना पड़ा,क्योंकि हमें नहीं पता था कि इसे कब स्वीकृति मिलेगी.उसके बाद तीन एपीसोड के लिए हमने एक बार फिर विशाल सेट लगाया,जिसे फिर तोड़ना पड़ा,क्योंकि हमें नही पता था कि प्रसारण की तारीख कब मिलेगी.उसके बाद नौ एपीसोड तक एक ही सेट को तीन बार बनाया गया.जबकि हमने दूरदर्शन से कई बार आग्रह किया कि हमें पहले से बता दिया जाए,तो हम सेट को लगाने व तोड़ने व फिर लगाने को रोकें ,इससे आर्थिक नुकसान भी काफी होता है.श्रम भी जाया होता है.मगर दूरदर्शन अपने नियमों से बंधा हुआ था.वह उसमें किसी भी प्रकार की छूट देने को तैयार नही थे.दूसरी बात,आर्थिक व्यवस्था की बात थी.‘चाणक्य’से पहले जो भी धारावाहिक बने थे,उनमें से ‘तमस’और डिस्कवरी आफ इंडिया’ यानीकि ‘भारत एक खोज’को छोड़ दिया जाए,तो बड़े पैमाने पर आउटडोर में सेट लगाकर नही बन रहे थे.मेेरे दिमाग में पूरे नगर की कल्पना थी.पाटिलपुत्र, तक्षषिला की कल्पना थी.पंचनाद छोटे छोटे नगरों की कल्पना थी,इसलिए मुझे पता था कि ‘चाणक्य’के सभी सेट स्टूडियो से बाहर ही बनेंगे.हमने पहले 21 एपीसोड के सेट पर स्टूडियो के अंदर लगाए और फिर उनका बाही हिस्सा स्टूडियो के बाहर विशाल सेट लगाकर किया.21वें एपीसोड के बाद हर एपीसोड बाहर लगे सेट पर फिल्माया गया.इतने बडे़ पैमाने पर उन दिनो सेट लगाने की परंपरा नहीं थी,इसलिए मुझे बहुत बड़ी लागत चाहिए थी,वह लागत जो उस वक्त के सबसे बड़े लोकप्रिय धारावाहिकों की कुल लागत से ज्यादा थी.इन धारावाहिकों को सबसे अधिक टीआरपी मिली थी.जबकि यहां एक ऐसा निर्माता निर्देशक था,जिसके धारावाहिक का एक भी एपीसोड प्रसारित नहीं हुआ था,और वह लोकप्रिय धारावाहिकों से अधिक के धन की मांग कर रहा था,जो कि उस वक्त के बाजार को ,एडवर टाइजिंग की जो व्यवस्था थी,उन्हे यह बात समझ में नहीं आ रही थी.जबकि हम उन्हे बार बार समझाने की कोशिश कर रहे थे कि हम आपके सामने एक बड़ा सपना रख रहे हैं,इसमें डेढ़ साल का वक्त लगा है.जब हमें लगा कि बाजार हमारी शर्तों पर काम करने को तैयार नहीं होगा,उसी समय हमें कुछ प्रायोजक मिल गए,जिन्हे समझ में आया कि हम उस वक्त के दूरदर्शन की स्थिति में बड़े बदलाव की कल्पना कर रहे हैं.उन्होने साथ दिया,जिससे यह बना.आप भी इस बात से इत्तफाक रखेंगे कि 1991 में सबसे बड़े सेट सिर्फ धारावाहिक ‘‘चाणक्य’’में ही लगे थे.यह बात रही प्रसारण में विलंब को लेकर.

जहाँ तक आपने विवाद की बात की तो इस पर कोई विवाद नहीं था.क्योंकि यह एक निर्माता और निर्देशक को जितना समय चाहिए, वह मिलना चाहिए.1986 में प्रस्ताव दिया था.1991 में प्रसारित हुआ.तो सारी प्रक्रिया को 5 साल लगे थे ‘चाणक्य’के प्रसारण के बाद कुछ लोगों का ऐसा मानना था कि यह धारावाहिक किसी एक राजनीतिक पार्टी के चिंतन से प्रभावित है या किसी एक देश के सांस्कृतिक चिंतन से प्रभावित है.उस समय की जो राजनीतिक व्यवस्था थी,उसको कहीं यह स्वीकार नहीं था.इसलिए इस तरह के विवाद खड़े किए गए.लेकिन जैसा आप जानते हैं,उस समय भी मैंने कहा था कि कोई प्रमाण के साथ नहीं आ रहा था.जैसे कि कुछ लोगों ने ‘भगवा ध्वज’पर आपत्ति की थी.उनका तर्क था कि ‘चाणक्य’ काल में भगवा ध्वज नहीं था.उन सभी से मेरा प्रश्न है था कि अगर उस समय भगवा ध्वज नहीं था,तो आप बता दीजिए कौन से रंग का ध्वज मैं इस्तेमाल करूं.क्योंकि हमारी वर्तमान स्थिति में हर रंग किसी न किसी दल के साथ जुड़ चुका है.इसका उत्तर किसी के पास नहीं था और आज भी नही है.फिर हम लोगों ने सबूत दिए कि भारत में भगवा ध्वज प्राचीन काल से रहा है.हमने एक साक्ष्य प्रस्तुत किया,जो कि अकाट्य था कि,‘भारत का राष्ट्रीय ध्वज भगवा होना चाहिए’,इसका प्रस्ताव किसी और ने नहीं बल्कि कांग्रेस की तरफ से आया था.काॅंग्रेस की एक समिति ‘नेशनल फ्लैग कमिटी’ने यह प्रस्ताव रखा था कि भारत का राष्ट्रीय ध्वज भगवा होना चाहिए.लेकिन बाद में कई कारणों के कारण तीन रंग का हुआ,जो आज हम राष्ट्रीय ध्वज देखते हैं,उस पर सबकी सहमति हुई.लेकिन यह प्रस्ताव कांग्रेस के द्वारा ही कांग्रेस के गणमान्य नेताओं के द्वारा ही आया था.उसके बाद ही यह विवाद शांत हुआ.

उस वक्त धारावाहिक‘‘चाणक्य’’के प्रसारण के बाद किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिली और लोगों पर क्या असर हो रहा था ?

-लोगों को यह बात तुरंत समझ में आ गयी थी कि यह धारावाहिक दूसरे धारावाहिकों से अलग है.मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि ‘रामायण’और‘महाभारत’ने तो कई मानक और मापदंड स्थापित किए.लेकिन रामायण और महाभारत लोकप्रियता में अव्वल रहे,मगर ‘चाणक्य’के अलावा कोई भी धारावाहिक इनसे मुकाबला नहीं कर सकता.इतना ही नही गुणवत्ता की दृष्टि से लोगों ने ‘चाणक्य’को बहुत सराहा.यह नहीं कहूंगा कि गुणवत्ता की दृष्टि से ‘चाणक्य’किसी से बेहतर था.यह तो लोगों का मानना था कि गुणवत्ता की दृष्टि से उस समय के बने धारावाहिकों में यही श्रेष्ठ है.अैार अभी भी 30 वर्ष के बाद भी,जो टेलीविजन के इतिहासकार हैं,वह इस बात को मानते हैं कि समाज के एक बहुत बड़े वर्ग ने,जिसको हम बुद्धिजीवी वर्ग भी कह सकते हैं,ने ‘चाणक्य’को खूब सराहा.जितना ‘चाणक्य’पर विवाद हुआ,लोगों ने उसे उतना ही ज्यादा देखा.इसका परिणाम यह हुआ कि 28-30 वर्षों से जब कभी देश के सामने बड़े प्रश्न आते हैं,लोग उसका उत्तर ढूंढने के लिए धारावाहिक ‘चाणक्य’को देखते हैं.और आपके भी अनुभव में आया होगा कि कई बार,जिसे हम कहते हैं कि कुछ वीडियो वायरल होते हैं,उनके विचार ‘चाणक्य’से लिए जाते हैं.उसकी क्लिपिंग ली जाती है.यह अपने आप में एक साक्षात है कि भारत के जनमानस में एक तो ‘चाणक्य’के प्रति बहुत आदर है.भारत के जनमानस में अपने प्राचीन परंपरा और इतिहास में बहुत आदर है.और विचार का वाहन करता जब एक धारावाहिक लोगों के सामने आया,तो लोग उससे भी सामग्री ले ले कर समय≤ पर विचारों रखते हैं.तो मुझे जहां तक याद है,मैं उत्तर भारत के कई स्थानों पर गया था, लोगों ने उसको ‘चाणक्य’को बहुत सराहा.मुझे लगता है कि पत्रकार बंधु भी इस बात से इत्तफाक रखेंगे कि अपने समय का यह सबसे चर्चित धारावाहिक था.

28-29 साल बाद जब इसका दूरदर्शन पर पुनः प्रसारण हो रहा है,तब इसकी सार्थकता क्या है?

-अगर इसका पुनः प्रसारण ना भी हो रहा होता,तो भी इसकी सार्थकता इसी बात से है कि यूट्यूब या डिजिटल माध्यमों में,जहां वीडियो के माध्यम से देश के तमाम लोग जो आज की पीढ़ियां हैं,वह लगातार ‘‘चाणक्य’’देख रही हैं.मुझे लोग बताते हैं कि उपहार के तौर पर लोग विवाह में भी ‘चाणक्य’धारावाहिक के वीडियो कैसेट लोगों को देते थे.मैं कई विद्यार्थियों से मिला हूं .यूनिवर्सिटी कॉलेज में गया हूं.उसका एक सीधा सा कारण है कि राष्ट्रीय निर्माण की जो प्रक्रिया है,वह सामाजिक राजनीतिक हर प्रकार क्रिया होती है.और क्योंकि इसका नायक ‘चाणक्य’, वह ना सिर्फ भारतीय राजनीति का महापुरुष है,बल्कि वह राजनीतिक दर्शन का भी महापुरुष है.और सामाजिक व्यवस्था में राजनीति हमारे जीवन को प्रभावित करती है.इसलिए उसे समझने के लिए‘चाणक्य’और ‘विष्णु गुप्त’को, भारत का समाज बहुत समझना चाहता है.क्योंकि जब तक लोग उसे समझना चाहते हैं,तो जब तक कौटिल्य या विष्णु या  चाणक्य, भारतीय समाज के लिए प्रासंगिक रहेंगे,तब तक धारावाहिक‘चाणक्य’को याद किया जाएगा.उसकी प्रासंगिकता रहेगी.आप देख रहे होंगे कि ‘रामायण’और ‘महाभारत’के साथ ‘चाणक्य’भी आया. क्योंकि दो महाकाव्य और भारत का इतिहास एक साथ ही रहेंगे.मैं यह कह सकता हूं कि हर काल में ‘‘चाणक्य’’की प्रासंगिकता बनी रहे.

‘‘चाणक्य’’की ऐसी कौन सी नीति है जिससे हर राजनीतिक दल को या राजनीति में रुचि लेने वाले को सीख लेनी चाहिए?

-पहली बात तो मैं यहां पर बता देना चाहूंगा कि लोग अक्सर ‘चाणक्य’को विध्वंसकारी समझते हैं.अधिकांश लोगों ने हमारे सामने, उनकी एक छवि भी बना दी है.जबकि छल या प्रपंच से ‘चाणक्य’का कोई संबंध नहीं है.छल प्रपंच की छवि तो  मुद्रा राक्षस नाटक के कारण हम लोग बनाते हैं.सच में ‘चाणक्य’की छवि राष्ट्र निर्माण की है.दूसरी बात अधिकतर लोग उनकी बात करते हैं ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ नामक गंथ के कारण.जबकि कौटिल्य द्वारा लिखा यह ग्रंथ लोगों ने देखा ही नहीं है.चाणक्य नीति भी एक ग्रंथ है.‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’में राज्य साम्राज्य कैसे चलाया जाए?देश कैसे चलाया जाए,की बात की गयी है.एक देश को चलाने के लिए जितनी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की जरूरत होती है,वह सारा का सारा निशब्द बहुत ही विस्तृत ग्रंथ है,जिसको लोग साम दाम दंड भेद कहकर पुकारते हैं.यही ‘चाणक्य’की सबसे बड़ी नीति नहीं है. नीति शास्त्र,जो चाणक्य नीति है, हमारे जीवन में वह मूल्य हैं,जो हमें बेहतर व्यक्ति बनने में मदद करेगा, जिससे हम समाज के लिए उपयोगी नागरिक हो सकते हैं.इसलिए इसे एक दो शब्दों में या कुछ उत्तरों में कहना मुश्किल है.यह बड़े अनुभव की बात होती है.मैं आपको एक बात बताता हॅूं कि कौटिल्य अर्थशास्त्र का सिंधी भाषा को छोड़कर भारत की सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ है. विश्व के कई लोगों ने इसका अनुवाद किया है.और उस पर निंरतर भाष्य लिखा जा रहा है.अभी भी किसी न किसी युनिवर्सिटी में कोई ना कोई विद्वान होगा,जो कौटिल्य अर्थशास्त्र पर काम कर रहा होगा.इसलिए इसे सिर्फ राजनीतिक दांव पेंच ,उठापटक केसाथ जोड़ कर देखना,कौटिल्य की प्रतिभा के साथ बहुत बड़ा अन्याय है.

लेकिन आपको नहीं लगता कि लोग ‘चाणक्य’को सिर्फ राजनीति से जोड़कर देखते हैं,इन दिनों कहा जाता है कि इस चाणक्य ने उस चाणक्य को मात दे दी..?

– दुर्भाग्य है कि हम जैसे फिल्मकार या हमारी जो शैक्षणिक या सामाजिक संस्थाएं हैं,वह अभी तक चाणक्य को अपनी संपदा के अनुसार दर्शकों के सामने नहीं ले जा पायी हैं.आप देख रहे होंगे कि धारावाहिक ‘‘चाणक्य’’के प्रसारण के बाद बहुत सारी पुस्तकें आयीं,कई लोग अभी भी इस पर काम कर रहे हैं.इसमें एक राधाकृष्णन बापट नामक विद्वान हैं.इनके अलावा देष में कई लोग हैं,जो अर्थशास्त्र पर काम कर रहे हैं.कई लोग मैनेजमेंट और चाणक्य या मैनेजमेंट और कौटिल्य जासूसी व्यवस्था और कौटिल्य इस तरह अलग-अलग बिंदुओं को लेकर निरंतर काम कर रहे हैं.इस तरह साहित्य का निरंतर विकास हो रहा है.आज आप किसी भी एयरपोर्ट पर चले जाएंगे,तो आपको चाणक्य पर चार पांच पुस्तकें मिल ही जाएंगी. जाहिर सी बात है कि अभी भी ‘चाणक्य’को जो लोग देख रहे हैं, वह बहुत बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग है.अभी भी समाज के बड़े हिस्से में ‘चाणक्य’का ग्रंथ,चाणक्य की पुस्तके ,चाणक्य के विचार या उसकी नीति जिस पैमाने पर पहुंचनी चाहिए थीं,उस पैमाने पर नहीं पहुंची.इसका मतलब यह नहीं है कि वह नहीं पहुंचेगी. मैने ‘चाणक्य’पर काम किया.उसके कई दूसरे लोगों ने काम किया.मेेरे बाद भी कई धारावाहिक बने.और आपको पता भी होगा कि आने वाले समय में ‘चाणक्य’पर दो बड़ी फिल्में भी आने वाली हैं.मुझे लगता है कि  हमारा समाज उस प्रतिभा की महानता या उसने जो काम किया है,उससे धीरे-धीरे परिचित होगा.जाहिर है हमारे देश में जैसे मैं अपना एक अनुभव बताता हूं.मैं अपने एक मित्र के कॉलेज में गया था और मैंने उससे कहा कि,‘देखो तुम्हारे कॉलेज की लाइब्रेरी में कौटिल्य अर्थशास्त्र है?अगर है तो मैं देखना चाहूंगा.’जब यह पुस्तक मेेरे हाथ में आयी,तो आपको जानकर हैरानी होगी,जिस दिन से यह पुस्तक कॉलेज में आयी थी,उसके 25 सालों तक इतिहास में किसी भी पाठक ने उस पुस्तक को निकलवाया नहीं था.मैं इत्तफाक से पहला पाठक था,उस पुस्तक को देखने वाला.क्योंकि आप मुझसे बात कर रहे हैं,तो बता दूँ कि  जिन व्यक्तियों को रुचि हो वह आरपी कांग्ले द्वारा अनुवादित किताब पढ़ सकते हैं.इसे मोतीलाल बनारसी दास ने अभी तीन खंडो में प्रकाशित किया है.पहले मुंबई युनिवर्सिटी का एक प्रकाशन था,जो कि दो हिस्सों में था. अभी वर्तमान में जो प्रकाशन मिलता है,वह मोतीलाल बनारसी दास का है.

‘‘चाणक्य’’का आपके जीवन और कैरियर पर क्या प्रभाव पड़ा?

-मेरे कैरियर पर प्रभाव पड़ा.जाहिर सी बात है कि उसके बाद मैंने सिनेमा में ही काम करना शुरू किया.‘पिंजर’जैसी फिल्म बनायी थी,जिसे राष्ट्ीय पुरस्कार मिला.कुछ दूसरी फिल्में व धारावाहिक बनाए.लोगों को मुझ पर विश्वास हुआ कि मैं बड़े ऐतिहासिक या पौराणिक ग्रंथों पर बड़े पैमाने पर काम कर सकता हूं.जहां प्रतिभा की बात आती है,व्यापक और विस्तृत धरातल की बात है,तो जो मेरे काम में विश्वास रखता है, जिनको लगता है कि चंद्र प्रकाश से बात की जा सकती है,वह मुझसे संपर्क करते हैं.
जहां तक मेरे व्यक्तिगत जीवन की बात है,जो मेरा इस  धारावाहिक से आत्मबोध था वह यह कि संकल्प में बड़ी शक्ति होती है.यदि आप अपनी निःस्वार्थ भावना से कोई काम नहीं कर रहे हैं,तो आप के संकल्प को बड़ा बल मिलता है. और मैंने जो कुछ भी काम किया है,वह तमाम विपरीत परिस्थितियों में रहकर संकल्प के आधार पर ही किए हैं.जो लोग मुझे बहुत करीब से जानते हैं,वह भी इस बात पर अब यकीन करने लगे हैं.मैं जहां भी जाता हूं,मैं इस बात को जरूर दोहराता हूं कि जिस विचार को लेकर मैंने ‘चाणक्य’बनाया था,उसमें मेरा विश्वास उस वक्त भी था और आज भी मैं उस विश्वास पर खड़ा हूं.

धारावाहिक‘‘चाणक्य’’में आपने मुख्य किरदार भी निभाया.लेकिन उसके बाद आपने अभिनय कभी नहीं किया?
-मैंने जो फिल्म बनाने की कोशिश की थी,वह बाद में कुछ कारणों से रुक गई.इसके अलावा मुझे लगता है कि मैं ‘चाणक्य’बनाने के दरमियान लेखक भी था,मैं निर्देशक भी था,मैं अभिनेता भी था.इसलिए अभिनय को इंज्वॉय करने का मेरेे लिए समय कभी आया ही नहीं.एक अभिनेता के तौर पर अपने काम का मूल्यांकन करने का समय मुझे कभी मिला ही नहीं.मुझे समय क्यों नहीं मिला,क्योंकि   मैं इन सारे कामों में उलझा हुआ था. दूसरा उसके बाद जब मैं समाज के बीच में गया,तो समाज ने जिस प्रकार का स्नेह और सम्मान दिया,उससे मुझे ऐसा लगा कि यह तो मुझे इससे बड़ी भूमिका मिले,तो ही मुझे करना चाहिए.मैं किसी भी प्रकार से ‘चाणक्य’ने जो छवि मुझे दी है,उसे मैं अपने हाथों नष्ट नहीं करना चाहता था.मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि प्रतिवर्ष/हर वर्ष लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैं भूमिका करना चाहूंगा?वह चाहे धारावाहिक हो,चाहे फिल्म में हो.अभी तक मुझे ऐसा नहीं लगा कि मुझे वह करना चाहिए.वैसे अब मुझे अभिनय इतना आकर्षित भी नहीं करता.तो यह मेरा स्वयं का चुनाव हुआ निर्णय है.ऐसा नहीं है कि मेरे पास प्रस्ताव नहीं हैं. इस वर्ष भी प्रस्ताव आया है.पिछले वर्ष भी प्रस्ताव आए थे.कई अच्छे प्रस्ताव आते हैं,पर मैं उसके लिए अभी बिल्कुल तैयार नहीं.

इन दिनों नई गतिविधियां क्या है?

-आप जानते होंगे कि मैं फिल्म ‘‘पृथ्वीराज’’कर रहा हूं,जिसमें अक्षय कुमार पृथ्वीराज की भूमिका में है और 2017 की मिस वर्ल्ड रह चुकी मानुषी छिल्लर,संयोगिता की भूमिका में है.इसके अलावा कई अन्य प्रसिद्ध कलाकार हैं.जो समय के साथ आपको पता चलेंगे.इसी वर्ष दिवाली पर उसको रिलीज करने की योजना थी.लेकिन लाॅक डॉउन की वजह से मैं उम्मीद करता हूं कि शायद अब रिलीज की तारीख में परिवर्तन होगा.इस बात का निर्णय तो आदित्य चोपड़ा पर  है कि वह क्या निर्णय लेते हैं.पर इन हालातों से मुझे लगता है कि उसमें थोड़ी सी देरी होगी.इसके अतिरिक्त मैं कुछ विषयों पर काम कर रहा हूं. समय के अनुसार पता चलेंगे.यह सारे के सारे ऐतिहासिक और बड़े विषय हैं,जो कि समय के साथ लोगों को पता चलेंगे.

शान्तिस्वरुप त्रिपाठी


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