‘‘बच्चे इंटरनेट पर सब कुछ देख रहे हैं.’’- रेवती

1 min


हिंदी, तमिल, मलयालम और तेलगू भाषा की कई फिल्मों में अभिनय करने के अलावा कई फिल्मों का निर्देशन कर चुकी रेवती इन दिनों शोनाली बोस निर्देशित फिल्म ‘‘मार्गरीटा विथ ए स्ट्रा’’ को लेकर चर्चा में है. जिसमें उन्होने ‘‘सारेब्रा पाल्सी’’ ग्रसित विकलांग लड़की लैला की मॉं के किरदार में है. वैसे रेवती ने इससे पहले मणिरत्नम निर्देशित फिल्म ‘‘अंजली’’ में भी ‘‘सारेब्रा पाल्सी’’ ग्रसित लड़की अंजली की मॉं का किरदार निभाया था. मगर अंजली छोटी बच्ची थी, जबकि लैला एक टीनएजर है. इस किरदार को निभाना उनके लिए काफी आसान रहा. क्यूंकि कि वह पिछले बीस वर्षों से विकलांग बच्चों के लिए वांलेटियर के रूप में काम करती आ रही हैं.
प्रस्तुत है रेवती से मुंबई के ‘‘एडॉप्ट’’ सेंटर में हुई बातचीत के अंश…

REVATHY-_MG_8344
1983 से 2015 तक फिल्म इंडस्ट्री में किस तरह के बदलाव देखती हैं?
– इसके लिए तो मुझे रिसर्च करना पड़ेगा. तकनीक के साथ साथ रचनात्मकता के स्तर पर काफी बदलाव आ चुका है. पर जिस तरह से समाज में बदलाव आया है, उसी तरह से फिल्म की कहानियों में भी बदलाव आया है. यह बदलाव या विकास वर्तमान समय के लिए ठीक है. कंटेंट में भी काफी बदलाव आ गया है. लाइफ स्टाइल में भी बदलाव आ गया है. हॉ!कुछ अच्छी व छोटे बजट की फिल्में आज भी रिलीज नहीं हो पा रही हैं.
ऐसा क्यों?
-हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या प्रेम कहानी है. लोग अपनी फिल्म में प्रेम कहानी जरुर रखते हैं. सिनेमा बिना रोमांस के पूरा ही नहीं होता. पर अलग सोच वाली फिल्में बन रही है, पर ऐसी फिल्मों  की संख्या कम है. लोग रियालिटी वाला सिनेमा देखना ही नहीं चाहते. असल जिंदगी की बजाय उसे मनोरंजन चाहिए, वह जहां नहीं जा सकता, वह सब परदे पर देखना चाहता है. मसलन, आम इंसान पेरिस या स्विटजरलैंड नहीं जा सकता, इसलिए वह इन जगहों को परदे पर देखना चाहता है. जो लोग रियालिटी देखना चाहते हैं, उनके लिए भी सिनेमा बन रहा है.

margarita-revathi7591
आप बहुत कम हिंदी फिल्में करती हैं.फिर ‘‘मार्गरीटा विथ ए स्ट्रा’’ करने के पीछे आपकी अपनी सोच क्या रही?
-यह कहानी रीयल है.रीयल समस्या है.फिल्म का हर पात्र सुंदर है. इसी खूबी ने मुझे इस फिल्म से जुड़ने के लिए उकसाया.

यह फिल्म सेरेब्रा पाल्सी की बात करती है. इसके बारे में आपको पहले से कितनी जानकारी थी?
-1991 में मैंने मणि रत्नम के निर्देशन में फिल्म ‘‘अंजली’’ में अभिनय किया था. जिसमें मैंने एक ऐसी मां का किरदार निभाया था, जो कि सेरेब्रा पाल्सी से ग्रसित बेटी अंजली को जन्म देती है. इस फिल्म में अभिनय करते समय मुझे सेरेब्रा पाल्सी के बारे में काफी कुछ जानने व समझने का मौका मिला था. उसके बाद मैने चेन्नई स्थित विद्यासागर स्पैटिक सोसायटी के साथ जुड़कर वालेंटियर के रूप में काम करना शुरू किया. पिछले 25 वर्षों से मैं लगातार काम करती आ रही हूँ. वहॉं के बच्चों के साथ काम करती हूँ. उन बच्चों के माता पिता से मेरा मिलना जुलना होता रहता है. तो मुझे सेरेब्रा पाल्सी के बारे में बहुत कुछ पता है.
वालेंटियर के रूप में काम करते हुए आपको किस तरह के अनुभव हुए.लोग विकलांग बच्चों से डरे हुए क्यों रहते हैं?
-मैने तमाम विकलांग बच्चों के माता पिता से बात की.तो पता चला कि उनकी समझ में ही नहीं आता कि ऐसा क्यों हुआ. हम विकलांग बच्चे को देखते हैं, तो हमें यह समझ में नहीं आता कि इनके साथ किस तरह का व्यवहार करें. व्हीलचेयर वाले को बेचारा कहें या कुछ और कहें. यह समझ में नहीं आता. कोई अंधा है, तो हम यह नहीं समझ पाते कि उनकी स्मरण शक्ति और अहसास करने की शक्ति ज्यादा तेज होती है. यानी कि हम अपनी अज्ञानता वष उनसे दूरी बनाए रखते हैं. इसकी मूल वजह यह है कि हम बचपन से ऐसे बच्चों के साथ उठते बैठते या पढ़ाई नहीं करते हैं. अतः हमारा जो एटीट्यूड है उसे बदलना चाहिए. उस एटीट्यूड को बदलने के मूवमेंट के ही तहत ‘‘मार्गरीटा विथ ए स्ट्रा’’ जैसी फिल्म बनायी गयी है. यदि विकलांग और सामान्य बच्चे एक साथ स्कूल व कालेज में पढ़ाई करे, फिर एक साथ काम करे.यानी कि हर दिन मुलाकात होगी, तो यह समस्या नहीं आएगी. पर ऐसे स्कूल जहॉं विकलांग व सामान्य किस्म के बच्चे एक साथ पढ़ सके, बहुत सारे बदलाव लाने होंगे,जो कि धीरे धीरे शुरू हुआ है. इंफ्रास्ट्क्चर व एटीट्यूड बदलने से ही सब कुछ ठीक होगा. इंटीग्रेटेड स्कूल सिस्टम को लेकर काम हो रहा है. यह अच्छी बात है.

Revathy IN FILM-MARGARITA WITH A STRAW
फिल्म ‘‘मार्गरीटा विथ ए स्ट्रा’’ में आपने मां किरदार निभाया है. यह किरदार किस तरह से महत्वूर्ण है?
-फिल्म में लैला, लैला की मां और खानुम यह तीनों महत्वपूर्ण पात्र हैं. मेरा किरदार एक आम औरत है. लैला को जन्म देने के बाद उसे अहसास हुआ कि उसे अपनी बेटी लैला को खास तरह का ध्यान देना है. उसके लिए वह स्ट्गल करती है और स्ट्गल के दौर में वह बहुत स्ट्रोंग बन जाती है. वह जिस ताकत को सीखती है, वही ताकत वह लैला को देती है. इसलिए लैला भी स्ट्रोंग है.
आप 25 साल से वालेंटियर के रूप में जो काम कर रही हैं, उसने आपको इस किरदार को निभाने में मदद की ?
-बिलकुल. लैला जब गलत काम करती है, तो एक मॉं जिस तरह से अपनी बेटी को डॉंटती है, उसी तरह यह मॉं भी लैला को डांटती है. लैला व्हीलचेअर पर है, इसलिए उसे न डॉंटे यह नहीं हो सकता. वह लैला को अपने साथ बाहर भी लेकर जाती है. अभिनय करते समय मैने बहुत ही नेच्युरल बिहैवियर रखना है. क्योंकि मैने विकलॉन्ग बच्चों के माता पिता को यह सब करते हुए देखा है. इसलिए मुझे यह फिल्म बहुत रियालिस्टिक लगती है.
आपको नही लगता कि फिल्म में सेक्स, होमोसेक्सुआलिटी जैसी चीजे जोड़ी गयी हैं. ऐसे में सेरेब्रा पाल्सी का मूल मुद्दा गायब हो जाएगा?
-हमारी सोच गड़बड़ है. हम फिल्म देखते समय जो कुछ देखते हैं ,उसमें से इस तरह की कोई न कोई बात निकाल पूरे मीडिया में हाईलाइट कर देते हैं. अब तक जिन लोगो ने यह फिल्म देखी, उन्हे यह बहुत खास फिल्म लगी. क्योंकि उनकी सोच ऐसी है. मैं चिंतित हूॅ कि वैसे भी होगा, मगर जो लोग अच्छे भाव व सोच के साथ फिल्म देखेंगे, उन्हे लगेगा कि यह एक टीनएजर लड़की की कहानी है, जिसके सामान्य अहसास हैं. वह विकलॉंग है, पर उसके टीनएजर के अहसास हैं, उन्हें कैसे हैंडल किया जाए, यह भी फिल्म का मुद्दा है.
पर भारत में सेक्स हौवा बना हुआ है.‘गे’ समुदाय के खिलाफ आंदोलन होेते रहते है. एसे लोग फिल्म का विरोध नहीं करेंगे?
-मुझे ऐसा नहीं लगता. हम जिस तरह से चीजों को छिपाकर रखते हैं, वही बाद में अपराध के रूप में सामने आता है. अब तो बच्चे इंटरनेट पर सब कुछ देख रहे हैं. और हम लोग घर पर हिप्पोक्रेट/पाखंडी बने बैठे हैं. राज्य सभा और लोकसभा में हमारे सांसद पोर्नाेग्राफी की फिल्में देखा करते हैं. हमारे देश में कामसूत्र को बहुत बड़ी कला माना जाता है. इसलिए फिल्मों का विरोध करना सिर्फ मूर्खता है. डिप्लोमेट होना ठीक है. हिप्पोक्रेट नहीं होना चाहिए.
पूरी फिल्म की शूटिंग के अनुभव क्या रहे?
-कैमरा चल रहा हो या ना चल रहा हो, हम लोग हमेषा वही कर रहे थे. क्योंकि कलकी हमेशा व्हीलचेअर पर रहती थी. शयोनी हमेशा अंधी बनी रहती. हम सभी इसी छोटे संसार में जी रहे थे. हम सभी टीम स्प्रिट के साथ काम करते हुए इंज्वॉय कर रहे थे.

बहुत लंबा समय गुजर गया. आपने कोई फिल्म निर्देशित नही की?
-अगले साल दक्षिण भारत में मैं एक फिल्म निर्देशित करने वाली हूँ. तैयारीयां चल रही है. पहली फिल्म मलयालम में करूंगी. उसके बाद हिंदी में करूंगी. क्योंकि मैं बहुत सोच सोच कर काम करती हूं. इसलिए समय ज्यादा लगता है.

कॉरपोर्रेट सिस्टम आने के बाद फिल्म इंडस्ट्री को क्या नुकसान और क्या फायदा हुआ?
-यह तो हर जगह हो रहा है. पहले छोटे छोटे किराने की दुकाने थीं.  अब तो मल्टीप्लैक्स खड़े हो गए हैं. हम उन दुकान पर जाते थे, तो वह दुकानदार हमारे बारे में हमारे बच्चों के बारे में बात करता था. हम उसके बारे में पूछते थे. पर मल्टीप्लैक्स के बाद यह अपनापन खत्म हो गया. हम यह मानकर चलते हैं कि कुछ पाना हैं, तो कुछ खोना पड़ेगा. मैं यह सोचती हूं कि मॉल्स या कॉरपोर्रेट सिस्टम में भी कुछ अच्छाई होगी. तो उस अच्छाई के साथ आगे बढ़ना पड़ेगा. अंततः देश को विकास की ओर ले जाना है. पर मुझे खुद नही पता कि विकास के नाम पर यह जो कुछ हो रहा है, उसमें कितनी भलाई है.हम सभी बदलाव के दौर से जुडे हुए हैं कई बार कॉरपोर्रेट वालों से मैं खुद कहती हूं कि आप सिर्फ बाक्स आफिस के आकड़ों के बारे में जानते हैं. फिल्मों के बारे में आपको कोई जानकारी नहीं है. मैं मानती हूं कि समस्याएं हैं.पर धीरे धीरे यह समस्याएं खत्म होंगी.


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये