व्यवसायिक सिनेमा का एक संवेदनशील व्यक्ति – वेदराही

1 min


maxresdefault

 

मायापुरी अंक 46,1975

पिछले दिनों मुंबई में वेदराही के निर्देशन में बनी ‘प्रेम पर्वत’ प्रदर्शित हुई तो एक निर्माता के दफ्तर में किसी के मुंह से सुना यार कुछ भी कहो वेदराही कम्प्रोमाइज नहीं करता है.. वर्ना..

दूसरे ने कहा, तो क्या प्रेम पर्वत हिट हो जाती ?

उसी व्यक्ति ने पुरजोर आवाज में कहा, बेशक धीमी गति के बाद भी वेदराही के निर्देशन में पकड़ थी पर कहानी में धांसूपन नहीं था जो आज की फिल्मों में होता है। वेदराही का क्या बिगड़ जाता यदि वह उस फिल्म की हीरोइन के बूढ़े पति को किसी पहाड़ की चोटी से फिसला देता या किसी कार दुर्घटना से मरवा देता। उसका क्या बिगड़ जाता यदि हीरोइन अपने बूढ़े पति को छोड़कर युवक हीरो के साथ भाग जाती या हीरो उसे भागकर शहर ले जाता और फिर किसी खलनायक के झांसे में आकर वह हीरोइन वेश्या के कोठे पर पहुंच जाती और फिर वही हीरो और खलनायक में टक्कर होती ढिशूं ढिशू होती और अंत में लाचार होकर वह वेश्या के कोठे से वापस गांव भाग आती? कितना जबरदस्त फिल्मी टच होता जब वह घर पहुंचती और उसी वक्त उसके बूढ़े पति की लाश निकल रही होती…

यह बातचीत सुनकर थोड़ी देर के लिए में सोचने लगा कि कैसी गलत जगह पहुंच गया हूं। यह कैसे फिल्म वाले हैं जो कहानीकार को नहीं पहचानते। यदि वेदराही कहानीकार न होकर ‘मसालेदार फिल्मकार’ होते तो उनकी ‘दरार’ हिट होती और ‘प्रेम पर्वत’ तो सुपरहिट इतना ही नहीं, उस सफलता के गुमान में अधिकांशत फिल्मी डायरेक्टरों की तरह वे भी गर्दन टेढ़ी कर बड़ी अकड़ से चलते और फिल्म डायरेक्शन के लिए दस दस लाख रुपये की मांग करते।

पर अफसोस वेदराही में ऐसी गिरावट नहीं है। मुझे तो लगता है वे चिकने घड़े की तरह हैं कि जिस पर उलूल-गुलूल बातों का असर ही नहीं होता।

वेदराही आज से 14 साल पहले जम्मू कश्मीर का रेडियो विभाग छोड़कर मुंबई आये तो खाली हाथ नहीं, साहित्यिकता का खजाना लेकर आये थे। भारत की विभिन्न आंचलिक कहानियों ने महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था। उन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि उनमें जिंदगी है, वह जिंदगी जो हम जी रहे हैं जिसकी धड़कन हम रोज महसूस कर रहे हैं। जीवन के मर्म को छूने वाली उनकी संवेदनशील कहानियां देश के कोने-कोने में पढ़ी जाने लगी थी। वेदराही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने रविन्द्रनाथ टैगोर की चंद प्रमुख कविताओं का डोगरी भाषा में अनुवाद किया था…

साहित्यकार बड़े कल्पनाशील व्यक्ति होते हैं। न जाने क्या क्या कल्पनाएं और महत्वकांक्षाए लेकर वेदराही मुंबई पहुंचे। पर हां, मैं इतना जानता हूं कि एड़ी से चोटी तक व्यावसायिकता का चौला ओढ़नेवाली फिल्मी दुनिया में रहकर भी उन्होंने साहित्यिकता नहीं छोड़ी और न उन्होंने व्यावसायिकता का दुशाला ओढ़कर अपने को ढांपने की कोशिश की। ग्लैशियर की तरह बहती हुई ग्लैमर घाटियों में रहकर उन्होंने हमेशा मोती चुगने की कोशिश की।

ठीक भी है.. हंसा तो मोती चुगे! मुंबई आकर वेदराही पत्र-पत्रिकाओं और फिल्मों के लिए कहानियां लिखते रहे। बड़े निर्माता-निर्देशकों के पास सहायक के रूप में भी कार्य करते रहे। लेखक और सहायक के रूप में उनकी उल्लेखनीय फिल्में हैं।

‘आरजू’, ‘पवित्र पापी’, ‘पहचान’, ‘बेईमान’ आदि। निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर के साथ तो वे प्रारम्भ से ही घनिष्ट रूप से संबधित रहे हैं। इस वक्त उनकी निर्माणधीन फिल्म ‘चरस’ उन्हीं की लिखी हुई है उनकी आनेवाली अन्य फिल्में हैं ‘सन्यासी’ ‘मिस्टरजॉन’ और ‘कालीघटा’ ‘कालीघटा’ के वे लेखक-निर्देशक ही नहीं, निर्माता भी हैं। जब मैंने सुना कि वे खुद निर्माता बने हैं तो मैं चौंक पड़ा। कहीं वे फिल्मी दलदल में फंस गये तो क्या होगा? मेरा पक्का विश्वास है कि ‘डोगरी’ वेदराही कभी अपना आपा नहीं खोयेंगे। पर आखिर फिल्म म्यूजियम में रखने की चीज तो है नहीं। उसे आम दर्शकों के सामने पेश करना है और पैसा भी वसूल करना है यानी निर्माता के रूप में उन्हें दुकानदारी चलानी ही चलानी है। क्या हंस अब कौआ की चाल चलेगा?

बहुत दिनों से मेरे मन में अनेक शंकाए थी। एक दिन बातों ही बातों में मेरी उन शंकाओं का समाधान करते हुए उन्होंने बताया मेरे निर्देशन में बनी दो फिल्में ‘दरार’ और ‘प्रेम पर्वत’ हिट नहीं हुई। उसके कई कारण है कुछ फुटकर तो कुछ गहरे। कारण कुछ भी रहें। दाग मुझे पर लग रहे हैं और मुझे ही धोने हैं और यह कार्य स्वतंत्र रूप से निर्माता बन कर ही मैं कर सकता हूं। अब सारी व्यवस्था ए से लेकर जैड तक मेरे हाथ में है।

तब तो आपने और भी अधिक खतरा ले लिया है।

नहीं, ऐसी बात नहीं है मेरी यह अगली फिल्म ‘काली घटा’ बहुत सोच समझ कर पुराने अनुभवों का लाभ उठाते हुए बना रहा हूं। मानव मन की थाह लेने वाली रहस्य रोमांच से भरपूर यह कहानी आम दर्शकों को अवश्य पसंद आएगी यह मेरा पूर्ण विश्वास है।

ओह तो आप अब कमर्शियल डायरेक्टर बनने जा रहे हैं।

कमर्शियल का मतलब कामयाबी से है तो ऐसा ही समझ लीजिये। फिल्म निर्माण भी एक व्यवसाय है पर उसकी भी अपनी एथिक्स हैं मैं उसी एथिक्स से ईमानदारी को चीट नहीं करूंगा इस फिल्म के लिए ना लेखक के रूप में, ना निर्देशक के रूप में और ना निर्माता के रूप में। मैने अपनी मान्यताओं को भूल कर किसी तरह का समझौता नहीं किया है, वह तो मेरे खून में ही नहीं है।

यह तो आप उसे देखने पर ही कहेंगे। मैं तो फिलहाल इतना ही कह सकता हूं कि जिस उत्साह से मैं उसे बना रहा हूं उसी जोश-खरोश के साथ और बड़ी धूमधाम से उसका प्रदर्शन करूंगा ऐसा नहीं होगा कि ‘प्रेम पर्वत’ की तरह वह प्रदर्शित हो और दर्शकों को यह पता भी न चले कि उनके शहर में फिल्म आई और चली गई। फिल्म प्रदर्शन के पहले आम दर्शकों को विश्वास में लेना मैं जरूरी मानता हूं।

साफ जाहिर है कि आप पहले से अधिक सतर्क हैं।

कुछ भी समझ लीजिये वेदराही से मेरी जब-जब मुलाकात हुई है, मैंने हमेशा उनमें गहरे आत्म विश्वास की झलक देखी है। और जब-जब मैंने उन्हें आत्मविश्वास से दमकती रोशनी में देखा है मैने उन्हें हमेशा दूसरों से भिन्न और अपनी कुछ विशिष्टताओं के साथ देखा है।

वेदराही की कहानियां पढ़ने के बाद और उनकी फिल्में देखने के बाद कोई यह कहे बिना नहीं रहेगा कि वे जितने मौलिक कथाकार हैं, उतने ही मौलिक निर्देशक भी। भले ही उनकी ‘दरार’ और ‘प्रेम पर्वत’ बॉक्स ऑफिस खिड़की पर हिट न हुई हों पर प्राय सभी समीक्षकों ने लिखा है कि उनकी कहानियों में जीवन का जो यथार्थ है वही उनकी फिल्मों में मूर्त हुआ है कहानियों के धरातल को हुबहू फिल्मों में उतार लेने के कारण उनकी फिल्में भी आंचलिक फिल्में हो गयी हैं जिनमें कहानी के वातावरण और मूड से लेकर पात्रों की वेशभूषा और चारित्रिक अभिव्यंजना तक में लोकल चैंज है जो बहुत कम फिल्मों में पाया जाता है। एक समीक्षक ने यहां तक लिखा है कि पात्रों की भाव भंगिमाओं को स्पर्शीय बनाने के लिए उन्होंने स्वाभाविक प्रतिबिंबो का भी सहारा लिया है और यहा संवाद काम नहीं करते वहां वे प्रतिबिंब पात्रों को साकार कर देते हैं। इस तरह उनकी फिल्मों में प्रकृति और परिस्थितियां भी चारित्रिक अभिव्यक्तियों को मूर्त बनाने में योगदान देती हैं।

वेदराही की अपनी मान्यता है कि हमें फिल्म बनाते समय कहानी के साथ पूरा न्याय करना चाहिए। यदि कहानी विशेष समय काल ही है तो उस समय का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि कहानी के पात्र खास जगह के हैं तो हमें जहां तक हो सके उन्हीं स्थानों पर जाकर शूटिंग करनी चाहिए। ‘प्रेम पर्वत’ की कहानी कश्मीर और पंजाब की सीमा पर लगे गांवो की कहानी है इसलिए इस फिल्म की शूटिंग उन्होंने वहीं जाकर पात्रों के चयन में भी इसी बात का प्रमुख ध्यान रखा है। ऐसा नहीं लगता कि वेदराही विदेशी फिल्मों से प्रभावित हैं या उनकी शैली अपना कर निर्देशक के रूप में अपने व्यक्तित्व की गहरी छाप लगाना चाहते हैं उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि वे स्वदेशी फिल्मों के स्वदेशी निर्देशक हैं।

वेदराही योजनाबद्ध कार्य में विश्वास रखते हैं। यदि कोई कार्य योजना से नहीं होता तो वे झुंझला उठते हैं। फिल्म शुरू करने के पहले वह सारी फिल्म और फिल्म के सारे शॉट्स उनकी स्क्रिप्ट में उतर आते हैं। जब तक स्क्रिप्ट पूरी तरह तैयार नहीं हो जाती वे शूटिंग शुरू नहीं करते। इस विषय में उन्होंने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा बहुत से निर्माता-निर्देशक ऐसे हैं जो बिना दृश्य आदि विभक्त किये ही फिल्मों की शूटिंग प्रारम्भ कर देते हैं। वे अपनी फिल्मों के दृश्यों की शूटिंग स्थलों पर समय अधिक लगते हैं और धन भी अधिक खर्च करते हैं।

वेदराही व्यक्तिगत जीवन में भी अपनी फिल्मों की तरह आदर्शवादी, स्पष्टवादी एवं सवेंदनशील हैं। जिस तरह उनकी कहानियां भावुकता से छलछला रही है उस तरह की भावुकता उनके जीवन में भी है और मैंने स्वंय अनेक बार बातों ही बातों में उन्हें भीतर से पिघलते हुए और सजल होते देखा है। उनका सबसे बड़ा दोष यही है कि फिल्मी दुनिया के अधिकांश लोगों की तरह उनमें आडम्बर नहीं है। बातें कम काम अधिक, जीवन गतिशील यही उनका सिद्धान्त है इसीलिए कहते हैं कि वेदराही कभी अपनी राह से हारकर नहीं लौटे। देखें इस बार क्या होता है?

SHARE

Mayapuri