सदाबहार देवआनंद

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मायापुरी अंक 46,1975

देवआनंद का नाम लेते ही एक ऐसा नौजवान फुर्तीला और आकर्षक व्यक्तित्व आंखो के सामने उभरने लगता है जो फिल्मोद्योग में अपने स्थायित्व एवं सफलता का झण्डा गाड़े हुए है। वह फिल्म संसार में सदाबहार हीरो के नाम से जाना जाता है और फिर जाना भी क्यों न जाये? पचपन साल के नौजवान के लिए यह सदाबहार की उपाधि बिल्कुल सटीक है।

जिस उम्र में लोग खांसने लगते हैं, हांफने लगते हैं, लाठी टेक कर झुक कर चलते हैं, सोलह साल के नौजवान की तरह उछलते कूदते और नाचते गाते हैं। यह भी उनके व्यक्तित्व का एक अहम पहलू है। जो स्थान आकाश में प्रथम तारें का है और उद्यान में प्रथम पुष्प का है। वही स्थान देव का फिल्मी दुनिया में है।

देव ने ‘गाईड’ फिल्म में अभिनय की कलात्मक बारीकियों को बड़े ही सूक्ष्म ढंग से प्रस्तुत किया था। उनके संवाद बोलने, चलने-फिरने बैठने की शैली अन्य सभी अभिनेताओं से भिन्न है। ‘हरे राम हरे कृष्ण’ ने तहलका मचा दिया था। हिप्पीइज्म की समस्याओं का देवआनंद ने इस फिल्म में अच्छा चित्रण किया था।

संक्षेप में, मैं इतना ही कहूंगा कि देवआनंद के बिना फिल्म इतिहास अधूरा है यह फिल्म संसार का उदीयमान दीपक होने के साथ ही साथ स्थायी स्तंभ भी हैं।

देवआनंद

सर पे बुढ़ापा पर दिल तो जवां है। वाले आज के सदा बाहर हीरो देवानंद पर पूर्णत: चरितार्थ होती है। आश्चर्य की बात है कि ग्लैमर के सहारे वाले इस इंसान ने 55 साल की ढलती उम्र में भी लोगों को आकर्षित किया हुआ है?

देवआनंद की फिल्में अनगिनत हैं लेकिन अविस्मरणीय काफी कम विगत दस वर्षों में ‘गाइड’ ही एकमात्र उनकी अविस्मरणीय फिल्म कही जा सकती है।

लोगों ने देव से सीटी बजाना, टेड़ा चलना आदि-आदि अदायें तो सीखीं लेकिन कुछ ही लोगों ने सदा सदाबहार यौवन को बनाये रखने की प्रेरणा ली है।

देवानंद ने अपने जीवन में काम करते हुए सीधे मुड़कर ना देखो एवम् नियमित खानपान के सिद्धांतो को अपना कर चिरस्थायी यौवन प्राप्त किया है। तभी तो एक आधुनिक नौजवान देवआनंद की फिल्में देखकर जब लौटता है तो वह दर्पण के सामने संवरकर देवआनंद की तरह सदा बहार बनने की असफल चेष्टा करता है उधर उनके बाप भी अपनी उमर और देवआनंद को उम्र की एवम् नियमित खानपान के सिद्धांतो को अपना कर चिरस्थायी यौवन प्राप्त किया है। लेकिन मूलभूत सिद्धांतो का अनुसरण ना करने के कारण बाप बेटे दोनों असफल ही जाते हैं।

गाइड, जॉनी मेरा नाम, हम दोनों, तेरे घर के सामने, सरहद, मुंबई का बाबू, हरे राम हरे कृष्णा, काला पानी, सी.आई.डी आदि कुछ प्रमुख उनकी यादगार फिल्में हैं।

देवआनंद यदि कुछ उच्चस्तर की फिल्मों में काम करें या निर्माण करें तो देवआनंद को आजीवन सदाबहार का खिताब मिल सकता है। गाइड, हरे रामा हरे कृष्णा, तेरे मेरे सपने, की सफलता के बाद देवआनंद ने ‘फ्लॉप’ एवं ‘बोर’ फिल्मों का ढेर लगा दिया जिनमें बनारसी बाबू जोशीला, छुपा रुस्तम, हीरा पन्ना, जैसी फिल्में थी जो दर्शकों को बुरी तरह ऊबा देती हैं।

इस सच को क्या देवआनंद झुठला सकते हैं कि इन दो सालों में उनकी शोहरत में जबरदस्त कमी आई है?

माना कि इन फिल्मों के ‘फ्लॉप’ होने के कई और कारण भी हो सकते हैं, परन्तु प्रमुख कारण देवआनंद की नीरस, बेजान व घिसीपिटी एक्टिंग भी है।

साल में ही प्रदर्शित फिल्म ‘इश्क इश्क इश्क’ में भी वह कोई तीर न मार सके। अपनी ‘फ्लॉप’ फिल्मों में एक और फिल्म का नाम जोड़ दिया।

अपनी ढलती उम्र, और बेजान एक्टिंग को देखते हुए देवआनंद को चाहिए कि वह इस प्रकार लोगों को बोर करने के बजाय अपनी फिल्मी जिंदगी से सन्यास ले लें।

अब वह जमाना आ गया जब किसी प्रमुख हीरो का नाम ही फिल्मों की सफलता का प्रतीक माना जाता था।

सदाबहार हीरो देवआनंद

बेशक, देव साहब सदाबहार हैं। यह तो सब जानते हैं कि इनकी उम्र पचास वर्ष से ऊपर है, लेकिन जो नहीं जानते वो तो यही कहेंगे की इनकी उम्र तो मुश्किल से 25 या 30 वर्ष की होगी। पता नहीं इनमें अब तक ऐसा कौन-सा स्पिरिट है जो आज भी अधेड़पन को पास तक नहीं फटकाने देता यह तो हुई इनकी सदाबहार सेहत की बात। जहां तक इनका अभिनय से संबंध है, इनका अभिनय कला को चरम सीमा को छू चुका है। इनकी अब तक प्रदर्शित होने वाली फिल्मों में ऐसे तो इनकी सबसे पुरानी फिल्में बहुत अच्छी लगी, लेकिन आखिरी फिल्म ‘जोशिला’ जो अमीर गरीब से पहले प्रदर्शित हो चुकी थी वैसे तो असफल रही लेकिन देव साहब का अभिनय अत्यंत सफल रहा और अगर वह फिल्म थोड़ी बहुत चली भी तो देव साहब और बिन्दु के उत्तम अभिनय के बल पर।

देवआनंद

पिछले बीस-पच्चीस वर्षो से देव आनंद हिन्दी फिल्म दर्शकों के दिलो के राजा बने हुए हैं। आज भी जब वह आयु में 50-55 वर्ष के आसपास पहुंच चुके है। वह पच्चीस वर्षीय खूबसूरत और प्रतिभा सम्पन्न कलाकार जैसा काम करते हैं। देवानन्द को प्रारंभ से लेकर अब तक की सारी फिल्मों को ध्यान में रखते हुए यदि यह विवेचन किया जाए कि उन्हें इतनी अपार सफलता, ख्याति क्यों मिली तो हमें निसंदेह यह कहना पड़ेगा कि देवानन्द ना केवल प्रतिभावान कलाकार रहे हैं और वरन् प्रारम्भ से इन्होंने अपनी कला और पेशे के साथ बुद्धिमानी बरती है और दूरदर्शिता से काम लिया है। देवानन्द ने अपनी फिल्मों में अपने आपको पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित स्वच्छंद युवक के रूप में लगातार स्थापित किया। उन्होंने वैसी ही कहानियां और वैसे ही चरित्र अपनाए जो अमेरिकी समाज या फिल्मों में आमतौर पर पाये जाते थे। उन्हें ऊपरी तौर पर देशी जामा जरूर पहनाया गया। अमेरिकी अभिनेता ग्रेगरीपेक देवआनद के आदर्श थे। देव के अभिनय, सवांद बोलने के तरीके, चलने भागने की शैली और पतले होठों की मुस्कान सभी पर ग्रेगरीपेक की छाप स्पष्ट झलकती रही, लेकिन यह देव की प्रतिभा का कमाल है और उसके लिए वे सराहना के प्रात्र भी हैं। कि किसी भी आलोचक ने कभी यह लिखने की जुर्रत नही समझी कि देव अमेरिकी अभिनेता ग्रेगरीपेक की नकल करते हैं। ठीक इसके विपरीत कुछ वर्ष पहले एक पत्रकार ने देव को हिन्दी फिल्मों का ग्रेगरीपेक कह कर पुकारा इस प्रकार देवआनन्द अपने आप में इस बात का प्रमाण हैं कि प्रतिभायुक्त प्रेरणा व्यक्तित्व को ऊपर ही उठाती है।


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Mayapuri

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