दर्पण झूठ न बोले

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gandhiji ke nasha mukti andolan[1]....

गांधी जी के नशा मुक्ति आंदोलन को पर्दे पर चित्रित करती फिल्म…
‘‘द इंटरनेशनल प्रॉब्लम’’

मुंबई के यशवंत राव आॅडिटोरियम में महाराष्ट्र सरकार की तरफ से आयोजित ‘सामाजिक न्याय व्यसन मुक्ति’ कार्यक्रम में भाग लेने के लिए कई महामहिम उपस्थित थे। जिनमें कुछ मेहमान थे- डॉ. डी.वाय. पाटिल (राज्यपाल – बिहार), श्री शिवाजी राव मोघे ( मंत्री 7 सामाजिक न्याय व व्यसन मुक्ति), श्री जयंत पाटिल ( मंत्री – ग्राम विकास व पालक ) एवं श्री संजय सावकारे (राज्यमंत्री-सामाजिक न्याय व व्यसन मुक्ति) आदि। श्री सुनिल प्रभु (मेयर-मुंबई), हुसैन दलवाई (अध्यक्ष-नशाबंदी मंडल व खासदार), श्री अरविन्द सावंत जैसे कई और खासदार यहां वक्ताओं की लिस्ट में शामिल थे। और, इन सबसे अलग थलग वहां बैठे थे- एक फिल्मकार डॉ. जगदीश वाघेला। डॉ. वाघेला ने हमें बताया कि वह गांधी जी के व्यसन मुक्ति आंदोलन को अपनी फिल्म ‘इंटरनेशनल प्रॉब्लम’ में एक संदेश के साथ चित्रित किया हैं। मौका था कि हम उनसे इस फिल्म के बारे में और भी जान पाते। प्रोग्राम के उपरांत वह हमें बताते हैं-

‘मेरी फिल्म का एक दृश्य है…।’ वह कहते हैं- ‘एक व्यक्ति दारू की दुकान का पता पूछता है। बताने पर वह फिर पूछता है- ‘यहां से कितना समय लगेगा दुकान तक पहुंचाने में? उत्तर देने वाला कहता है- ‘पहुंचने में तो सिर्फ दो मिनट लगेगा, मगर वापसी का पता नहीं। कई बार तो पूरा जीवन लग जाता है…।’ और, सचमुच दारू की लत छोड़ना बेहद मुश्किल काम है। हमने पर्दे पर इस विषय को कहानी के साथ उठाया है। वही व्यक्ति नशे की हालत में एक सेक्स-वर्कर (काल गर्ल) से शारीरिक सम्बन्ध बनाता है जिसे बाद में मालुम पड़ता है कि एड्स (एच आई वी – पॉजिटिव) है। फिर वह एड्स से बचने की लड़ाई लड़ता है और बाद में एक आंदोलन चलाता है नशाखोरी और एड्स के खिलाफ।’

डॉ. वाघेला कहते हैं- ‘शराब फारसी – भाषा का शब्द है। ‘श+राब’ यानि आग और पानी। अर्थात आग लगाने वाला, दंगा फसाद कराने वाला पानी। हिन्दी में इसे ‘दारू’ कहते हैं- दारू गोला (विस्फोटक)। आप जानते होंगे कि जहां सेना के अस्त्र-शस्त्र रखे जाते हैं उसे दारू गोला विभाग कहते हैं। अस्त्र – शस्त्र जो दुनिया का विनाश करते हैं उसी तरह ‘दारू’ दुनिया का विनाश करती है। ये सब बातें मैं वैसे ही नहीं सुना रहा हूं। यह सब मेरी फिल्म का हिस्सा है। कुछ डॉक्टर्स (मुंबई के कई मशहूर डॉक्टर्स) क्लास में मेडिकल स्टूडेन्टस को यह सब समझाते हुए दिखाई देंगे पर्दे पर। सिर्फ नशा ही नहीं बल्कि एड्स और गुप्त रोगों की कई मुश्किल बिमारियों पर भी खुली चर्चा है। धारा 377 ( लेस्बियन और होमो ) के कारण और निवारण पर भी हमने चित्रांकन पेश किया है। मेरा दावा है फिल्म देखकर आधे बिमार यूं ही ठीक हो जाएंगे।

गांधीजी के आदर्शों पर चलने वाले डॉ. जगदीश वाघेला पेशे से चिकित्सक हैं। ‘हमने फिल्म की विषयवस्तु पर कई डॉक्टरों से सलाह ली थी और कई इस कथानक को सामाजिक सरोकार मानकर पर्दे पर आकर लेक्चर देने के लिए तैयार हो गये।’ वह कहते हैं। ‘जब से सिनेमा शुरू हुआ है (पहली फिल्म – राजा हरिश्चंद्र से अब तक ) पर्दे पर शराब सिर्फ युवकों को गुमराह करती दिखाई गई है। यह पहली फिल्म है जो शराब से बचने का संदेश देती है। यह पूरी दुनिया की समस्या है इसीलिए हमने फिल्म का नाम रखा है- ‘इंटरनेशनल प्रॉब्लम!’


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Mayapuri

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