मूवी रिव्यू: बिना कहानी की ‘डेज ऑफ तफरी’

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रेटिंग*

कॉलेज की पृष्ठभूमि पर हमारे यहां अक्सर फिल्में बनती रहती हैं। उसी श्रंखला में निर्देशक कृष्णदेव यानिक की फिल्म का नाम ‘डेज ऑफ तफरी’  है। गुजराती फिल्म की रिमेक ये फिल्म पूरी तरह से कॉलेज के प्रांगण में स्टूडेन्ट्स के बीच होने वाली गति विधियों पर आधारित कॉमेडी फिल्म है।

कहानी

कॉलेज में निखिल, विकी, सुरेश, पूजा, ईशा, निशा तथा दूल्हा आदि ऐसे दोस्त हैं जो न एक दूसरे की टांग खींचते रहते हैं बल्कि टीचर्स और प्रिंसिपल तक को भी नहीं छोड़ते। ये सिलसिला फिल्म की शुरुआत से अंत तक चलता है बिना किसी मकसद और ध्येय के। बस शुरू से अंत तक ये किरदार हंसी मजाक या खींचा तानी ही करते दिखाई दिये हैं।days-tafree

निर्देशन

गुजराती फिल्म के निर्देशक भी कृष्णदेव याज्ञनिक ही थे और वहां वो फिल्म सफल साबित हुई थी। लेकिन अगर सेम गुजराती की भी यही कहानी थी तो आष्चर्य है कि वो सफल फिल्म साबित हुई। लेकिन अगर फिल्म की बात की जाये तो फिल्म के किसी भी पोर्षण से देख लीजीये वो एक जैसी ही दिखाई देगी। यानि जैसी शुरू में, वही अंत में। फिल्म में न तो कोई कहानी है और न ही कोई मकसद। बस एक कॉलेज है और उसमें ये किरदार हैं जो पढ़ने के अलावा सब कुछ करते हैं। कभी कभी कहानी किसी किरदार के घर पर भी चली जाती है। रही पेरेन्टस की बात तो उनके लिये ऐसे ऐसे शब्द इस्तेमाल किये गये हैं कि आश्चर्य  होता हैं कि आखिर निर्देशक कहना क्या चाहता है।

अभिनय

फिल्म में सभी नये कलाकार हैं जैसे यश सोनी, अंश बागरी, संचय गोस्वामी, मनीष मेहता, अनुराधा मुखर्जी, सरबजीत बिंद्रा तथा ममता चौधरी। इन सारे कलाकारों के हिस्से में चुहलबाजी, मसकरी करना ही आया जिससे पता ही नहीं चलता कि वे किस दर्जे के कलाकार हैं।days-of-tafree

संगीत

बॉबी इमरान की कंपोजिंग के सभी गीत साधारण स्तर के हैं।

क्यों देखें

अगर आप दो घंटे मल्टीप्लक्स सिनेमा का आनंद लेना चाहते हैं तो इसका अवसर फिल्म देखते हुये मिल सकता है क्योंकि ऐसी बिना कहानी की तफरी देखते हुये आप आराम से नींद ले सकते हैं।


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Mayapuri

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