मूवी रिव्यू: पेरेंट्स के प्यार से वंचित बचपन की व्यथा ‘डियर जिन्दगी’

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मां बाप के बिना बचपन बिताना कितना मुश्किल होता है और जो पेरेंट्स अपने काम के चक्कर में अपनें बच्चों को किसी और के यहां पलने के लिये छोड देते हैं, बाद में इस बात का बच्चे पर किस हद तक बुरा प्रभाव पड़ सकता है। गौरी शिंदे ने गौरी खान, स्वंय तथा करण जौहर के सहयोग से अपने निर्देशन में बनी फिल्म ‘डियर जिन्दगी’ में यही सब बताने की कोशिश की है।

आलिया भट्ट का बचपन अपने मां बाप की जगह अपने नाना नानी के यहां बीता और जब उसका मन वहां लगने लगा तो मां बाप उसकी मर्जी के खिलाफ उसे अपने साथ ले गये। छोटी आलिया महसूस करती है कि अब उसकी मां का ध्यान उससे ज्यादा उसके नवजात भाई पर था। लिहाजा उसे बचपन से अकेलेपन से डर लगने लगा है। वो बहुत कम उम्र में ही सिनेमाटोग्राफर बन चुकी है और फिलहाल विज्ञापन फिल्में शूट करती है लेकिन उसका सपना फीचर फिल्म शूट करने का है। वहां उसकी हेल्प करता है फिल्म डायरेक्टर कुणाल कपूर जिसे एक बाहर की फिल्म मिलती है जिसमें वो आलिया को ब्रेक देने का वादा करता है। आलिया एक होटेलियर अंगद बेदी से प्यार करती है लेकिन जल्दी ही उसे छोड़ कुणाल की तरफ आकर्षित हो जाती है लेकिन जब उसे पता चलता है कि कुणाल की फिल्म में कुणाल के साथ उसकी एक्स गर्लफेंड बतौर लाइन प्रोडयूसर काम करने वाली है जब ये बात कुणाल आलिया को बताता है तो असुरक्षा की भावना से ग्रस्त आलिया न सिर्फ फिल्म करने से इंकार कर देती है बल्कि कुणाल से भी अपने रिश्ते खत्म कर लेती है। इसके बाद वो अपने पेरेंट्स के पास गोवा आ जाती है। यंहा आने के बाद उसकी नींद खत्म हो जाती है वो एक हद तक चिड़चिड़ी हो जाती है और जब एक दिन कुणाल उससे मिलने आता है तो वो उसे भी भगा देती है। उसी दौरान उसकी मुलाकात मनोचिकित्सक डा़ जहांगीर खान यानि शाहरूख खान से होती है। जहांगीर यानि जग उसका ट्रीटमेन्ट करते हैं। इस बीच उसे एक सिंगर अली जफ़र के नजदीक आने का मौका मिलता है लेकिन जल्द ही वो उससे भी बौर हो जाती है। बाद में डा़ जग से उसे पता चलता है कि बचपन में उसके साथ जो कुछ हुआ जिसकी बदोलत उसे डर रहता है कि जिससे भी वो प्यार करती है वो भी उसे कहीं अकेला न छोड़ दे लिहाजा वो पहले ही उसे छोड़ देती है। आखिरकार डा़ जग उसे पूरी तरह ठीक करने में सफल होते हैं। इसके बाद आलिया दुनिया को एक नई नजर से देखने लगती है।dearzindagi-story

इंगलिश विंगलिश के बाद गौरी शिन्दे ने एक नये सब्जेक्ट को अपनी फिल्म का विषय बनाया है जिसे उन्होंने विस्तार से बताने की कोशिश की इसलिये फिल्म लंबी हो गई। लंबाई की बदौलत एक जगह आकर दर्शक की कथानक से रूचि घटने लगती है क्योंकि फिल्म में किसी सीरियल की तरह कलाकार काम करते दिखाई देने लगते हैं, साथ ही निर्देशक ने मुख्य किरदार के साथ आधुनिकता का ऐसा संसार रचा है जिसकी अभी हमारी फिल्मों में कोई जगह नहीं। करण जौहर की पहली फिल्म की तरह इस बार कई स्टार्स ने मेहमान भूमिकाये निभाई हैं जैसे कुणाल कपूर, अंगद बेदी, अली जफर तथा आदित्य राय कपूर और शाहरूख खान। ये सारे किरदार आलिया के इर्द गिर्द दिखाई देते हैं और लुप्त हो जाते हैं। लेकिन जब जब शाहरूख पर्दे पर आते हैं तब तब फिल्म वजनदार होने लगती है। गोवा की लोकेशन बहुत सुंदर है, फोटोग्राफी शानदार है तथा अमित त्रिवेदी ने कहानी के अनुसार संगीत घढ़ा है जो फिल्म के दौरान अच्छा लगता है।dear-zindagi_

इसमें कोई शक नहीं कि यंग जनरेशन की खेप में आलिया भट्ट सबसे ज्यादा टेलेंटिड अभिनेत्री है उसने एक बेहद कठिन भूमिका को सहजता से निभा कर दिखाया, खासकर शाहरूख और उसके सीन्स कमाल के बन पड़े हैं। शाहरूख खान ने मनोचिकित्सक की भूमिका में अपने अनुभवों का सहारा लेते हुए उसे एक यादगार भूमिका बनाने में कोई कसर नहीं रखी। कुणाल कपूर, अली जफ़र अंगद बेदी तथा आदित्स राय कपूर के हिस्से में करने के लिये ज्यादा कुछ नही आया। आलिया की फ्रेंड के रूप में इरा दूबे ने अच्छा काम किया है।dear-zindagi

फिल्म शिद्दत से बताती है कि जो पेरेंट्स अपने बच्चों को बचपन में अलग कर देते हैं बाद में वे कैसी मानसिक स्थिति से दो चार हो सकते हैं यानि फिल्म पेरेंट्स के प्यार से वंचित बचपन की व्यथा प्रभावशाली ढंग से कहने की कोशिश करती है।


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Mayapuri

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