‘‘मुझे लगता है कि अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है.’’ -धीरज कुमार, निर्माता-सीरियल ‘‘सिंहासन बत्तीसी’’

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‘कहाॅं गए वह लोग’, ‘ओम नमः शिवाय’’, महिमा शनिदेव की’ सहित कई लोकप्रिय सीरियलों का निर्माण कर चुके धीरज कुमार इस बार अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘‘क्रिएटिव आई’’ के तहत एक सीरियल ‘‘सिंहासन बत्तीसी’’ लेकर आए हैं, जिसे वह ऐतिहासिक, धार्मिक और फैंटसी सीरियल की संज्ञा देते हैं.

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आपको तो धार्मिक व ऐतिहासिक सीरियल बनाने में महारत हासिल हो चुकी है?
-ऐसा कुछ नहीं है. मैं तो अभी भी सीखने की कोषिष कर रहा हूं. 30 साल से काम करता रहा हॅूं, पर मुझे लगता है कि अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है.
आपके सीरियल‘‘सिंहासन बत्तीसी’’को किस तरह का रिस्पाॅंस मिल रहा है?
-मेरे लिए ख़ुशी की बात है कि यह सीरियल अच्छा जा रहा है. लोग इसे पसंद कर रहे हैं.
जब आपके दिमाग में इस सीरियल का निर्माण करने की बात आयी,तो  आपने क्या सोचा?
-इस सीरियल का निर्माण करने से पहले हमारे दिमाग में यह बात घूम रही थी कि यह किस चैनल पर आए जिससे इसके साथ न्याय किया जा सके. इसी उधेड़बुन के बीच एक दिन मेरी मुलाकात ‘सोनी पल’ चैनल के सीनियर एक्ज्युकेटिव वाइस पे्रसिडेंट एंड बिजनेस हेड अनुज कपूर से हुई. मुश्किल से पांच मिनट की बातचीत के अंदर ही अनुज कपूर ने इस सीरियल को बनाने के लिए हामी भर दी.
आपके सीरियल ‘‘ओम नमःशिवाय’’  मुकाबले यह कितना बड़ा सीरियल है?
-हमारा सीरियल‘‘सिंहासन बत्तीसी’’ एक बहुत बड़ा और भव्य धारावाहिक है. लेकिन भावनात्मक दृष्टिकोण से  ‘‘ओम नमः शिवाय’’ मेरे लिए सदैव सबसे बड़ा सीरियल रहेगा. कलात्मक दृष्टिकोण से ‘‘सिंहासन बत्तीसी’’ बड़ा है.
आपके लिए ‘‘सिंहासन बत्तीसी’’ धार्मिक है या ऐतिहासिक?
-हम शुरू से जानते थे कि हमारे सीरियल के पात्र ऐतिहासिक हैं. राजा विक्रमादित्य और राजा भोज हमारे इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं. विक्रमादित्य की ही वजह से विक्रम संवत की शुरआत हुई थी. पर इस ऐतिहासिक कहानी को बयां करते समय बीच बीच में कुछ धार्मिक कथाएं भी आती हैं. मसलन, सभी को पता है कि विक्रमादित्य को न्याय प्रिय राजा माना गया है. जब सभी देवी देवताओं के सामने सूर्य व उनके पुत्र शनि के बीच इस बात पर बहस छिड़ी कि उनमें से कौन सबसे बड़ा है? तो किसी के पास जवाब नहीं था. मगर राजा विक्रमादित्य ने कहा -‘‘बड़ा तो हमेशा पिता ही रहेगा.’’ इसी के साथ हमने इस सीरियल में फैंटसी का एलीमेंट भी डाला है. हम यह धारावाहिक परिवार के हर सदस्य यानी कि बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए बना रहे हैं. हमारेे हिसाब से ‘सिंहासन बत्तीसी’ में धार्मिकता, ऐतिहासिकता और फैंटसी तीनों समाहित हैं. मेरे कहने का अर्थ यह है कि यह पहला सीरियल है, जो एक साथ तीन चीजों को लेकर आ रहा है.

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सीरियल की कहानी क्या है?
-यह कहानी है वीरता, साहस, शौर्या और पराक्रम की. भगवान इंद्र द्वारा राजा विक्रमादित्य को दिया गया सिंहासन है-‘सिंहासन बत्तीसी’. राजा विक्रमादित्य अपने साहस, ईमानदारी, मानवता के कारण राजा बने थे. उनकी मौत के बाद 1100 साल तक कोई भी पुरूष इस योग्य नही हुआ, जिसे यह सिंहासन नसीब होता. 1100 साल बाद धरना गिरी के राजा राजा भोज ने इस सिंहासन को पाने के लिए बत्तीस गुणों से युक्त होने की परीक्षा पास की.
वास्तव में सिंहासन बत्तीसी 12 वीं शताब्दी की कथा है, जो कि मूल रूप से संस्कृत में लिखी गयी है. देवराज इंद्र एक अलौकी सिंहासन का निर्माण अपनी शक्तियों से करते हैं और रत्नों के स्थान पर बत्तीस अपसराओं को पुतलीयों की तरह सिंहासन की शोभा में जड़ते हैं.और कहते हैं कि यह अपसराएं वह पुतलीयां होगी, जो राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में उनकी सलाहकार भी होंगी और सहयोगी भी. इसी के साथ यह सिंहासन की शोभा भी बढ़ाएंगी. क्योंकि यह जीवित पुतलियां कहलाएंगी. उसके बाद राजा इंद्र ने इस सिंहासन का नाम ‘सिंहासन बत्तीसी ’रखा. फिर विक्रमादित्य को यह सिंहासन भेंट किया. उस वक्त तक राजा विक्रमादित्य पर चल रही शनि की साढ़े साती खत्म हो चुकी थी. इस तरह से विक्रमादित्य के शासनकाल में सिंहासन बत्तीसी और राजा बत्तीसी एक दूसरे के नाम के पूरक बन चुके थे.
राजा विक्रमादित्य की मृत्यु के बाद ‘सिंहासन’का कोई उत्तराधिकारी नहीं था. इंद्र, विक्रमादित्य के राज्य के लोगों को आदेश देते हैं कि इस सिंहासन को सुरक्षित जगह पर रख दिया जाए. क्योंकि अब कोई भी ऐसा राजा नहीं है, जो इस सिंहासन पर बैठ सके. अंततः यह सिंहासन वन क्षेत्र में रखवा दिया जाता है. समय गुजरता है. सिंहासन धरती के गर्भ में समा जाता है. पूरे ग्यारह सौ साल गुजर जाते हैं. उसके बाद उज्जैन नगर के नाम धरनागिरी के राजा भोज के साथ एक आश्चर्यजनक घटना घटती है. राजा विक्रमादित्य का सिंहासन उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करता है. राजा भोज उस गुफा तक पहुंच जाते हैं, जहां यह सिंहासन रखा हुआ है, वह इस सिंहासन पर बैठने लगते हैं .तभी एक अजूबा होता है, फिर उन्हें महामाया कहानी सुनाती है . उसके बाद सभी 32 पुतलियां एक एक कर राजा भोज की परीक्षा लेती है. और राजा भोज को साबित करना पड़ता है कि वह भी राजा विक्रमादित्य की ही तरह योग्य है.

 

इस सीरियल से जुड़े़ कलाकारों को लेकर क्या कहेंगे?

-सीरियल ‘‘सिंहासन बत्तीसी’’ में राजा विक्रमादित्य के किरदार में करण सूचक,राजा भोज के किरदार में सिद्धार्थ अरोड़ा, राजा भोज की पत्नी वल्लारी के किरदार में चेष्टा मेहता,  महामाया के किरदार में शायंतनी घोष, विक्रम की पत्नी चित्रलेखा के किरदार में काजल जैन, इंद्र के किरदार में कुणाल भाटिया, राहू के किरदार में अली हसन, शनिदेव के किरदार में गगन कंग,गुरूजी वाराहगिरी के किरदार में मनोज जयसवाल नजर आ रहे हैं.
विषयवस्तु का ट्रीटमेंट किस तरह से किया जा रहा है?
-हमने प्राचीन भारतीय इतिहास के पन्नों में दर्ज कहानी ही ली है. इसकी कुछ कहानी ऐतिहासिक व कुछ कहानी धार्मिक हैं. इसलिए इसे धर्म इतिहास और फंतासी के मिश्रण के साथ पेश कर रहे हैं.कहानी की सूत्रधार मुख्य पुतली यानी कि महामाया है. सीरियल के सभी पात्रों के काॅस्ट्यूम को भारतीय प्राचीन इतिहास में दर्ज पोशाकों को उठाया गया हैं.
सीरियल की यूएसपी क्या है?
-यह एक ऐतिहासिक व फैंटसी सीरियल हैं, जिसमें कुछ धार्मिक कथा भी है. इसमें 32 सुंदर स्त्रियां हैं, जिन्होंने 32 पुतलियों का किरदार निभाया है. जो कि एक एक करके जीवित होती हैं. सीरियल की मेन प्रोटाॅगानिष्ट हैं महामाया, जो कि सीरियल की कथा की सूत्रधार भी है. इस सीरियल के माध्यम से हम औरतों के 32 गुणों को उजागर करते हैं. यह गुण हैं- ‘‘प्यार, त्याग, भक्ति, समर्पण, भावना, क्षमाशीलता, बुद्धिमता, माॅरालिटी, स्वीकार्यता आदि. औरतों के यह सारे गुण ऐसे हैं, जिनके साथ हर औरत रिलेट कर सकेगी. सीरियल ‘सिंहासन बत्तीसी’ की कहानी हम बत्तीस औरतों के माध्यम से बयां कर रहे हैं. यदि हम यह कहें कि इस ऐतिहासिक और फैंटसी सीरियल की कथा का इंजन औरतें हैं, तो कुछ भी गलत नहीं होगा.


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Mayapuri

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