देव आनंद

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मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया- देव आनंद

देव आनंद जी को राजेश खन्ना से भी पहले सिनेमा का ‘पहला चॉकलेटी नायक’ होने का गौरव मिला। देव आनंद की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्होंने जो भी पहना, जो भी किया वो एक स्टाइल में तब्दील हो गया। फिर चाहे वो उनका बालों पर हाथ फेरने का अंदाज हो या काली कमीज की पहनने का या फिर अपनी अनूठी शैली में जल्दी-जल्दी संवाद बोलने का। मुनीम जी (1955), फंटुश, सीआईडी (1956), पेइंगगेस्ट (1957) ने उन्हें सफलतम स्टायलिश स्टार बना दिया। इनकी झुककर चलने की अदा, एक सांस में लम्बे डायलॉग बोलना और तिरछे होकर सिर हिलाना उनका ट्रेडमार्क बन गया।

बॉलीवुड सदाबहार हीरो देव आनंद का पूरा नाम धर्मदेव पिशौरीमल आनंद है। देव आनंद जो कि भारतीय सिनेमा के महान कलाकार, निर्माता व निर्देशक हैं, का जन्म अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर ज़िले (अब पाकिस्तान में) में 26 सितंबर, 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ उनके पिता किशोरीमल आनंद पेशे से वकील थे। उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। देव आनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक थे। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की माँ है। बचपन से ही देव जी का झुकाव अपने पिता के पेशे वकालत की ओर न होकर अभिनय की ओर था। एक वकील और आज़ादी के लिए लड़ने वाले पिशौरीमल के घर पैदा होने वाले देव ने रद्दी की दुकान से जब बाबूराव पटेल द्वारा सम्पादित ‘फ़िल्म इंडिया’ के पुराने अंक पढ़े तो उन की आंखों ने फ़िल्मों में काम करने का सपना देख डाला और वह माया नगरी मुम्बई के सफर पर निकल पड़े।

 देव आनंद ने अंग्रेज़ी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की। इस कॉलेज ने फ़िल्म और साहित्य जगत को बलराज साहनी, चेतन आनंद, बी. आर. चोपड़ा और खुशवंत सिंह जैसे शख़्सियतें दी हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं थे।

जब देव आनंद आगे पढाई न केर सके तो उन्होंने नोकरी करने का फैसला किया  और उनकी पहली नौकरी मिलिट्री सेन्सर ऑफिस (आर्मी करेस्पांडेंस सेंसर डिपार्टमेंट) में एक लिपिक के तौर पर मिली जहाँ उन्हें सैनिकों द्वारा लिखी चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़ कर सुनाना पड़ता था। इस काम के लिए देव आनंद को 165 रुपये मासिक वेतन के रूप में मिला करता था जिसमें से 45 रुपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज दिया करते थे। लगभग एक वर्ष तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद और परिवार की कमज़ोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए वह 30 रुपये जेब में ले कर पिता के मुंबई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत देव अपने भाई चेतन आनंद के साथ फ्रंटियर मेल से 1943 में मुंबई पहुँच गये। चेतन आनंद उस समय भारतीय जन नाटय संघ इप्टा से जुड़े हुए थे। उन्होंने देव आनंद को भी अपने साथ इप्टा में शामिल कर लिया।

देव आनंद को अशोक कुमार का अभिनय देखके फिल्मों में काम करने का इरादा आया।  देव आनंद को पहला काम 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक हैं’ में  मिला. वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म “जिद्दी” देव आनंद के फिल्मी कॅरियर की पहली हिट फिल्म थी।  इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के लिए  नवकेतन बैनर की स्थापना की. नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अफसर का निर्माण किया। अफसर का  निर्देशन  चेतन आनंद ने किय। नवकेतन  की  अगली फिल्म बाजी के निर्देशन की जिम्मेदारी गुरूदत्त को सौंप दी गयी।  बाजी फिल्म सफल हुयी।  इस सफलता  के बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे.  देव आनंद ने मुनीम जी, दुश्मन, कालाबाजार, सी.आई.डी, पेइंग गेस्ट, गैम्बलर, तेरे घर के सामने, काला पानी जैसी कई सफल फिल्मों में  किया।देव आनंद ने हॉलीवुड के सहयोग से हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म गाइड का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कॅरियर की पहली रंगीन फिल्म थी. इस फिल्म के लिए देव आनंद को उनके जबर्दस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया. फिल्म  प्रेम पुजारी के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया. इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा का भी निर्देशन किया। इस फिल्म अच्छा चली।  इनके निर्देशन में आया फिल्मों में हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला, अव्वल नंबर फिल्में सफल हुई।देव आनंद ने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी. जिसमें वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म आंधियां के अलावा हरे रामा हरे कृष्णा, हम नौजवान, अव्वल नंबर, प्यार का तराना, गैंगेस्टर, मैं सोलह बरस की, सेन्सर आदि फिल्में शामिल हैं।

यदि देव आनन्द जी के व्यक्तिगत जीवन पर नज़र डाले तो वो भी बहुत ही दुखद ही है देव जी का पहला प्यार उस समय की मशहुर और खुबसूरत गैका और एक्ट्रेस सुरया थी जो की एक गाने की शूटिंग के दौरान मिले थे जहाँ देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई जिसमें उन्होंने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं लेकिन सुरैया की दादी की इजाजत न मिलने पर यह जोड़ी शादी कर नहीं सकी। वर्ष 1954 में देव आनंद ने अभिनेत्री कल्पना कार्तिक से शादी कर ली और उनका एक बेटा भी हुआ जिसका नाम ।

इस महान एक्टर और डायरेक्टर ने जिसने कभी थकना नहीं सीखा था  और जिसकी युवा अवस्था जीवन भर जिनका साथ निभाती रही उस महान कलाकार ने सन 2011  में लंदन में आखरी सांसे ली देव आनंद जी को दिल का दौरा आया और उनका देहांत हो गया।


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Mayapuri

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