एक धर्मेन्द्र जी बैंगलौर में एक मुंबई में

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मायापुरी अंक 12.1974

 

मैं आर.के. स्टूडियो में पहुंचा वहां ‘धरमवीर’ की शूटिंग चल रही थी। सैट पर हीरो धर्मेन्द्र निर्देशक मनमोहन देसाई के साथ खाना खाकर बाहर जा ही रहे थे कि मैंने उन्हें रोक लिया।

धर्मेन्द्र ने कहा “आज इस वक्त नही घर भाग रहा हूं। फिर वहां से जाऊंगा पार्टी में।

मैंने कहा “तो फिर कल सुबह

धर्मेन्द्र ने आगे बढ़ते हुए कहा” नही, कल सुबह छ: बजे की फ्लाइट से बैंगलौर उड़ रहा हूं। अब हाल यह है कि कुछ दिन बैंगलौर में तो कुछ दिन बम्बई में।

मैंने मजाक में कहा- “तो यों कहिए एक धर्मेन्द्र बैंगलौर में तो दूसरा धर्मेन्द्र बम्बई में।

मेरी यह बात सुनते ही उन्होनें चौंककर मेरी तरफ देखा। गोया मैंने कोई खास बात कह दी है। फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा –“वाकई, कभी –कभी मुझे भी ऐसा ही लगता है. बैगलौर में मूड कुछ और हो जाता है। वहां काम करने का मजा आता है। कोई भाग दौड़ नही। कोई टेंशन नही अब तो मैं खुद कोई निर्माताओं से कहता हूं कि बैंगलौर चलो-वही आराम से शूटिंग करो। काम तेजी से होगा.

धर्मेन्द्र मोटर में बैठ चुके थे। फिर भी मैं यह कहे बिना नही रहा-“यदि आपके सारे निर्माता बैंगलौर पहुंच गये तो बम्बई की आधी फिल्म इंडस्ट्री सोमू मुखर्जी वही पहुंच जाएगी। वहां भी चख-चख शुरू हो गई तो क्या होगा?

धर्मेन्द्र ने तीखी नजरों से मेरी और देखा और फिर ड्राइवर से बोले “चलो भागो यहां से

मैं सोचने लगा-धर्मेन्द्र अपने साथ बम्बई को कही बैगंलौर न पहुचा दे।


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Mayapuri

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