और फिर धर्मेन्द्र साहब ने उस टाइप की होली से तौबा कर ली

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Dharmendra

हालांकि मैंने धर्मेंद्र का वह जमाना नहीं देखा जब वे कड़क जवान ही-मैन के रूप में फिल्मों में राज करते थे और महिला दर्शक उन पर जी जान लुटाने को तैयार रहते थे, लेकिन आज उन्हें देखकर यकीन हो जाता है कि वे क्यों बॉलीवुड के सबसे हैंडसम ही-मैन कहलाए जाते थे और लड़कियां उन पर क्यों फिदा होती थी। उनकी शर्मीली आंखें और शर्मीली मुस्कान में वह बात थी कि वे शरारत करके भी बच निकलते थे, लेकिन कभी-कभी मासूमियत धरी की धरी रह जाती है जब कभी लक से पंगा हो जाता है। ऐसा धर्मेंद्र के साथ भी हुआ था जब वे बच्चे थे, अक्ल के कच्चे थे। बात बहुत पुरानी है, धर्म जी ने सुनाई कहानी है, “होली के दिन सब बच्चे अपने अपने रंगों की बाल्टियां, पिचकारी और जेबों में गुलाल भर कर निकल पड़ते थे, ऐसे लोगों की तलाश में जिनके कपड़े झकाझक सफेद हो या जिनपर रंग ना लगे हो और जो होली खेलने के नाम पर आनाकानी करते हो। ऐसे लोगों को बलि का बकरा बनाना मेरे दोस्तों, खासकर मेरे छोटे भाई अजीत को बहुत अच्छा लगता था। मैं जितना शरीफ था, अजीत उतना ही शरारती था। वो गाँव भर के शरारती लड़कों का सरगना था। वो किसी से डरता नहीं था। सिर्फ पापा से डरता था और सिर्फ पापाजी ही थे जो उनकी पिटाई करते थे।  मैं शर्मिला होने के कारण होली की हुड़दंग में शामिल नहीं होता था लेकिन अजीत कहां मानने वाला था उसने एक बार मुझे भी अपनी शरारतों में शामिल कर ही लिया। हम लोग होलिका दहन के लिए चंदा मांगने निकले थे, पहचान वाला हो या अजनबी, हम बच्चे सब का रास्ता रोककर होलिका दहन के लिए चंदा मांगते और जो बंदा चंदा देने से इंकार करता उसका चेहरा और कपड़े ऐसे ऐसे रंग लगा कर लाल, पीला, काला कर देते जिसे आसानी से साफ करना मुमकिन नहीं था। उस दिन सुबह से एक भी बकरा हमारी चंगुल में नहीं फंसा था, हम सब मायूस होने लगे थे। तभी हमने देखा गांव की सड़क पर से एक अच्छा खासा अमीर सा दिखने वाला बंदा, झकाझक नए सफेद कपड़ों में चला आ रहा है। उनके हाथ में बैग भी था और वह गांव का आदमी नहीं लग रहा था, बाहर से आया दिखता था। हम सब ने लपक के उन्हें घेर लिया और चंदा मांगते हुए शोर मचाने लगे। उस व्यक्ति ने हमारे घेरे से छूटने की बहुत कोशिश की और हम सब बच्चों को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन हमारी बदमाश टोली कहां मानने वाली थी। आखिर गुस्से में आकर उस व्यक्ति ने एक भी पैसा देने से साफ इंकार कर दिया। हालांकि मैं सिर्फ दर्शक बना चुपचाप टोली में शामिल था लेकिन दूसरे बच्चे चींखते चिल्लाते गाली देने लगे। जब वह व्यक्ति अड़ा रहा तो सबने उसे पकड़ कर उसके कपड़े तारकोल तथा रंगों से खराब कर दिया और उन्हें खूब सताकर उनकी हालत खराब करके छोड़ा। उसके बाद हम उसे छोड़ आगे बढ़ गए। दोपहर को जब हम लंच करने घर वापस आए तो देख कर दंग रह गए कि वह महाशय मेरे घर पर पापा जी के साथ मंजी पर बैठे थे और लस्सी पी रहे थे। हम दोनों भाई उन्हें देखकर थर थर कांपने लगे। वह व्यक्ति भी हमें देख कर हैरान था। शायद वे अब तक अपने फटे और रंगे हुए कपड़े तथा चौराहे पर बच्चों द्वारा की गई दुर्गति का किस्सा पापा को सुना चुके थे। हमें देखते ही उन्होंने पापा जी से कहा, “यह दोनों भी उन बदमाशों की टोली में शामिल थे।” यह सुनते ही पापा जी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया, गुस्से में उनकी आंखें लाल हो गई, वे उठे और दनादन हमारी पिटाई करने लगे। उन्हीं साहब ने बीच में पड़कर हम दोनों भाइयों को और ज्यादा पिटने से बचाया, वरना शायद हमारी दुर्गति उससे भी ज्यादा होती जितनी हमने उन साहब की की थी। उस दिन के बाद मैंने उस टाइप की होली से तौबा कर ली।

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