‘मुझे उस स्पेशल इशू का इंतजार है’ – डायना पेंटी

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अपनी पहली ही फिल्म से लाइम लाइट में आई अभिनेत्री डायना पेंटी को दूसरी फिल्म हैप्पी भाग जायेगी में उसकी शानदार एक्टिंग की समीक्षकों ने खुलकर तारीफ की थी। यही नहीं उसे अपनी पहली फिल्म के लिये ढेर सारे एवार्डस हासिल हुये। डायना अब फिल्म ‘ लखनऊ सैंट्रल’ में एक अलग से किरदार में नजर आ रही है। फिल्म को लेकर उसके साथ एक मुलाकात।

फिल्म में अपनी भेमिका को लेकर आपका क्या कहना है ?

मैं लकी हूं कि मुझे हर बार एक नये किस्म की भूमिकायें निभाने का मौंका मिल रहा है। इस बार मैं गायत्री कश्यप नामक ऐसी सोशल वर्कर की भूमिका निभा रही हूं जो किसी एनजीओ से जुड़ी है। गायत्री जेल के कैदियों के लिये काम करती  है। उसका मानना है चूंकि कैदी भी इंसान होते हैं, उन्हें भी वैसी जिन्दगी जीने का हक है जैसी आप और मैं जीती हूं। इसके अलावा मैं कैदियों को कुछ छोटे मोटे काम भी सिखाती हूं जैसी सिलाई कढ़ाई या कारपेंटरिंग आदि। जिससे वह अपनी सजा पूरी करने के बाद  उन काम धंधों के तहत आम आदमी की तरह जिन्दगी जी सके।

लखनऊ सेंट्रल क्या है?

लखनऊ सेंट्रल एक जेल का नाम है। इस जेल के कैदियों पर आधारित ये एक सच्ची घटना पर बनी फिल्म है। उस जेल में कैदियों का एक बैंड है, जो जेल के बाहर भी बहुत मशहूर रहा है। दरअसल उस बैंड के कैदी कलाकारों से जेलर और कुछ बड़े नेता इस कदर प्रभावित थे कि उन्हें बाहर परफार्म करने की भी इजाजत मिलती रहती थी। वह बैंड आज भी है। मैं और मेरे साथी कलाकार जब जेल में विजिट करने गये थे, तब उस बैंड ने हमारे सामने भी परफार्म किया था। वह बॉलीवुड सांग्स पर इतना खूबसूरत परफार्म करते हैं कि उन्हें सुनते हुये आप मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। यह बैंड  आज भी बाहर षादियों या समारोह में परफार्म करता रहता हैं।

तो क्या इसे म्युजिकल फिल्म कहा जाये ?

हम इसे बेशक म्यूजिकल ड्रामा जॉनर की फिल्म कह सकते हैं। वैसे ये असली कैंदियों से एक हद तक मिलती जुलती कहानी है लेकिन फिल्म में मनोरजंन भी होना चाहिये, इसलिये थोड़ी बहुत फिल्मी लिर्बटी भी ली गई है।

घौर अपराधियों के बारे भी आपका यही ख्याल है ?

दरअसल गायत्री का मानना है कि जेल में निन्यानवे प्रतिशत ऐसे कैदी होते हैं जो आवेश में या अंजाने में कोई अपराध कर बैठते हैं। उन्हें अपराधी नहीं कहा जा सकता। लिहाजा उन्हें सुधरा जा सकता है, इसलिये उन्हें अपनी गलती सुधारने का एक मौका मिलना चाहिये, रहे पेषेवर अपराधी, उनके बारे में कोई बात नहीं की जा सकती।

इस बार आपके सामने तकरीबन सभी बढ़िया परफॉर्मर हैं। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा ?

अगर मेरे कोस्टार्स की बात की जाये तो फिल्म में मैं उन सबसे जूनियर हूं। उनमें फरहान अख्तर, दीपक डोबरियाल, इनामुल हक़, रॉनित रॉय तथा राजेश शर्मा जैसे बेहतरीन अदाकारों के सामने जब काम करने का वक्त आया तो मैं बहुत नर्वस थी। मुझे लग रहा था कि क्या मैं इतने सीनियर एक्टर्स के साथ  उनकी बराबरी का तो नही, लेकिन अच्छा काम कर पाउंगी। परन्तु दो तीन दिन के बाद उनके साथ मैं परी तरह सहज हो काम कर रही थी और सच मानिये, मुझे उनके साथ काम करते हुये काफी कुछ सीखने का अवसर मिला। मैं कह सकती हूं उन सभी ने फिल्म की शूटिंग के आखिरी दिन तक तक हर तरह से संभाले रखा।

मायापुरी फिल्म पत्रिका के बारे में कितना जानती हैं ?

ज्यादा तो नहीं, लेकिन मैं आपसे जब अपनी पहली फिल्म कॉकटेल के लिये मिली थी। उस वक्त आपने खुद बताया था कि ये इंडस्ट्री की पुरानी और सम्मानित  फिल्म पत्रिकाओं में से एक रही है, जिसे आज भी उतना ही पंसद किया जाता है जितना कि पहले किया जाता था। मुझे अपनी हर फिल्म के दौरान आपकी पत्रिका का सहयोग मिला, उसके लिये शुक्रिया।

क्या आपको पता है कि इस बार का एडिशन लखनऊ सेंट्रल स्पेशल है ?

ओह। सच। मुझे उस स्पेशल इशू का इंतजार रहेगा ?

आप महज अपनी दो फिल्मों से  अपने आपको बेहतरीन अभिनेत्री साबित कर चुकी हैं । बावजूद इसके आपके कॅरियर की  गति काफी धीमी हैं ?

देखिये यहां मेरा कोई रिश्तेदार या गॉडफादर तो है नहीं इसलिये मुझे अभी तक जो काम मिला उसे आप मेरी किस्मत ओर मेरे टेलेन्ट के सदके मिला कह सकते हैं  फिर भी अभी तक मेरी दो फिल्मों के लिये ढेर सारे पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। जैसे मुझे मेरी पहली फिल्म में ही बेस्ट फीमेल डेब्यू का फिल्म फेयर अवार्ड, मोस्ट प्रोमिसिंग न्यूकमर स्क्रीन एवार्ड, बेस्ट फीमेल डेब्यू के लिये जी सिने तथा गिल्ड अवार्ड  तथा बेस्ट सर्पोटिंग फीमेल एक्टर के लिये इन्टरनेशनल इंडियन फिल्म एकेडमी अवार्ड हासिल हो चुके हैं। आगे इसी साल मेरी दो फिल्में रिलीज हो रही हैं। एक तो यही फिल्म और दूसरी परमाणू- द स्टोरी ऑफ पौखरण।

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Mayapuri