1974 बॉक्स ऑफिस का तमाशा

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मायापुरी अंक 16.1975
फिल्मों के बॉक्स ऑफिस का खेल भी बहुत अनोखा है। टिकट खिड़की पर कब कौन-सी फिल्म पिट जायेगी। कोई नही जान सकता। एक जमाना था जब बड़े-बड़े सितारों को लेकर बनने वाली फिल्में सफलता की गांरटी मानी जाती थी। पर अब दर्शकों के मूड को क्या कहा जाये कि दिलीप कुमार की ‘सगीना’ और देव आनन्द की ‘इश्क इश्क इश्क’ बुरी तरह फ्लॉप हो गई। बावजूद इसके कि उनमें सदाबहार बड़े सितारे हैं। पहले कुछ विशेष जोड़ियों की फिल्में रहती थी। पर अब तो यह हाल है कि ‘हरे कृष्ण’ की सिल्वर जुबली जोड़ी देव-जीनत को ‘प्रेम-शास्त्र’ का एक सप्ताह के लिए सिनेमा हाल में टिकना मुश्किल हो गया। धर्मेन्द्र-सायरा की ‘इन्टरनेशनल कुक’ में हॉल पहले दिन ही खाली पड़ा रहा। बड़े बैनर की सफलता की गारंटी नही माने जा सकते। वरना गोल्डन जुबली निर्माता-निर्देशक (‘हाथी मेरे साथी’ वाले) देवर की ‘शुभ दिन’ इस तरह फ्लॉप न होती और न ही ‘आराधना’ जैसी हिट फिल्म के निर्देशक शक्ति सामान्त की ‘अजनबी’ बिजनेस में ढीली रहती।
भले ही कई निर्माता-निर्देशक दर्शकों की नब्ज पहचानने का दावा करते फिरे। सच यह है कि दर्शक की पसन्द को कोई नही जान पाया। भारत में हर वर्ष हिन्दी की लगभग एक सौ फिल्में बनती है। अगर यह फिल्मकार दर्शक की सही मांग को जानते होते तो कम से कम पचास फिल्में तो निश्चय ही बॉक्स ऑफिस पर सफल होती। पर पूरे वर्ष में दस जुबली फिल्मों के नाम गिनवाना मुश्किल हो जाता है। 1974 की ही बात ले लो। ‘रोटी कपड़ा और मकान’‘प्रेम नगर’‘अमीर गरीब’‘विदाई’‘धर्मा’‘यादों की बारात’‘आपकी कसम’‘पत्थर और पायल’‘दोस्त’ तथा ‘गुप्तज्ञान’ जैसी हिट फिल्मों में भला कितनी फिल्मों ने गोल्डन या सिल्वर जुबली की। वैसे अगर बिजनेस की दृष्टि से देखा जाये तो इस वर्ष कुछ अन्य फिल्मों के नाम भी गिनवाये जा सकते हैं जो कम से कम अपना खर्च तो निकाल ही गईं। ‘नमक हराम’‘कहानी किस्मत की’‘चोर मचाए शोर’‘कोरा कागज’‘मनोरंजन ‘हाथ की सफाई कसौटी’‘गीत मेरा नाम’‘दुल्हन’‘हिन्दुस्तान की कसम’‘मनचली’‘इम्तिहान’ तथा ‘प्राण जाये पर वचन न जाये’
पूरे वर्ष मे लगभग पच्चीस और कुल फिल्मों की एक चौथाई फिल्में ही बॉक्स ऑफिस पर संभाल सकी। बाकी फिल्म के निर्माता-निर्देशकों के लिये कम से कम व्यापार की दृष्टि से तो 1974 का वर्ष शुभ नही रहा। हम चाहे इस बात को नकारना चाहे पर यह सच है कि हमारे फिल्मी दर्शकों में से एक बड़ी संख्या सैक्स और ग्लैमर से प्रभावित होती है इसी कारण सैक्स की बैसाखियों के सहारे खड़ी फिल्म कम ही लड़खड़ाती है। ‘गुप्तज्ञान’ की अपार सफलता इसका अच्छा उदाहरण है। इसके अलावा ‘मनोरंजन’ को बॉक्स ऑफिस पर मिली सफलता मे उसके ‘ए’ सर्टिफिकेट वाले दृश्य ही सबसे बड़े सहायक थे। ‘गीता मेरा नाम’‘प्राण जाये पर वचन न जाये’ को भी इसीलिये सफलता मिली अन्य फिल्मों में ‘हीरा पन्ना’‘कॉल गर्ल’‘हवश’‘आलिगंन’‘दुनिया का मेला’ और ‘फाइव राइफल्स’ जैसी फिल्में नारी शरीर के प्रदर्शन के कारण ही थोड़ी बहुत चली। वैसे यह ग्लैमर का ही प्रभाव था कि ‘अमीर गरीब’‘प्रेम नगर’‘पत्थर और पायल’‘दोस्त’‘कसौटी’ तथा ‘हाथ की सफाई’ जैसी फिल्में सफल हो सकी यूं तो इनके पीछे एक और विशेषता थी हेमा मालिनी जैसी हीरोइन का आकर्षण जिसका सुन्दर चेहार इस समय ग्लैमर की दुनिया का चालू सिक्का बना हुआ है।
कुछ फिल्मों की सफलता के पीछ उनके तेज या मधुर संगीत का भी पूरा सहयोग होता है। ‘चोर मचाए शोर’‘यादों की बारात’‘आ गले लग जा’ और ‘अमीर गरीब’ के संगीत ने उनको बहुत सहायता दी।
हिन्दी फिल्मों के दर्शकों की एक बड़ी संख्या अभी तक भावुकता भरी फिल्मों की प्रेमी बनी हुई है। इन फिल्मों में भले ही कितनी अतिश्योक्ति हो। कितनी असंगत घटनायें हों और कितने आंसू-तोड़ संवाद हों। दर्शक और स्त्री दर्शकों के बल पर ऐसी फिल्में चल ही निकलती हैं मद्रास से अक्सर ऐसी फिल्में आती रहती है इस वर्ष ‘विदाई’ एक ऐसी ही सफल फिल्म थी ‘आपकी कसम’‘कोरा कागज’‘दुल्हन’ इत्यादि फिल्में इस वर्ष इसी वजह से सफल रही क्योंकि वह दर्शकों की भावनाओं को प्रभावित कर लेती है। मनोज कुमार इस दृष्टि से एक सफल निर्माता माने जा सकते हैं। क्योंकि वह दर्शकों की अपनी समस्याओं को लेकर उसमें ग्लैमर और फिल्मी लटकों का ऐसा मसाला मिलाता है कि दर्शक को एक ही फिल्म में अनेक फिल्मों का मजा मिल जाता है। ‘रोटी कपड़ा और मकान’ को जो भरपूर बॉक्स ऑफिस सफलता मिली वह इसी वजह से थी। उसमें ग्लैमर चाहने वालों के लिए जीनत अमान थी। सैक्स इच्छुकों के लिए अरुणा ईरानी और भावुक दर्शकों के लिए मौसमी चटर्जी साथ ही लड़ाई झगड़ा पसन्द करने वालों के लिये आखिर में लड़ाई के लम्बे सीन थे। स्वयं मनोज कुमार के देशभक्ति भरे सवांद और प्रेमनाथ के गरीबों के हक में बोले गये फिल्मी डॉयलाग सोने पे सुहागे काम कर गये। दर्शकों का एक समूह हिंसा और मारधाड़ की फिल्मों को भी खूब पसन्द करता है। डाकुओं और अपराधियों को लेकर बनाई गई फिल्में इन्हीं दर्शक वर्ग की कृपा के कारण ही सफल होती हैं। ‘धर्मा तभा ‘प्राण जाये पर वचन न जाये’ की सफलता इन फिल्मों की हिंसा के कारण ही थी। ‘गीत मेरा नाम’ में सुनीलदत्त का हिंसक रूप काफी हद तक इस फिल्म की जान था। दर्शक भी प्राय: अब चिकने चुपड़े नायकों के स्थान पर खलनायक जैसे रफ नायकों को पसन्द करने लगे हैं। सुनील दत्त, धर्मेन्द्र और विनोद खन्ना की हीरो के रूप में बढ़ती मांग का यही कारण है। अपने इस खलनायक टाईप नायकों के कारण ही ‘पत्थर और पायल’ और ‘कहानी किस्मत की’ ने इस वर्ष अच्छा व्यापार किया। ‘नमक हराम’ में अमिताभ का रफ रोल तथा ‘36 घंटे’ में सुनील दत्त की डाकू की भूमिका अपने इसी गुण के कारण राजेश खन्ना और राज कुमार जैसे सशक्त कलाकारों को डाउन कर गई।
रहस्य फिल्मों की शुरू से ही एक अलग मार्केट रही है। हालांकि रहस्य तो अब लगभग हर फिल्मों में ही पिरो दिया जाता है। पर पूर्णतया रहस्य फिल्मों की संख्या कम ही होती है। ‘बीस साल बाद’‘कानून’‘इत्तफाक’ जैसी सफल रहस्य फिल्में तो हर वर्ष बनती नही। इस वर्ष ‘36 घंटे’ ‘बेनाम’ और ‘चोरी चोरी’ इस दृष्टि से सफल फिल्में कही जा सकती हैं। व्यापार की दृष्टि से भी यह बुरी नही रही और रहस्यमय वातावरण के निर्माण की दृष्टि से भी। ‘मैं वो नही’ अवश्य कही-कही कमजोर थी।
‘मनचली’ की सफलता इस बात की प्रतीक है कि हमारे फिल्मी दर्शकों में हास्य फिल्मों के प्रतिअच्छा क्रेज है। वैसे हिन्दी में ज्यादा अच्छी हास्य फिल्में बनती भी नही। ज्यादातर फिल्मों का स्तर ‘बढ़ती का नाम दाढ़ी’ जैसा होता है और ऐसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सदा असफल रही हैं।
हिन्दी में बनने वाली आर्ट फिल्मों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है और उनमें सुधार भी हो रहा है। बुद्धिजीवी वर्ग इन फिल्मों को पसन्द करता है। चूंकि फिल्मी दर्शकों की इस वर्ग की संख्या अधिक नही होती इसलिए यह फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अपार सफलता नही पा सकती। उलझे कथानक और उलझी फिल्म तकनीक के कारण साधारण दर्शक तो यह फिल्में देखता ही नही। ‘गर्म हवा’‘अंकुर’ और आविष्कार इस वर्ष को उल्लेखनीय आर्ट फिल्में रही। विशेषकर ‘अकुर’ जिसने हैदराबाद के एक स्थान का सही चित्रण किया है और साथ ही शबाना आजमी जैसी एक श्रेष्ठ अभिनेत्री दी है।
तो यह था 1974 का बॉक्स ऑफिस का लेखा जोखा कुल मिलाकर यह वर्ष बॉक्स ऑफिस की दृष्टि से एक सामान्य वर्ष ही रहा। यूं तो फलॉप होने वाली फिल्मों की संख्या बहुत है पर कुछ ऐसी फिल्में जिनकी सफलता की पूरी आशा थी और वह फ्लॉप रही इस प्रकार है देवआनन्द की ‘हीरा पन्ना’‘प्रेमशास्त्र’ और ‘इश्क इश्क’ धर्मेन्द्र की ‘पॉकेटमार’‘रेशम की डोरी’ तथा ‘इंटरनेशनल कुक’ शशि कपूर की ‘मिस्टर रोमिया’‘इंसनियत’ व ‘पाप और पुण्य’ राजेश खन्ना की भी ‘हमशक्ल’ पिट गई। संजीव की इस वर्ष कोई पिक्चर अच्छा बिजनेस न कर सकी। ‘नया दिन नई रात’‘चौकीदार’‘सूरज’ और ‘चन्दा’ तथा ‘रानी मेरा नाम’ सब एक दूसरे से बढ़कर फ्लॉप रही हीरोइनों में वहीदा की ‘इन्साफ’‘राखी की पगली’ तथा ‘सायरा की पैसों की गुड़िया’ असफल रही। और वर्ष की सबसे बड़ी फ्लॉप रही दिलीप कुमार की ‘संगीना’


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Mayapuri

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