‘डिस्को’ को म्यूजिक का दर्जा नहीं दिया जा सकता – नौशाद

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Naushad Ali

इस कथन में आज दो राय शायद ही हो कि पर्दे की फिल्म हस्तियों के सामने पर्दे के पीछे काम कर रही हस्तियों का अस्तित्वनाके बराबर रह गया है, पहले डायरेक्टर संगीतकार की जो कद्र दर्शक गण करता था, वह संगीत में अस्थिरता जाने की वजह से आज कम हो गई है।

हालाकि इन संगीतकार हस्तियों ने अपने को दर्शकों की नजर में रखने के लिए दूसरे हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए हैं, टी.वी. पर प्रोग्राम, म्यूजिक नाइट्स के आयोजन से आम जनता तक पहुँचने का प्रयत्न जारी रखते हैं, पर संगीत की धार इतनी पैन नहीं कि लोग उनके मुरीद होकर रह जाए। ’ 

आनंद कर्णवाल

यह लेख दिनांक 24-2-1985 मायापुरी के पुराने अंक 544 से लिया गया है!

वे और उनका संगीत आज भी दर्शकों के लिए ही नहीं संगीतकारों के लिए भी प्रेरणा का खजाना रहा है

Naushad Ali

पिछले दशकों में कई संगीतकार ऐसे हुए हैं जिनकी शक्ल भले ही दर्शकों ने देखी हो, संगीत की झलक से उन हंस्तियों की आत्मा से उनकी मुलाकात अक्सर आज भी होती रहती है।

वे और उनका संगीत आज भी दर्शकों श्रोताओं के लिए ही नहीं संगीतकारों के लिए भी प्रेरणा का खजाना रहा है।

नौशाद अली साहब स्वर्गीय रोशन, ‘सी राम चन्द्र, मदन मोहन, शंकर जयकिशन .पी नैय्यर की पीढ़ी ऐसी कड़ी है, जो आज भी उठकर संगीत की किसी भी श्रेणी में चुनौती दे सकते हैं।

तभी तो पिछले दिनों मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें एक लाख रुपये के लता मंगेशकर पुरस्कार से सम्मानित किया, भारतीय सरकार उन्हें पहले ही उच्चतर पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी है। 

जिस तरह से आज संगीत में लय और सूर का नुकसान हो रहा है, ‘डिस्कोके बगैर संगीत दो कदम नहीं चल सकता, सोचा इस गूढ़ मुद्दे पर सही विमोचन और अवलोकन नौशाद अली साहब से अच्छा कौन दे सकता है, इसी गरज से उनके निवास स्थान पर कुछ सवाल लेकर उनके सामने प्रस्तुत हुए

नौशाद साहब को उनकी वर्तमान उपलब्धि के लिए उनके घर मुबारक देते हुए हमने पूछा- “आज जिस तरह से डिस्को या अन्य पाश्चात्य ढंग की धुनों द्वारा हिन्दुस्तानी संगीत के मुकाबले वेस्ट्रन म्यूजिक लोकप्रिय हो रहा है, इस वस्तु स्थिति पर वे क्‍या प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे ? 

लखनऊ अंदाज की शुद्ध उर्दु में बोलते छुए उन्होंने कहा-‘पहले तो मैं इस डिस्को नाम की चीज को म्यूजिक कहना पसंद नहीं करूँगा उसमें म्यूजिक इस्ट्रूमेंट प्रयोग में लाए जरूर जाता हैं, महज इफेक्टस्देने के तौर पर, तो मैं इस डिस्को प्रकार के साउंडइफेक्ट ही कह सकता हूँ।

म्यूजिक कहलाने वाली ये वेस्ट्रन लहर पहले भी कई बार हिन्दी फिल्‍मों में आई और गुम हो गई, मैं सोचता हूँ इस शोर-शराबे में कुछ वक्‍त के लिए मेलोडी (लय) गुम हो गई यतीम हो गई, पर कब तक?

इसके बगैर ज्यादा दिनों तक काम नहीं चलने वाला, लौटफिर कर अपने ही शास्त्रीय संगीत, राग, रागनियों का सहारा लेना पड़ेगा फिर वैसे गीत बनेंगे जिनमें  बाकायदा स्थाई और अन्तरे हुआ करेंगेऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। 

Naushad Ali

क्या वे पुराने दिन वापस आते दिखाई नहीं दे रहे जबकि एक बार लोगों ने खासतौर से नई पीढ़ी ने गजल जैसी शास्त्रीय विद्या पर फिर से तबज्जु देनी शुरू कर दी है, कई गजल गायक जैसे अनुप जलोटा, तलत अजीज, पंकज उदास तेजी से उभर कर आ रहे हैं, घर-घर में वे सुने जा रहे हैं?

गजल का एक बार फिर से लोकप्रियता होनाडिस्कोजैसे म्यूजिक कहलाने वाले शोर शराबे की मेहरबानी है, गजल की लोकप्रिक्ताडिस्कोकी बदौलत हुई है, लोग इस शोरशराबे को सुनतेसुनते तंग आने लगे।

अब तो जिन्दगी की बेढंगी तेज चाल ऊपर से रूह को सकून की बजाय हेमरिग मिले तो गजल जैसी रूह को तशकीन देने वाली चीज को अपनाना जाहिराना बात है।

गजलकी वह विद्या है जिसमें कम से कम संगीत पत्रों का प्रयोग किया जाता है, ‘लयसे ज्यादा जोर दिया जाता है, शब्दों का खूबसूरती से इस्तेमाल होता है।

मेरा पक्का विश्वास है कि गीत कोई सा भी क्यों हो उसकी पसंदगी या नापसंदगी अच्छे लफ्जों और घुन दो चीजों पर मुय्यसर होती है, नौशाद साहब ने स्पष्ट किया। 

लेकिन क्‍या आज के गजल गायक पुरानी गायिकी के आस-पास भी पहुँच पाते होंगे ? आप तलत अजीज, पंकज उदास, अनुप जलोटा, जगजीत-चित्रा जिन्हे इस विद्या के करीब मानते हैं जो वाकई में इस परम्परा को निभाते हैं? 

मेरे ख्याल से किसी एक सिंगर की तारीफ करके या मीनमेख निकाल कर उन पर जिक्र करना अच्छी बात होगी, एक की तारीफ करूँ तो दूसरा जरूर बुरा मान सकता है, वह बात दिगर है, वे गालिब, मीर या फेज की गहराई वाली गजलें कम गा रहे हैं

पर वक् की माँग के लिहाज से ठीक भी है, एक महफिल में गुजराती, मंहाराष्ट्रीयन, बंगाली सभी तरह के श्रोता होते हैं, सभी की तशकील का ख्याल रखना पड़ता है। 

Naushad Ali

गजल के प्रति एक बार जागरूकता लाने के लिए जिम्मेदार आप किस को समझते हैं ? 

मेरे ख्याल से इसका श्रेय पाकिस्तान के मेहंदी हसन साहब को दिया जाए, तो बेजा बात होगी, कई पाँच साल पहले वे हिन्दुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक की गजल में पुट देकर यहाँ आए। उनके ढंग को लोगों ने सराहा, हमारे यहाँ के कई उभरते गायकों ने उधर का रूख लिया, उसके बाद तो एक सिलसिला सा बन गया है, नौशाद साहब ने कहा!  

लेकिन पाकिस्तानी फिल्मों का म्यूजिक तो कई बार सीधे हिन्दी फिल्मों से उठाया जाता रहा है? आपकी भी कई धुनें वहाँ के फिल्‍मी गानों में मिलती हैं, इस पर आप क्या टिप्पणी करेंगे?

भाईम्यूजिक पर किसी एक का इजारा नहीं हो सकता, यह तो समुद्र है जिसमें मोती, सीपियाँ और कई अनमोल रत्न हैं, उनको अपने ढंग से बुनकर जेवर बनाओ, मैं किसी घुन की बुनियादी राग रागिनी उठाने की खिलाफत नहीं करता हूँ ज्यों कि त्यों किसी की बनाई चीज नहीं उसनी चाहिबे।.मैंने भी कई बार बड़े उस्तादों की चीजें उठा कर उन्हें अपने ढंग से पिरो कर पेश किया है….. उन्होंने ईमानदारी से बताया

आज जिस तरह से एक्टर-सिंगर का प्रचलन एक बार फिर शुरू हुआ है, जैसे पुराने दिनों में सुरैय्या, सुरेन्द्र नाथ, सहगल जैसे अमंग एक्टर सिंगर हुये क्या, आज वे एक्टर-सिंगर जैसे अमिताभ बच्चन, सुलक्षणा पड़ित, सलमा आगा उस सानी में आते हैं ? 

एक बार फिर इस विषय पर अपनी कोई राय देना मुनासिब नहीं होगा, मेरे ख्याल से अगर किसी एक्टर की आवाज नूरजहाँ , सुरैय्या या सहगल साहब जैसी है, तो अपने गीत गाने में मैं समझता हूँ कोई हर्ज नहीं, उनके पिक्चराइजेशन में एक अलग असर तो आता ही है, साथ में एक्टर उसमें एक अजीब सी खूबसूरती भी छोड़ जाता है

Naushad Ali

इस डिस्को के भीड़-भड़क्के में क्या आज भी किसी हिन्दी फिल्‍म में हिट म्यूजिक दे सकते हैं?  

बड़ा अजीब सवाल आपने किया है, क्यों नहीं मैं किसी भी जमाने में हिंट से हिट म्यूजिक दे सकता हूँ, मैं ऐसा नहीं कहना चाहता था मगर सवाल का जवाब यही बनता है

आपको जो मध्य प्रदेश सरकार ने लता मंगेशकर ‘अवाॅर्ड’ से सम्मानित किया ऐसे ‘अवाॅर्डस’ का क्‍या वाकई बड़ा महत्व हो सकता है?  

रिवार्ड और अवार्डयो दो चीजें ऐसी है जिनका हमेशा से महत्व रहा है, मैं तो कहता हूँ कई दूसरी सरकारों को भी हौसला अफजाई और इज्जत देने की खातिर ऐसे अवाॅर्ड देने चाहिए

आप तो शायर भी है कोई ताजातरीन शैर या गजल?

मैं पिछले दिनों वीजरआजम इन्दिरा गाँधी के कत्ल से बड़ा ही दुखी हुआ, उसी समय दो छन्द लिखे थे!

एतबार अब किसी पर अब होता नहीं

जागते हैसभी कोई सोता नहीं!

काम रेहेजान का रेहेजानी है मगर

अब मुहफिज का भी कुछ भरोसा नहीं!


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Mayapuri

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