दीवाली की कहानी- किताबों से जानी…शरद राय

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सबसे पहले आपने कब जाना दीपावली त्योहार के बारेे में ?

अजय देवगण:

सच कहूं तो पटाखे- फुलझड़ी कब पहली बार देखा याद ही नही है। जब बचपन होता है साल दरसाल बच्चे के हाथ मे माता – पिता पहले फुलझड़ी पकडाते हैं, फिर घूमनी फिर पटाखों की बारी आती है। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि हमने भी अपने बच्चों को इसी तरह पटाखे दिए हैं। आज मेरे बच्चे खुद जो मर्ज़ी होती है वो वैसा करते हैं। हम उनको लेकर डरते रहते हैं। शायद बचपन मे मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ होगा। मेरे पापा फाइट मास्टर (श्री वीरुदेवगण) थे, इसलिए मुझे आतिशबाज़ी का ज्यादा मौका मिला होगा।

वैसे, दीवाली क्या होती है, क्यों सेलिब्रेट की जाती है, यह मैंने किताब पढ़कर जाना है। जब पढ़ने लगा था तब मैंने इंडियन फेस्टिवल्स नाम की कोई किताब कही पढ़ने के लिए पा गया था, उसमे एक चैप्टर था दीपावली का। बस,उसी को पढ़कर दीवाली मनाए जाने का मतलब जान पाया था।

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विद्या बालन:

मैंने एक फिल्म पत्रिका में जूनियर महमूद की दीवाली मनाने का तरीका पढ़ा था। तबसे मुझे इस पर्व पर कुछ ना कुछ उटपटांग करने और देखने का मन होता है।

मैं बड़ी हो रही थी फिल्मो का शौक लगा था। उस समय एक हिंदी की फिल्म पत्रिका में ( ध्यान नही है किंतु शायद वो पत्रिका मायापुरीही रही हो) मैंने पढ़ा था कि जूनियर महमूद और उनके दोस्त किसी कुत्ते की पूछ में पटाखा बांधकर उसको दौड़ा देते थे। फटाखों में आग लगा देने से कुत्ता भागता जाता था और जूनियर महमूद और उनके दोस्त उसके पीछे दौड़ते थे। खैर, मैंने कभी ऐसा खुद नही किया। वर्षों पहले यह किसी दीपावली के स्पेशल नम्बर में पढ़ा था ।

अब, समझ में आता है कि उस पैट जानवर पर क्या गुजरता होगा। एनिमल- टॉरचरिंग कितना खतरनाक खेल है, इसपर अब रोक है। और मैं, ऐसे त्योहार मनाने के तरीकों का शख्त विरोध करती हूं।

अरुणा इरानी:

दीवाली का मनाया जाना मैंने तब जाना…तब जाना… जब कोई तीन चार साल की थी। जहां हम रहते थे, मेरे पड़ोस के घर के बच्चे को पटाखा छोड़ते देखा था। याद इसलिए है कि वो जल गया था और लोग उसको पटाखा से जलने की वजह से डांट रहे थे। फिर कई दिन तक हम बच्चों की भाग दौड़ थी हम सब बच्चे फुलझड़ी देख कर तालियां पीटते हुए चिल्लाते थे, दौड़ते थे।

दीवाली का महत्व तो बहुत बडी होने पर जान पाई थी। पहले किसी से सुना था बाद में पढ़ा भी था कि जब भगवान राम लंका से रावण को मारकर और अपना 14 वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या वापस लौटे थे, पूरी अयोध्या जगमगा उठी थी। तभी से घरों की लाइटिंग की जाने की परंपरा शुरू हो गई। यानी- हमारे देश में और त्योहारों में दीपावली जगमगाने की परंपरा बहुत पुरानी है।

कहते हैं दीवाली असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। हम ये सब बातें अब किताबों में पढ़कर जान पाते हैं। प्राचीन काल मे जब पढ़ना नही था, किताबें नहीं थी, मेरे ख्याल से इन त्योहारों की परंपराएं ही हमें उन आदर्शों का याद दिलाने के लिए आरम्भ हुई होंगी। त्योहारों का अपना मतलब होता है।

अरुणा इरानी

डाॅ. जगदीश वाघेला  (निर्माता- निर्देशक)

मैं फ़िल्म निर्माता- निर्देशक होने के साथ साथ एक चिकित्सक भी हूँ। अपनी फिल्म द इंटरनेशनल प्रॉब्लममें मैंने एक दीपावली गीत का फिल्मांकन किया था।आप जानकर हैरान होंगे कि यह गीत भ्प्ट के मरीजों पर फिल्माया गया था। सीक्वेंस गाने का मनहूसियत का था। मरने वाले एड्स के बीमार क्या दीवाली मनाएंगे? बट.. उनमे आशा का संचार करने के लिए हमने गीत का सीक्वेंस रखा था।यह एक सोच थी उस हालात के लिए।

मेरा खयाल है कि कमोवेश मनहूसियत आज के हालात में भी है। इस कोरोना पेंडेमिकसे बाहर आने के बाद …अभी बाहर आए नहीं हैं, आने की ओर बढ़ रहे हैं तो यह और ज़रूरी हो जाता है कि हम सब अपने अंदर पॉजिटिव सोच ले आएं।

तो, मेरी सोच यह है कि हमने दीवाली कबसे जाना, बात वो नहीं है बल्कि हमने कब से महसूस किया, बात यह होनी चाहिए। हमने दीवाली का मतलब इस साल जाना है। अपनी सोच को आशावान बनाने के लिए हमें उदासी के माहौल में भी दिया जलाना है। शायद राम का भी आदर्श यही रहा होगा!


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Mayapuri

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