नाना का ‘नाम फाउंडेशन’

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फिल्म ‘क्रांतिवीर’ का नायक (नाना पाटेकर) फिल्म के क्लाइमैक्स में फांसी के तख्ते पर चढ़कर बहुत व्यथित होकर चिल्लाते हुए कहता है- ‘मैं किसके लिए मर रहा हूं ? इन मुर्दों के लिए…जो अपनी रक्षा (गुंडों से) खुद नहीं कर सकते…!’ कुछ ऐसे ही डायलॉग थे- जिसने फिल्म को हिट कर दिया था। अब उसी कहानी के संवादों का ‘सीक्वेल’ नाना असली जिन्दगी में जीने में लगे हैं। फर्क यही है कि यहां वह जीवन में हताश हो चुके लोगों में जान फूंकने के लिए वह सब कर रहे हैं जो पर्दे पर करते आये हैं। महाराष्ट्र के 84 हजार सूखाग्रस्त गांवों के तमाम किसान जो ‘आत्म-हत्या’ करने पर उतारू थे, नाना पाटेकर की एनजीओ-संस्था ‘नाम’ के प्रयास से जीवन से जूझने के लिए कृत-संकल्प हो रहे हैं।

सिर्फ एक महीने में (खबरों के मुताबिक) करीब छः करोड़ रूपये नाना की अपील पर सुखाग्रस्त गांवों की मदद के लिए इकट्ठा हुए हैं। सहयोग राशि देने वालों में पूना का एक भिखारी भी है जिसने 300 रूपए संस्था को भेजे हैं। सड़क की सफाई करने वाली छः महिलाओं ने मिलकर 3000 रूपए भेजे हैं। एपीएमसी के लीडरों ने सहयोग राशि दी है। ताकि किसान भुखमरी से त्रस्त होकर आत्म हत्या न करें। सहयोग देने वालों का जोश देखकर नाना खुद आश्चर्यचकित हैं जिनको अपने सेल-फोन की बैटरी दिन में तीन बार चार्ज करनी पड़ रही है। बकौल नाना ‘मैं चाहता हूं पैसों की मदद देने की बजाय उन लोगों के गांवों को बुनियादी सुविधायें दी जाए और अब हम उस दिशा में काम कर रहे हैं।’ शुरूआती दौर में नाना ने एक सूखाग्रस्त गांव गोद लिया था, अब कई गांव गोद लिए जाने की चर्चा हैं।

Nana Patekar
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कैसे शुरू हुआ ‘नाम’

नाना पाटेकर ने खबर पढ़ी कि सूखाग्रस्त गांवों से लोग आत्म हत्या कर रहे हैं। करीब डेढ़ सौ किसानों की आत्म हत्या की खबर ने उनको विचलित कर दिया। नाना ने अपने मित्र मकरन्द अनासपुरे से बात की कि वे मृतक-परिवारों की मदद करना चाहते हैं। अभिनेता मकरन्द अनासपुरे भी इसी तरह व्यथित थे, जिनका अपना गांव बीड भी तबाही की चपेट में था। अनासपुरे और नाना दोनों बीड गये और वहां करीब 120 विधवाओं से मिले, जिनके पतियों ने आत्महत्या की थी। सभी विधवाओं को 15000 रूपए की राशि देकर नाना ने महसूस किया कि इतनी छोटी रकम से उनको क्या मदद मिलेगी। फिर वे औरंगाबाद गये, वहां ऐसी 100 त्रासित महिलाओं के परिवार से मिले। फिर वे अमरावती, अकोला, वाशिम, बुलढ़ाना, भुसावल, जलगांव, धुले, नंदुरवार…गये। जहां सब जगह त्रासदी हुई थी। ना खाने को अन्न, ना पीने को पानी! तब उन्होंने तय किया कि मदद पैसों के देने के बजाय गांवों की हालत बदलने से होगी। बुनियादी जरूरतों के लिए क्या किया जाए? इस सोच के साथ ‘नाम’ फाउंडेशन का जन्म हुआ।

Nana Patekar
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‘सहायता करना तो घाव पर तुरंत पट्टी बांधना भर है।’ नाना कहते हैं। ‘ज्यादातर दुखी-परिवार की जरूरतें हैं कि उनका खर्च कैसे चलेगा। बजाय मदद के उनको नौकरी-धंधा चाहिए। पानी का साधन चाहिए।’ नाम के साथ अब सब जुड़ रहे हैं। नाना ने अलख जगाया है- आगे आओ काम करेंगे। अब वे पानी के लिए ‘रिजर्वायर’ जो बंद पड़े हैं या लापता है सरकारी पन्नों में, उनको खोज रहे हैं। करीब 600 एकड़ का एक पानी का पोखरा ऐसे ही बंद फाइलों में गिला है- जिसको ‘नाम’ के साथ जुड़े किसान खुद तैयार करने में जुट गए हैं। नाना का कहना है कि ‘हमें 20 विधवाएं हाथ बांधे, आतुर आखों से देख रही हैं, सिर्फ वे ही हमारी सहायता का इंतजार नहीं देख कर रही बल्कि उनके पीछे 200 और औरतें हैं जिनको भी मदद की जरूरत है। और यह तब होगा जब लोग खुद आगे बढ़े।’

नाना ने तय किया है कि वे अपनी हर शूटिंग के शेड्यूल के उपरान्त 2 दिन गांवों को देंगे जहां उनकी जरूरत है। सचमुच ‘क्रांतिवीर’ का रीयल लाइफ सीक्वेल जी रहे हैं नाना! काश कुछ और सितारे ऐसी सोच के साथ आगे आते…!!


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Mayapuri

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