काजोल, बप्पी लहिरी, आशुतोष गोवारिकर, ऋतुपर्णा आदि ने धूमधाम से दुर्गा पूजा का आयोजन किया

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तनुजा, काजोल, तनीषा मुखर्जी, मौनी रॉय, आशुतोष गोवारिकर, अयान मुखर्जी, देबू मुखर्जी, बप्पी लहिड़ी, तनीशा लहिड़ी, कृष लहिड़ी, जान कुमार सानू, शरबानी मुखर्जी, सम्राट, ज्योति मुखर्जी, रेगो लाहिड़ी, ऋतुपर्णा सेनगुप्ता ने नार्थ बॉम्बे सर्बोजेनिन दुर्गा पूजा समिति 2021 का दौरा किया, जो मुंबई में सबसे पुरानी और सबसे बड़ी दुर्गा पूजा समिति में से एक हैं जो COVID महामारी के बीच लगातार दूसरे वर्ष में भी वर्चुअल ही हो रही है, ओर सख्त मानदंडों का पालन करते हुए केवल डबल वेक्सिनेशन वाले लोगों को आने की अनुमति देती है

अब जैसे कि माँ दुर्गा का त्योहार आ चूका है, नार्थ बॉम्बे सर्बोजेनिन दुर्गा पूजा समिति के सदस्य लगातार दूसरे वर्ष भी कोविड-19 महामारी के चलते वर्चुअल तरीके से उत्सव माना रहे हैं।

सदस्यों ने सेल फोन और लैपटॉप के माध्यम से अपनी पूजा को लाइव स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचाने का फैसला किया है। वे चिंतित हैं कि भीड़ भरे पंडालों से कई लोग घातक वायरस से संक्रमित हो सकते हैं, इसलिए पिछले साल की व्यवस्था की तरह ही इसे आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया।

वास्तव में इस साल उन्होंने मूर्ति को मुकुट के साथ 4 फीट और 6 फीट तक छोटा कर दिया है। बड़े सदस्यों से अनुरोध है कि वे घर पर ही रहें। वास्तव में सदस्यों को सामाजिक दूरी के मानदंडों का पालन करते हुए छोटे बैचों में पंडाल में जाने की अनुमति है। दुर्भाग्य से बाहरी लोगों का भोग, प्रसाद और फूलों को छूने से सख्त मना किया गया है। सुबह दो घंटे बिना फूल वाली अंजलि और दो घंटे की संध्या आरती होगी।

देबू मुखर्जी कहते हैं, “यह दूसरा वर्ष है जब हम वर्चुअल दुर्गा पूजा कर रहे हैं। हमें सामाजिक दूरी बनाए रखनी है और मास्क पहनना है। इस वजह से हम ज्यादा लोगों को अंदर नहीं आने दे रहे हैं। यह केवल सदस्य हैं। सभी की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हमने सोचा कि यह सबसे अच्छा निर्णय है। यहां तक कि सदस्यों को भी एक विशिष्ट समय आवंटित किया जाता है जब वे पंडाल में जा सकते हैं। हम माँ का आशीर्वाद चाहते हैं और सभी की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं।”

काजोल कहती हैं, “क्योंकि अभूतपूर्व समय में अभूतपूर्व कार्रवाई की आवश्यकता होती है, दुर्भाग्य से इस वर्ष भी दुर्गा पूजा 2019 की तरह धूमधाम से नहीं मनाई जाएगी। त्योहार की बहुत सारी प्यारी यादें हैं, यह परिवार को एक साथ लाता है, पोशाक से लेकर भोग तक की तैयारी, दुर्गा पूजा के बारे में सब कुछ खास है। हालांकि, सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए, मुझे विश्वास है कि एनबीएसडीपी वह करेगा जो सदस्यों और भक्तों के लिए सबसे अच्छा होगा।”

अयान मुखर्जी कहते हैं, “यह दूसरा वर्ष है जब हम वर्चुअल हो रहे हैं, हालांकि हमारे सदस्यों और भक्तों की सुरक्षा हमारी सर्वोपरि चिंता है, हम यह सुनिश्चित करने के लिए सब कुछ करेंगे कि हर कोई सुरक्षित है। हम इस समय से गुजरने में मदद करने के लिए माँ दुर्गा का आशीर्वाद चाहते हैं।”

शरबानी मुखर्जी कहती हैं, “सभी को दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं। आज हम जिस COVID स्थिति का सामना कर रहे हैं, उसमें होने के कारण हमें बहुत सावधान रहना होगा क्योंकि घर पर बच्चे, वरिष्ठ नागरिक और प्रियजन हैं इसलिए मुझे लगता है कि यह आवश्यक है कि हमें प्रोटोकॉल का पालन करना होगा। निश्चित रूप से पूजा उस तरह से नहीं है जिस तरह से यह बड़े पैमाने पर था, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुष्ठान किया जाता है और पूजा की जाती है, हम सभी विधियों का पालन कर रहे हैं। इतने सालों से दुनिया और भारत से आने वाले भक्तों की हमें कमी खल रही है। उम्मीद है कि अगले साल तक हम धमाकेदार वापसी करेंगे। यह हमारा 75 वां वर्ष होने जा रहा है, इसलिए हम इसे लाने के लिए एक बड़े उत्सव की योजना बना रहे हैं और माँ के आशीर्वाद से, उम्मीद है कि हम इस महामारी की स्थिति से जल्द बाहर निकलेंगे।”

षष्ठी से बिजॉय दशमी तक दुर्गा पूजा मनाई जाती है

महा षष्ठी: इस दिन माँ का बहुत ही धूमधाम से स्वागत किया जाता है। शाम के समय कुलो को पान, सिंदूर, अल्ता, शीला (पत्थर), धान आदि से सजाया जाता है। और धाक की थाप और शंख की ध्वनि के साथ माँ का स्वागत होता है… इसे कहते हैं अमोंट्रोन और अधिवास-माँ के बोधों… माँ का स्वागत किया जा रहा है।

महासप्तमी: इस दिन हरे नारियल और आम के पत्तों के साथ कलश रखा जाता है। यह चारों ओर से एक लाल धागे से घिरा हुआ है और बंधा हुआ है। इसे कलश स्थापना कहते हैं। कलश एक मिट्टी का घड़ा है क्योंकि माँ की मूर्ति गंगा मिट्टी से बनी है और माँ के प्राण (या जीवन) घड़े में केंद्रित है। तो घड़ा माँ का प्रतीक है। पूजा गणपति से प्रार्थना के साथ शुरू होती है, उसके बाद माँ की पूजा की जाती है। माँ दुर्गा का एक और नाम नाबा पत्रिका है, जिसका अर्थ है नौ पेड़ यानी केले का पेड़, कोचू का पेड़, हल्दी का पेड़, जयंती का पेड़, बेल के पेड़ की शाखा, दलीम का पेड़ (अनार) एक साथ बंधे होते हैं। डबल बेल फल केले के पेड़ से बंधा होता है। फिर इसे किसी नदी तट या समुद्र में ले जाकर स्नान कराया जाता है। जब इसे वापस लाया जाता है तो इसे सिंदूर के साथ एक सफेद और लाल साड़ी में लपेटा जाता है और अब यह एक विवाहित महिला की तरह दिखती है जिसका सिर ढका हुआ है। इसे कोला बहू कहते हैं। कई लोगों की गलत धारणा है कि कोला बहू गणपति की पत्नी हैं लेकिन वास्तव में वह माँ दुर्गा या नबा पत्रिका हैं… गणपति की माँ

महा स्नान: इस दिन माँ दुर्गा को स्नान कराया जाता है। सबसे पहले मूर्ति के सामने एक घड़ा रखा जाता है; घड़े में एक शीशा रखा जाता है, ताकि आईने में माँ का प्रतिबिंब दिखाई दे। पुरोहित शीशे पर हल्दी और सरसों का तेल ऐसे लगाते हैं मानो नहाने से पहले माँ पर लगा रहे हों। पुराने जमाने में जब साबुन नहीं होता था तो नहाने के लिए हल्दी और सरसों के तेल का इस्तेमाल किया जाता था। पुजारी उसे स्नान करने के लिए विभिन्न प्रकार के पानी, यानी नारियल पानी, चंदन, गंगा जल, गन्ने का रस, सात पवित्र समुद्रों का पानी डालता है। इस दौरान हर क्षेत्र से मिटटी साथ ही वेश्या के दरवाजे से मिटटी आना बहुत जरूरी होता है। स्नान के बाद पुजारी शीशे पर माँ के नाम की एक नई साड़ी और धन-दुरा रखता है, जिसे बाद में बेदी (पूजा स्थल) पर रख दिया जाता है।

प्राण प्रतिष्ठा: इसका अर्थ है जीवन को आईने में लाना। पुजारी दाहिने हाथ में कुश और फूल लेकर सिर से पांव तक माँ को छूता है और मंत्र पथ से जीवन को मूर्ति, दर्पण और कलश में लाया जाता है।

महा अगमन: हर साल माँ या तो पालकी पर आती है या हाथी या नाव या डोला (झूले) या घोड़े आदि पर आती हैं।

यह साल बंगाली वर्ष के हिसाब से 1423 कहलाता है, इसके अनुसार इस वर्ष देवी दुर्गा एक बिगडैल घोड़े पर आगमन कर रही हैं जो बहुत विनाशकारी और गुस्से का प्रतीक है, मान्यता यह भी है की इस वर्ष माता घोड़े पर बैठ रास्ते को रौंदते हुए आगमन करेंगी। देवी आती हैं और उसी वाहन पर पृथ्वी से चली जाती हैं, जो प्राकृतिक आपदाओं, सामाजिक अशांति और राजनीतिक उथल-पुथल का संकेत देती हैं।

माँ दुर्गा का अगमन- घोड़े पर और गमन- घोड़े पर।

स्वागत: माँ का स्वागत करने के लिए पूजा 16 सामग्रियों के साथ की जाती है- आशान स्वागतम [स्वागत], पाद्यो [पैर धोने के लिए पानी], अर्घो, अचमोनिओम, मधु परकम, पूर्णर अचमनियम, आभरण [शृंगार], सिंदूर, गंध [स्सेंट], पुष्पा [फूल], पुष्पा माला, बिल्लो पात्रा [बेल पत्ता], बिलोपात्रा माला [बेल पत्ती की माला], धूप, दीप, काजल, नैबिद्दो, भोग और मिष्टी, पान, सुपारी।

पुष्पांजलि: पुष्पांजलि का अर्थ है सभी को लंबी उम्र, प्रसिद्धि, सौभाग्य, स्वास्थ्य, धन, खुशी देने के लिए माँ के चरणों में प्रार्थना करना। भक्त माँ से सभी बुराई, उदासी, लालच और प्रलोभनों से उनकी रक्षा करने का अनुरोध करते हैं।

महा अष्टमी पूजा: माँ अब महा गौरी हैं- पूजा महास्नान और महा गौरी पूजा के साथ शुरू होती है। माँ को 64 योगिनियों की शक्ति देने के लिए पूजा की जाती है। यह 9 घड़ों की पूजा है। फिर माँ के शस्त्रों की पूजा की जाती है।

शांधी पूजा: यह वह पूजा है जब अष्टमी पूजा समाप्त होती है और नवमी पूजा शुरू होती है, इसलिए इसे शांधी पूजा कहा जाता है। यह सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है, अष्टमी और नवमी पूजा का मिलन (शांधी)। इस पूजा की अवधि 45 मिनट है। इस समय माँ चामुंडा हैं।

पुष्पांजलि: प्रार्थना भेंट। भोग, जिसमें फल और मिठाइयाँ होती हैं, माँ को चढ़ाया जाता है, उसके बाद “नीट भोग”, जिसमें चावल, घी, दाल, तली हुई सब्जियाँ, चटनी शामिल होती हैं। यह प्रसाद बाद में भक्तों के बीच वितरित किया जाता है जिसे कंगाली भोजन कहा जाता है।

इस समय 108 दीये जलाए जाते हैं और माँ को 108 कमल अर्पित किए जाते हैं।

एक प्रसिद्ध कहानी है कि भगवान राम ने रावण को हराने के लिए माँ दुर्गा से उनके चरणों में 108 कमल अर्पित करने की प्रार्थना की थी। लेकिन वह उसमे एक कमल को गायब पाते हैं, इसे बदलने के लिए, वे अपनी आंख का बलिदान करना चाहते थे लेकिन उसी क्षण माँ उनके सामने प्रकट होती हैं और उन्हें रोक देती हैं खोया हुआ कमल उन्हें लौटा देती हैं। ओर फिर उन्हें “विजय” होने का आशीर्वाद देती हैं।

महा नवमी पूजा: इस दिन माँ सिद्धि धात्री हैं। यह पूजा गणपति पूजा से शुरू होती है और फिर अन्य सभी देवों और देवताओं की पूजा की जाती है… इसके बाद माँ का महा स्नान किया जाता है।

बिजोया दशमी:- इस दिन माँ ने महिषासुर को परास्त कर मार डाला था।

देवी पूजा: माँ को दही, शहद और दूध के साथ भोग लगाया जाता है… इसे चरणामृत भी कहा जता हैं। आसन पर बैठे पुजारी पवित्र बर्तन के पास एक फूल लेकर उत्तर दिशा में रखते हैं क्योंकि माँ कैलाश की स्वामिनी हैं।

फिर पुजारी उस पवित्र दर्पण (आईना) को लेते है जो घड़े पर था और विसर्जन का अनुष्ठान कररते है। यह वही आईना है जो माँ के स्वागत के लिए इस्तेमाल किया जाता था क्योंकि आईने पर उनका प्रतिबिंब होता है।

सिंदूर उत्सव: विवाहित महिलाएं माँ के माथे पर सिंदूर लगाती हैं और मिठाई चढ़ाती हैं जिसके बाद अन्य सभी महि